Sidebar
अथर्ववेद - काण्ड 7/ सूक्त 34/ मन्त्र 1
अग्ने॑ जा॒तान्प्र णु॑दा मे स॒पत्ना॒न्प्रत्यजा॑ताञ्जातवेदो नुदस्व। अ॑धस्प॒दं कृ॑णुष्व॒ ये पृ॑त॒न्यवोऽना॑गस॒स्ते व॒यमदि॑तये स्याम ॥
स्वर सहित पद पाठअग्ने॑ । जा॒तान् । प्र । नु॒द॒ । मे॒ । स॒ऽपत्ना॑न् । प्रति॑ । अजा॑तान् । जा॒तऽवे॒द॒: । नु॒द॒स्व॒ । अ॒ध॒:ऽप॒दम् । कृ॒णु॒ष्व॒ । ये । पृ॒त॒न्यव॑: । अना॑गस: । ते । व॒यम्। अदि॑तये । स्या॒म॒ ॥३५.१॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्ने जातान्प्र णुदा मे सपत्नान्प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व। अधस्पदं कृणुष्व ये पृतन्यवोऽनागसस्ते वयमदितये स्याम ॥
स्वर रहित पद पाठअग्ने । जातान् । प्र । नुद । मे । सऽपत्नान् । प्रति । अजातान् । जातऽवेद: । नुदस्व । अध:ऽपदम् । कृणुष्व । ये । पृतन्यव: । अनागस: । ते । वयम्। अदितये । स्याम ॥३५.१॥
अथर्ववेद - काण्ड » 7; सूक्त » 34; मन्त्र » 1
विषय - शत्रु पराजय की प्रार्थना।
भावार्थ -
हे (अग्ने) अग्ने ! विद्वन् ! राजन् ! प्रभो ! तू ( मे) मेरे (जातान्) उत्पन्न हुए (स-पत्नान् ) शत्रुओरं को (प्र णुद ) दूर कर। और हे (जात-वेदः) समस्त उत्पन्न हुए पदार्थी को जानने हारे विद्वन् ! (अज्ञातान्) तू उन को भी जो अभी शत्रु बने नहीं हुए प्रत्युत उनके शत्रु बन जाने के लक्षण दीख रहे हों उन को भी (प्रति नुदस्व) दूर कर। और ( ये ) जो ( पृतन्यवः) सेना लेकर मुझ पर चढ़ाई करने के उद्योग में हैं उनको (अधःपदम्) मेरे चरण के नीचे, या मेरे से नीचे स्थान पर, मेरे से कम योग्यता और कम मान, प्रतिष्ठा वाला (कृणुष्व) कर। (ते अदितये) तुझ अखण्डनीय शासन करने वाले राजा के लिये (वयम्) हम प्रजागण सदा (अनागसः) निरपराध (स्याम) रहें।
टिप्पणी -
‘प्रणुद नः सपत्नात्’, ‘नुद जातवेद’ इति यजु० । उत्तरार्धस्तु यजुषि ‘अधि नो ब्रूहि सुमता अहेडंस्तवस्याम शर्मस्त्रिवरूथ उद्भौ’। इति यजु०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर - अथर्वा परमेष्ठी च ऋषिः। जातवेदो देवता। जगती छन्द। एकर्चं सूक्तम॥
इस भाष्य को एडिट करें