Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 991
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्राग्नी
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
4
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी यु꣣वा꣢मि꣣मे꣢३ऽभि꣡ स्तोमा꣢꣯ अनूषत । पि꣡ब꣢तꣳ शम्भुवा सु꣣त꣢म् ॥९९१॥
स्वर सहित पद पाठइ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अग्नी꣣इ꣡ति꣢ । यु꣣वा꣢म् । इ꣣मे꣢ । अ꣣भि꣢ । स्तो꣡माः꣢꣯ । अ꣣नूषत । पि꣡ब꣢꣯तम् । श꣣म्भुवा । शम् । भुवा । सुत꣢म् ॥९९१॥
स्वर रहित मन्त्र
इन्द्राग्नी युवामिमे३ऽभि स्तोमा अनूषत । पिबतꣳ शम्भुवा सुतम् ॥९९१॥
स्वर रहित पद पाठ
इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । युवाम् । इमे । अभि । स्तोमाः । अनूषत । पिबतम् । शम्भुवा । शम् । भुवा । सुतम् ॥९९१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 991
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
Acknowledgment
विषय - इन्द्राग्नी का सोमपान
पदार्थ -
जिन प्राणापान को ऊपर मित्रावरुण शब्द से स्मरण किया था वे ही यहाँ 'इन्द्राग्नी' नाम से स्मरण किये गये हैं। इन्द्र बल की देवता है तो अग्नि प्रकाश की । इन्द्र देवता प्रस्तुत मन्त्रों के ऋषि को ‘ भारद्वाज’=शक्ति-सम्पन्न बनाती है तो 'अग्निदेवता' उसे प्रकाश व ज्ञान से युक्त करके 'बार्हस्पत्य' बनाती है। इस प्रकार इसके 'क्षत्र व ब्रह्म' दोनों का ही विकास होता है। इन दोनों तत्त्वों के लिए ही शरीर में सोम का विनियोग होता है। सोम शरीर में बल बढ़ाता है और मस्तिष्क में ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है ।
हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश की देवताओ ! (युवाम्) = तुम दोनों को (इमे स्तोमा:) = ये स्तुतिसमूह (अभ्यनूषत) = प्रशंसित करते हैं । वेदमन्त्रों में क्षेत्र व ब्रह्म की ही प्रशंसा है- बल तथा ज्ञान के सम्पादन पर ही बल दिया गया है। ये दोनों ही मनुष्य को आदर्श मनुष्य बनाते हैं। (शंभुवा) = ये दोनों ही जीवन में शान्ति को जन्म देनेवाले हैं। ये दोनों (सुतम्) = उत्पन्न सोमरस का (पिबतम्) = पान करें। शरीर में उत्पन्न सोम शरीर तथा मस्तिष्क के निर्माण में ही विनियुक्त हो ।
भावार्थ -
मैं सोम को शरीर में इस प्रकार खपाऊँ कि बलवान् बनकर 'इन्द्र' बनूँ और प्रकाशमय जीवनवाला बनकर 'अग्नि' बनूँ |