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अथर्ववेद > काण्ड 20 > सूक्त 10

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  • अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 10/ मन्त्र 1
    सूक्त - मेध्यातिथिः देवता - इन्द्रः छन्दः - प्रगाथः सूक्तम् - सूक्त-१०

    उदु॒ त्ये मधु॑मत्तमा॒ गिर॒ स्तोमा॑स ईरते। स॑त्रा॒जितो॑ धन॒सा अक्षि॑तोतयो वाज॒यन्तो॒ रथा॑ इव ॥

    स्वर सहित पद पाठ

    उत् । ऊं॒ इति॑ । त्ये । मधु॑मत्ऽतमा: । गिर॑: । स्तोमा॑स: । ई॒र॒ते॒ ॥ स॒त्रा॒जित॑: । ध॒न॒ऽसा: । अक्षि॑तऽऊतय: । वा॒ज॒ऽयन्त॑: । रथा॑:ऽइव ॥१०.१॥


    स्वर रहित मन्त्र

    उदु त्ये मधुमत्तमा गिर स्तोमास ईरते। सत्राजितो धनसा अक्षितोतयो वाजयन्तो रथा इव ॥

    स्वर रहित पद पाठ

    उत् । ऊं इति । त्ये । मधुमत्ऽतमा: । गिर: । स्तोमास: । ईरते ॥ सत्राजित: । धनऽसा: । अक्षितऽऊतय: । वाजऽयन्त: । रथा:ऽइव ॥१०.१॥

    अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 10; मन्त्र » 1

    भावार्थ -
    हे इन्द्र परमेश्वर ! (सत्राजितः) एक ही बार की चढ़ाई में शत्रुओं को जीत लेने वाले, (धनसाः) नाना ऐश्वर्यों के देने वाले, (अक्षि तोतयः) अक्षय, रक्षा करने में समर्थ, दृढ़ रक्षक, दृढ़ रक्षा साधनों से युक्त, (वाजयन्तः) बल वीर्यशाली, परस्पर संग्राम करते हुए (रथाः इव) रथ या रथ वाले महारथी लोग जिस प्रकार (उद् ईरते) उठते हैं, और बढ़े चले जाते हैं उसी प्रकार (त्ये) वे (मधुमत्तमाः) अत्यन्त मधुर (स्तोमासः) स्तुतिमय (गिरः) वाणियें (उद् ईरते) हृदय से उठती हैं।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - मेध्यातिथि र्ऋषिः। इन्द्रो देवता। प्रगाथे। द्वयृचं सूक्तम्।

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