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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 840
ऋषिः - कविर्भार्गवः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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वि꣡श्व꣢स्मा꣣ इ꣡त्स्व꣢र्दृ꣣शे꣡ साधा꣢꣯रणꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । गो꣣पा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ वि꣡र्भ꣢रत् ॥८४०॥

स्वर सहित पद पाठ

वि꣡श्व꣢꣯स्मै । इत् । स्वः꣢ । दृ꣣शे꣢ । सा꣡धा꣢꣯रणम् । र꣣जस्तु꣡र꣢म् । गो꣣पा꣢म् । गो꣣ । पा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । विः । भ꣣रत् ॥८४०॥


स्वर रहित मन्त्र

विश्वस्मा इत्स्वर्दृशे साधारणꣳ रजस्तुरम् । गोपामृतस्य विर्भरत् ॥८४०॥


स्वर रहित पद पाठ

विश्वस्मै । इत् । स्वः । दृशे । साधारणम् । रजस्तुरम् । गोपाम् । गो । पाम् । ऋतस्य । विः । भरत् ॥८४०॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 840
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 6
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पदार्थ -

हे जीव ! ('दिवः रयि:') = ज्ञान का प्रकाश तो तुझे प्राप्त होता ही है । (अध) = अब (इन्द्रियम्) = इन्द्रियों की शक्ति – बल को (हिन्वान:) = प्राप्त करता हुआ तू (ज्याय: महित्वम्) = उत्कृष्ट महत्त्व को (आनशे) = प्राप्त करता है।‘ब्रह्म’ के साथ ‘क्षत्र' के मिल जाने से सोने में सुगन्ध हो जाती है। (अभिष्टिकृत्) = इस ब्रह्म व क्षत्र के मेल से तू सब अभीष्टों को – सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाला होता है। अथवा [अभिष्टि worship] तू सच्ची उपासना करनेवाला होता है तथा (विचर्षणिः) = तू विशिष्ट द्रष्टावस्तुओं को ठीक रूप में देखनेवाला होता है। ब्रह्म और क्षत्र का मेल ही ज्ञान और क्रिया का समन्वय है । अकेला ज्ञान पङ्गु है, अकेली क्रिया अन्धी। दोनों का सम्बन्ध मानव-जीवन को पङ्गुत्व व अन्धत्व से ऊपर उठाकर प्रकाशमय व क्रियाशील बनाता है, इसी से उसे महा महिमा प्राप्त होती
है।

भावार्थ -

हम ब्रह्म व क्षत्र का मेल करते हुए अपने जीवन को महत्त्वशाली बनाएँ ।

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