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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 839
ऋषिः - कविर्भार्गवः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
अ꣡धा꣢ हिन्वा꣣न꣡ इ꣢न्द्रि꣣यं꣡ ज्यायो꣢꣯ महि꣣त्व꣡मा꣢नशे । अ꣣भिष्टिकृ꣡द्विच꣢꣯र्षणिः ॥८३९॥
स्वर सहित पद पाठअ꣡ध꣢꣯ । हि꣡न्वानः꣢ । इ꣣न्द्रिय꣢म् । ज्या꣡यः꣢꣯ । म꣣हित्व꣢म् । आ꣣नशे । अभिष्टिकृ꣢त् । अ꣣भिष्टि । कृ꣢त् । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः ॥८३९॥
स्वर रहित मन्त्र
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः ॥८३९॥
स्वर रहित पद पाठ
अध । हिन्वानः । इन्द्रियम् । ज्यायः । महित्वम् । आनशे । अभिष्टिकृत् । अभिष्टि । कृत् । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः ॥८३९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 839
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 5
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विषय - महान् महिमा
पदार्थ -
हे जीव ! ('दिवः रयि:') = ज्ञान का प्रकाश तो तुझे प्राप्त होता ही है । (अध) = अब (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों की शक्ति – बल को (हिन्वान:) = प्राप्त करता हुआ तू (ज्याय: महित्वम्) = उत्कृष्ट महत्त्व को (आनशे) = प्राप्त करता है।‘ब्रह्म’ के साथ ‘क्षत्र' के मिल जाने से सोने में सुगन्ध हो जाती है। (अभिष्टिकृत्) = इस ब्रह्म व क्षत्र के मेल से तू सब अभीष्टों को – सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाला होता है। अथवा [अभिष्टि worship] तू सच्ची उपासना करनेवाला होता है तथा (विचर्षणिः) = तू विशिष्ट द्रष्टावस्तुओं को ठीक रूप में देखनेवाला होता है। ब्रह्म और क्षत्र का मेल ही ज्ञान और क्रिया का समन्वय है । अकेला ज्ञान पङ्गु है, अकेली क्रिया अन्धी। दोनों का सम्बन्ध मानव-जीवन को पङ्गुत्व व अन्धत्व से ऊपर उठाकर प्रकाशमय व क्रियाशील बनाता है, इसी से उसे महा महिमा प्राप्त होती
है।
भावार्थ -
हम ब्रह्म व क्षत्र का मेल करते हुए अपने जीवन को महत्त्वशाली बनाएँ ।
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