Loading...

सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 838
ऋषिः - कविर्भार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
4

अ꣡त꣢स्त्वा र꣣यि꣢र꣣꣬भ्य꣢꣯य꣣द्रा꣡जा꣢नꣳ सुक्रतो दि꣣वः꣢ । सु꣣पर्णो꣡ अ꣢व्य꣣थी꣡ भ꣢रत् ॥८३८॥

स्वर सहित पद पाठ

अ꣡तः꣢꣯ । त्वा꣣ । रयिः꣢ । अ꣣भि꣢ । अ꣢यत् । रा꣡जा꣢꣯नम् । सु꣣क्रतो । सु । क्रतो । दिवः꣢ । सु꣣प꣢र्णः । सु꣣ । पर्णः꣢ । अ꣣व्यथी꣢ । अ꣣ । व्यथी꣢ । भ꣣रत् ॥८३८॥


स्वर रहित मन्त्र

अतस्त्वा रयिरभ्ययद्राजानꣳ सुक्रतो दिवः । सुपर्णो अव्यथी भरत् ॥८३८॥


स्वर रहित पद पाठ

अतः । त्वा । रयिः । अभि । अयत् । राजानम् । सुक्रतो । सु । क्रतो । दिवः । सुपर्णः । सु । पर्णः । अव्यथी । अ । व्यथी । भरत् ॥८३८॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 838
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
Acknowledgment

पदार्थ -

हे (सुक्रतो) = उत्तम सङ्कल्पों व कर्मोंवाले जीव ! (राजानम्) - बड़े नियमित जीवनवाले [राज्, Regulate] (त्वा) = तुझे, (अत:) = क्योंकि तू पुरुषार्थ-शून्य प्रार्थना में नहीं लगा, इसलिए (दिवः रयिः) = यह ज्ञान धन (अभ्ययत्) = प्राप्त होता है। ‘तू पुरुषार्थ में लगा है, तेरा जीवन बड़ा नियमित है।' (सुपर्णः) = उत्तम ढंग से अपना पालन-पोषण करनेवाला, नियमित गति से अपने जीवन को चलानेवाला (अव्यथी) = कर्म से कभी परे न हटनेवाला, अनथक व्यक्ति (भरत्) = अपने को इष्ट वस्तुओं का पात्र बनाता ही है। उत्तम गतिवाले अनथक व्यक्ति की प्रार्थना पूरी होती ही है । 

भावार्थ -

हम उत्तम प्रार्थनाएँ तो करें ही, उन वस्तुओं के लिए पूर्ण पुरुषार्थ भी करें ।

इस भाष्य को एडिट करें
Top