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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 957
ऋषिः - त्रय ऋषयः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - जगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम -
3
ई꣣शान꣢ इ꣣मा꣡ भुव꣢꣯नानि꣣ ई꣡य꣢से युजा꣣न꣡ इ꣢न्दो ह꣣रि꣡तः꣢ सुप꣣꣬र्ण्यः꣢꣯ । ता꣡स्ते꣢ क्षरन्तु꣣ म꣡धु꣢मद्घृ꣣तं꣢꣫ पय꣣स्त꣡व꣢ व्र꣣ते꣡ सो꣢म तिष्ठन्तु कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ ॥९५७॥
स्वर सहित पद पाठई꣣शानः꣢ । इ꣣मा꣢ । भु꣡व꣢꣯नानि । ई꣡य꣢꣯से । यु꣣जानः꣢ । इ꣣न्दो । हरि꣡तः꣢ । सुप꣢र्ण्यः । सु꣣ । पर्ण्यः꣢ । ताः । ते꣢ । क्षरन्तु । म꣡धुम꣢꣯त् । घृ꣣त꣢म् । प꣣यः꣢ । त꣡व꣢꣯ । व्र꣣ते꣢ । सो꣣म । तिष्ठन्तु । कृष्ट꣡यः꣢ ॥९५७॥
स्वर रहित मन्त्र
ईशान इमा भुवनानि ईयसे युजान इन्दो हरितः सुपर्ण्यः । तास्ते क्षरन्तु मधुमद्घृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः ॥९५७॥
स्वर रहित पद पाठ
ईशानः । इमा । भुवनानि । ईयसे । युजानः । इन्दो । हरितः । सुपर्ण्यः । सु । पर्ण्यः । ताः । ते । क्षरन्तु । मधुमत् । घृतम् । पयः । तव । व्रते । सोम । तिष्ठन्तु । कृष्टयः ॥९५७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 957
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
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विषय - प्रभु की आज्ञा का पालन
पदार्थ -
हे (इन्दो) = परमैश्वर्यवन् ! (सोम) = सम्पूर्ण जगत् को जन्म देनेवाले प्रभो ! आप १. (ईशान:) = सारे ब्रह्माण्ड के ईशान [Lord] हो । २. आप (इमा भुवनानि) = इन सब भुवनों को (ईयसे) = प्राप्त होते हो [प्रभु का विचरना भी स्थिरता लिये हुए है], ३. (हरितः) = सब दुःखों का हरण करनेवाले, (अतएव) = मनोहर (सुपर्ण्यः) = उत्तम पालक वस्तुओं का (युजान:) = सबके साथ योग करनेवाले हो । प्रभु दुःखहारक, पालक वस्तुओं को प्राप्त करानेवाले हैं। ४. (ते) = आपके (ताः) = वे सब उत्तम पदार्थ (मधुमत्) = माधुर्य से युक्त (घृतम्) = दीप्ति प्राप्त करानेवाले (पयः) = आप्यायन को (क्षरन्तु) = प्राप्त कराएँ । उन पदार्थों के यथोचित प्रयोग से हमारा माधुर्य व दीप्ति से युक्त वर्धन हो । ५. हे प्रभो ! (कृष्टयः) = श्रमशील व्यक्ति (तव व्रते) = आपके व्रत में (तिष्ठन्तु) = ठहरें, आपकी वेदोपदिष्ट आज्ञाओं का पालन करें। जो व्यक्ति माषों की फली आदि सांसारिक वस्तुओं की छीना-झपटी में सारा समय नहीं बिता देते वे 'अकृष्टमाष' ही प्रभु की आज्ञा का पालन करते हैं, वे ही इन मन्त्रों के ऋषि हैं ।
भावार्थ -
प्रभु ही ईशान हैं । हम उनके व्रतों में ही चलें तभी हमारा जीवन माधुर्य, दीप्ति व वृद्धि को लिये हुए होगा ।
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