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अथर्ववेद - काण्ड 20/ सूक्त 3/ मन्त्र 1
आ या॑हि सुषु॒मा हि त॒ इन्द्र॒ सोमं॒ पिबा॑ इ॒मम्। एदं ब॒र्हिः स॑दो॒ मम॑ ॥
स्वर सहित पद पाठआ । या॒हि॒ । सु॒सु॒म । हि । ते॒ । इन्द्र॑ । सोम॑म् । पिब॑ । इ॒मम् । आ । इ॒दम् । ब॒र्हि: । स॒द॒: । मम॑ ॥३.१॥
स्वर रहित मन्त्र
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्। एदं बर्हिः सदो मम ॥
स्वर रहित पद पाठआ । याहि । सुसुम । हि । ते । इन्द्र । सोमम् । पिब । इमम् । आ । इदम् । बर्हि: । सद: । मम ॥३.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 20; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
विषय - परमेश्वर और राजा का वर्णन।
भावार्थ -
हे (इन्द्र) इन्द्र परम ऐश्वर्यवन् ! राजन् ! (ते) तेरे लिये ही (सोमम्) सोम, राष्ट्र का हम (सुषुम) सेवन करते हैं। तू (आयाहि) हमें प्राप्त हो। तू (इमम्) इसको (पिब) पान कर। (इदम्) यह (मम) मेरा (बर्हिः) दिया आसन है। इस पर (आसदः) आ विराज। अथवा—(इदं मम सदः) यह मेरा विराजने योग्य (बर्हिः) आसन है इस पर विराजो। अथवा राजन् ! (आयाहि) आ। तेरे लिये (सोमं सुषुम) सोम रूप राष्ट्र का सम्पादन, अभिषेक द्वारा प्रदान करते हैं, विजय करते हैं। इसका (पिब) पालन कर या उपयोग कर। यह (बर्हिः सदः) बड़ा भारी सभा भवन है।
टिप्पणी -
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ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - इरिम्बिठिर्ऋषिः। इन्द्रो देवता। गायत्र्यः। तृचं सूक्तम्॥
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