Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 907
ऋषिः - सुतंभर आत्रेयः
देवता - अग्निः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम -
4
ज꣡न꣢स्य गो꣣पा꣡ अ꣢जनिष्ट꣣ जा꣡गृ꣢विर꣣ग्निः꣢ सु꣣द꣡क्षः꣢ सुवि꣣ता꣢य꣣ न꣡व्य꣢से । घृ꣣त꣡प्र꣢तीको बृह꣣ता꣡ दि꣢वि꣣स्पृ꣡शा꣢ द्यु꣣म꣡द्वि भा꣢꣯ति भर꣣ते꣢भ्यः꣣ शु꣡चिः꣢ ॥९०७॥
स्वर सहित पद पाठज꣡न꣢꣯स्य । गो꣣पाः꣢ । गो꣣ । पाः꣢ । अ꣣जनिष्ट । जा꣡गृ꣢꣯विः । अ꣣ग्निः꣢ । सु꣣द꣡क्षः꣢ । सु꣣ । द꣡क्षः꣢꣯ । सु꣣वि꣡ता꣢य । न꣡व्य꣢꣯से । घृ꣣त꣡प्र꣢तीकः । घृ꣣त꣢ । प्र꣣तीकः । बृहता꣢ । दि꣣विस्पृ꣡शा꣢ । दि꣣वि । स्पृ꣡शा꣢꣯ । द्यु꣣म꣢त् । वि । भा꣣ति । भरते꣡भ्यः꣢ । शु꣡चिः꣢꣯ ॥९०७॥
स्वर रहित मन्त्र
जनस्य गोपा अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे । घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्वि भाति भरतेभ्यः शुचिः ॥९०७॥
स्वर रहित पद पाठ
जनस्य । गोपाः । गो । पाः । अजनिष्ट । जागृविः । अग्निः । सुदक्षः । सु । दक्षः । सुविताय । नव्यसे । घृतप्रतीकः । घृत । प्रतीकः । बृहता । दिविस्पृशा । दिवि । स्पृशा । द्युमत् । वि । भाति । भरतेभ्यः । शुचिः ॥९०७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 907
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 5; खण्ड » 3; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
Acknowledgment
विषय - भरतों में प्रभु का प्रकाश
पदार्थ -
वे प्रभु (नव्यसे) = नवतर, अर्थात् अत्यन्त स्तुत्य [नू स्तुतौ] (सुविताय) = सर्वकल्याण के लिएसबकी शुभगति के लिए [सु+इताय] (अजनिष्ट) = प्रादुर्भूत होते हैं; जो– १. (जनस्य गोपाः) = उत्पन्न होनेवाले प्राणिमात्र के रक्षक हैं, २. (जागृविः) = लोककल्याण के लिए सदा जागरणशील हैं, ३. (अग्निः) = सर्वत्र गमनशील हैं – सबको आगे और आगे ले-चलनेवाले हैं, ४. (सुदक्षः) = समुन्नति व समृद्धि प्राप्त करानेवाले हैं [दक्षति: समर्धयतिकर्मा], ५. (घृतप्रतीकः) = दीप्तिमय मूर्त्तिवाले हैं, सहस्रों सूर्यसम ज्योतिवाले हैं, ६. (बृहता) = महान् (दिविस्पृशा) = द्युलोक को छूनेवाले [तेज से युक्त], (शुचिः) = अत्यन्त पवित्र व दीप्त वे प्रभु, ८. (भरतेभ्यः) = अपने में दिव्यता का व यज्ञिय भावना का भरण करनेवाले लोगों के लिए (द्युमत्) = प्रकाशवत्ता से (विभाति) = विशेषरूप से चमकते हैं, अर्थात् आत्मोन्नति करनेवाले लोगों के लिए प्रकाशित होते हैं – इनके हृदयों को प्रकाश से परिपूर्ण कर देते हैं।
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि'सुतम्भर' = यज्ञ की भावना को अपने अन्दर भरनेवाला अथवा आत्रेय-काम, क्रोध व लोभ से ऊपर उठा हुआ व्यक्ति है। प्रभु इसके हृदय में प्रकाशित होते हैं ।
भावार्थ -
हम 'भरत' बनें, प्रभु हमारे हृदयों में प्रकाशित होंगे ।