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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 906
ऋषिः - भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
आ꣡ प꣢वमान सुष्टु꣣तिं꣢ वृ꣣ष्टिं꣢ दे꣣वे꣢भ्यो꣣ दु꣡वः꣢ । इ꣣षे꣡ प꣢वस्व सं꣣य꣡त꣢म् ॥९०६॥
स्वर सहित पद पाठआ꣢ । प꣣वमान । सुष्टुति꣢म् । सु꣣ । स्तुति꣢म् । वृ꣣ष्टि꣢म् । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । दु꣡वः꣢꣯ । इ꣣षे꣢ । प꣣वस्व । सं꣡यत꣢म् । स꣣म् । य꣡त꣢꣯म् ॥९०६॥
स्वर रहित मन्त्र
आ पवमान सुष्टुतिं वृष्टिं देवेभ्यो दुवः । इषे पवस्व संयतम् ॥९०६॥
स्वर रहित पद पाठ
आ । पवमान । सुष्टुतिम् । सु । स्तुतिम् । वृष्टिम् । देवेभ्यः । दुवः । इषे । पवस्व । संयतम् । सम् । यतम् ॥९०६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 906
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 5; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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विषय - काम-धेनु
पदार्थ -
प्रभु कहते हैं कि – हे (पवमान) = अपने जीवन को पवित्र करनेवाले भृगो ! तू (इषे) =अपनी इच्छाओं व इच्छापूर्ति के लिए [इष् इच्छायाम्] (आपवस्व) = निम्न साधनों को प्राप्त हो - १. (सुष्टुितिम्) = उत्तम स्तुति को । तू सदा प्रभु-स्तवन करनेवाला तो बन ही । लोक में भी सदा स्तुति के ही शब्दों का उच्चारण कर, कभी किसी की निन्दा मत कर । २. (देवेभ्यः वृष्टिम्) = दिव्य गुणवालों के लिए वर्षा को । तू सदा सत्पात्रों में अपने धन की वर्षा करनेवाला बन । तू दान की रुचिवाला हो । ३. (दुवः) = प्रार्थना को। तेरा जीवन प्रार्थनामय हो । यह प्रार्थना तुझे सदा विनीत व निरभिमान बनाएगी। ४. (संयतम्) = तू संयत जीवन को प्राप्त कर अथवा तू उत्तम उद्योगवाला हो । संयम तथा समुद्योग को तू अपने जीवन में धारण कर। ['संयत' संयम्+त; या सं+यत्] एवं, 'स्तुति, दान, प्रार्थना, संयम व समुद्योग' ये वस्तुएँ मिलकर तेरे लिए उस कामधेनु के समान बन जाएँगी जो तेरी सब कामनाओं को पूर्ण कर देगी।
भावार्थ -
हमारा जीवन 'स्तुति, दान, प्रार्थना, संयम व समुद्योग' मय हो ।
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