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सामवेद के मन्त्र

सामवेद - मन्त्रसंख्या 92
ऋषिः - वामदेव: कश्यप:, असितो देवलो वा देवता - अङ्गिराः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
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इ꣣त꣢ ए꣣त꣢ उ꣣दा꣡रु꣢हन्दि꣣वः꣢ पृ꣣ष्ठा꣡न्या रु꣢꣯हन् । प्र꣢ भू꣣र्ज꣢यो꣣ य꣡था꣢ प꣣थो꣡द्यामङ्गि꣢꣯रसो ययुः ॥९२

स्वर सहित पद पाठ

इ꣣तः꣢ । ए꣣ते꣢ । उ꣣दा꣢रु꣢हन् । उ꣣त् । आ꣡रु꣢꣯हन् । दि꣣वः꣢ । पृ꣣ष्ठा꣡नि꣢ । आ । अ꣣रुहन् । प्र꣢ । भूः꣣ । ज꣡यः꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । प꣣था꣢ । उत् । द्याम् । अ꣡ङ्गि꣢꣯रसः । य꣣युः ॥९२॥


स्वर रहित मन्त्र

इत एत उदारुहन्दिवः पृष्ठान्या रुहन् । प्र भूर्जयो यथा पथोद्यामङ्गिरसो ययुः ॥९२


स्वर रहित पद पाठ

इतः । एते । उदारुहन् । उत् । आरुहन् । दिवः । पृष्ठानि । आ । अरुहन् । प्र । भूः । जयः । यथा । पथा । उत् । द्याम् । अङ्गिरसः । ययुः ॥९२॥

सामवेद - मन्त्र संख्या : 92
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 5; मन्त्र » 2
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 10;
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पदार्थ -

(एते)=सौम्यता आदि वैयक्तिक व गुणग्राहकता आदि सामाजिक गुणों को अपने अन्दर धारण करनेवाले ये व्यक्ति (इतः) = इस पृथिवी-पृष्ठ से (उत्) = ऊपर (आरुहन्) = चढ़ते हैं, (दिव:)= द्युलोक के (पृष्ठानि)=पृष्ठों पर (आरुहन्) = आरूढ़ होते हैं। मनुष्य जीवन का यही लक्ष्य होना चाहिए कि (पृष्ठात्पृथिव्या अहमन्तरिक्षमारुहम्) = पृथिवी-पृष्ठ से मैं अन्तरिक्ष में पहुँचूँ, और (अन्तरिक्षात् दिवम् आरुहम्)=अन्तरिक्ष से मैं द्युलोक में पहुचूँ। इस (दिवो नाकस्य पृष्ठात्) = स्वर्गलोक के पृष्ठरूप द्युलोक से ही तो मैं (स्वर्ज्योतिः अगाम् अहम्) = स्वयं देदीप्यमान् ज्योति ब्रह्म को प्राप्त करूँगा।

(द्याम्)=द्युलोक को (प्र- ययुः) = प्राप्त होते हैं। कौन?

१. (भूर्जयः) = [भूरिति प्राणः, तं जयति] प्राणों का विजय करनेवाला । प्राणों के विजय से सब आसुर भावनाएँ नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। प्राणों के संयम से इन्द्रियों के दोष जल जाते हैं, जैसेकि अग्नि में धातुओं के मल । एवं, प्राणविजय से निर्मल बन हम ऊपर उठते हैं। 

२. (यथा पथः) = [पथं अनतिक्रम्य गच्छति] जो व्यक्ति मार्ग का उल्लंघन न करके चलता है, जिसकी सब क्रियाएँ नपी- तुली होती हैं।

३. (अंगिरसः)=अङ्गरसवाले व्यक्ति, जिनका शरीर सूखे काष्ठ की भाँति निर्जीव न हो गया हो। प्राणायाम और योगमार्ग से चलने का यह परिणाम होगा कि हम अपने नवें तथा दसवें दशक तक भी स्निग्ध त्वचावाले, सरस अङ्गोवाले बने रहेंगे, हम नवग्व व दशग्व होंगे । [नवदशकपर्यन्तं गच्छतीति नवग्व:]। इसी प्रकार अंगिरस वही व्यक्ति हो सकता है जो विषयों का शिकार नहीं बनता। विषय तो उसे शीघ्र ही जीर्ण-शीर्ण शरीरवाला बना देंगे। 

भावार्थ -

हम प्राणों को वश में करनेवाले, योगमार्ग से चलनेवाले, अङ्गों को शक्ति-सम्पन्न रखनेवाले बनें और द्युलोक में पहुँचें ।

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