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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 990
ऋषिः - कुरुसुतिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
3
वा꣡च꣢म꣣ष्टा꣡प꣢दीम꣣हं꣡ नव꣢꣯स्रक्तिमृता꣣वृ꣡ध꣢म् । इ꣢न्द्रा꣣त्प꣡रि꣢त꣣꣬न्वं꣢꣯ ममे ॥९९०॥
स्वर सहित पद पाठवा꣡च꣢꣯म् । अ꣣ष्टा꣡प꣢दीम् । अ꣣ष्ट꣢ । प꣣दीम् । अह꣢म् । न꣡व꣢꣯स्रक्तिम् । न꣡व꣢꣯ । स्र꣣क्तिम् । ऋतावृ꣡ध꣢म् । ऋ꣣त । वृ꣡ध꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯त् । प꣡रि꣢꣯ । त꣢न्वम् । म꣣मे ॥९९०॥
स्वर रहित मन्त्र
वाचमष्टापदीमहं नवस्रक्तिमृतावृधम् । इन्द्रात्परितन्वं ममे ॥९९०॥
स्वर रहित पद पाठ
वाचम् । अष्टापदीम् । अष्ट । पदीम् । अहम् । नवस्रक्तिम् । नव । स्रक्तिम् । ऋतावृधम् । ऋत । वृधम् । इन्द्रात् । परि । तन्वम् । ममे ॥९९०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 990
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 9; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 3; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
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विषय - अष्टापदी वाक्
पदार्थ -
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कुरुसुति काण्व' है - कण-कण करके सोम का अपने अन्दर उत्पादन करनेवाला है । यह कहता है कि (अहम्) = मैं (इन्द्रात्) - उस ज्ञानरूप परमैश्वर्यवाले प्रभु से (वाचम्) - वाणी को (परिममे) = अपने अन्दर निर्मित करता हूँ । किस वाणी को -
१. (अष्टापदीम्) = [क] [अष्टापदी दिग्भिः, अवान्तर दिग्भिः च- - यास्क० ११.४०] आठों दिशाओं में, अर्थात् सर्वत्र व्याप्त । सर्वत्र-सब लोक-लोकान्तरों में प्रभु ने इसी वाणी का तो उपदेश दिया है। [ख] अथवा नाम, धातु, अव्यय, उपसर्ग, स्वर, व्यञ्जन, अनुस्वार, विसर्गरूप आठ पदोंवाली—Eight parts of speech वाली । २. (नवस्त्रक्तिम्) = [क] [नू=स्तुतौ] प्रभु-स्तवन का सृजन करनेवाली [सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ] – सारे वेद उसी प्रभु का तो स्तवन कर रहे हैं। [ख] अथवा नव निधियों का – सब शक्तियों का सृजन करनेवाली । ३. (ऋतावृधम्) = सत्य का वर्धन करनेवाली । ४. (तन्वम्) = सूक्ष्म, अर्थात् जिसमें सब विद्याएँ बीजरूप से निहित हैं ।
भावार्थ -
मैं सोम की रक्षा करता हुआ वेदवाणी को अपनानेवाला बनूँ ।
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