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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 642
ऋषिः - प्रजापतिः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम - 0
5
आ꣣भि꣢꣫ष्ट्वम꣣भि꣡ष्टि꣢भिः꣣ स्वा꣢ऽ३र्न्ना꣢ꣳशुः । प्र꣡चे꣢तन꣣ प्र꣡चे꣢त꣣ये꣡न्द्र꣢ द्यु꣣म्ना꣡य꣢ न इ꣣षे꣢ ॥६४२
स्वर सहित पद पाठआ꣣भिः । त्वम् । अभिष्टिभिः । स्वः । न । अँ꣣शुः꣢ । प्र꣡चे꣢꣯तन । प्र । चे꣣तन । प्र꣢ । चे꣣तय । इ꣡न्द्र꣢꣯ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ । नः꣢ । इषे꣢ ॥६४२॥
स्वर रहित मन्त्र
आभिष्ट्वमभिष्टिभिः स्वाऽ३र्न्नाꣳशुः । प्रचेतन प्रचेतयेन्द्र द्युम्नाय न इषे ॥६४२
स्वर रहित पद पाठ
आभिः । त्वम् । अभिष्टिभिः । स्वः । न । अँशुः । प्रचेतन । प्र । चेतन । प्र । चेतय । इन्द्र । द्युम्नाय । नः । इषे ॥६४२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 642
(कौथुम) महानाम्न्यार्चिकः » प्रपाठक » ; अर्ध-प्रपाठक » ; दशतिः » ; मन्त्र » 2
(राणानीय) महानाम्न्यार्चिकः » अध्याय » ; खण्ड » ;
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(कौथुम) महानाम्न्यार्चिकः » प्रपाठक » ; अर्ध-प्रपाठक » ; दशतिः » ; मन्त्र » 2
(राणानीय) महानाम्न्यार्चिकः » अध्याय » ; खण्ड » ;
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विषय - सूर्य-किरणों के समान
पदार्थ -
('अभिष्टि') शब्द Attack=आक्रमण का वाचक है। आक्रमण मार्ग का भी होता है। प्रजापति इन्द्र से कहते हैं कि तू अपने जीवन-यात्रा के चारों प्रयाणों में 'पठन, पालन, पाठन व प्रचार' के पगों को ठीक रखता चला तो (आभिः त्वम् अभिष्टि-भिः') = तू इन मार्ग के आक्रमणों से (स्वः अंशुः न) = सूर्य–किरण के समान चमकनेवाला बनेगा - इतनी अधिक तेरी शोभा होगी, अतः (प्रचेतन) = हे प्रकृष्ट चेतनावाले जीव! तू (प्रचेतय) = चेत, होश में आ । मोहमयी प्रमाद-मदिरा को पीकर उन्मत्त न बना रह । तू 'इन्द्र' है- मैंने तुझे इन्द्रियों का स्वामी बनाया है–तू इन्द्रियों का दास न बनना | (द्युम्नाय) = तुझे संसार में ज्योति को प्राप्त करने के लिए भेजा गया है (न इषे) = केवल अन्न के लिए नहीं भेजा गया। शरीर - यात्रा के लिए भोजन करते हुए तू जीवन का लक्ष्य ज्ञान प्राप्ति को ही समझना।
(‘न इषे') का सन्धि-छेद ‘नः इषे’ भी हो सकता है। तब भावना यह होगी कि तुझे हमने (न:) = हमारी प्रजा को (इषे) = उत्तम प्रेरणा देने के लिए भेजा है। ज्ञान प्राप्त करके तूने अपने जीवन से औरों को भी उत्तम प्रेरणा देनी है।
भावार्थ -
हम खाने-पीने की दुनिया में ही न रमे रह जाएँ। ज्ञान प्राप्त करें।
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