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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 855
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
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ह꣣थो꣢ वृ꣣त्रा꣡ण्यार्या꣢꣯ ह꣣थो꣡ दासा꣢꣯नि सत्पती । ह꣣थो꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣡षः꣢ ॥८५५॥

स्वर सहित पद पाठ

ह꣣थः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । आ꣡र्या꣢꣯ । ह꣣थः꣢ । दा꣡सा꣢꣯नि । स꣣त्पती । सत् । पतीइ꣡ति꣢ । ह꣡थः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ ॥८५५॥


स्वर रहित मन्त्र

हथो वृत्राण्यार्या हथो दासानि सत्पती । हथो विश्वा अप द्विषः ॥८५५॥


स्वर रहित पद पाठ

हथः । वृत्राणि । आर्या । हथः । दासानि । सत्पती । सत् । पतीइति । हथः । विश्वा । अप । द्विषः ॥८५५॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 855
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
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पदार्थ -

इन्द्र और अग्नि आर्य हैं । शक्ति और प्रकाश के तत्त्व हमारे जीवन को आर्य बनाते हैं । (आर्या) = हे हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनानेवाले इन्द्राग्नी ! आप (वृत्राणि) = ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को (हथः) = नष्ट करते हो । इन आवरणों के विनाश से हमारी ज्ञानाग्नि चमक उठती है ।

ये इन्द्राग्नी सत्पती हैं— सत्य का पालन करनेवालों के रक्षक हैं। जीवन को सूर्य-चन्द्रमा की भाँति नियमित गति से ले-चलना ही 'सत्' बनना है । ये इन्द्राग्नी, जोकि (सत्पती) = सत्पुरुषों के रक्षक हैं, ये (दासानि) = [दसु उपक्षये] क्षय के कारणभूत रोगकृमियों को (हथः) = नष्ट करते हैं । रोगकृमियों के विनाश से हमारे शरीर सुन्दर बनते हैं ।

ये इन्द्राग्नी जहाँ ज्ञान की आवरणभूत वासनाओं को नष्ट कर मस्तिष्क को उज्ज्वल बनाते हैं और रोगकृमियों को नष्ट करके शरीर को नीरोग करते हैं, वहाँ मन से भी (विश्वा:) = सब द्विषः-द्वेष की भावनाओं को (अपहथ:) = सुदूर भगा देते हैं । शरीर का मस्तिष्करूप द्युलोक ज्ञान से जगमगा उठता है, स्थूल शरीररूप पृथिवीलोक स्वास्थ्य की दृढ़ता से चमकने लगता है, तो मनरूप अन्तरिक्ष पवित्रता से प्रसन्न हो उठता है । एवं, ये इन्द्राग्नी त्रिलोकी को ही उज्ज्वल कर देते हैं ।

भावार्थ -

इन्द्राग्नी के विकास से हमारी त्रिलोकी उज्ज्वल बन जाए ।

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