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ऋग्वेद मण्डल - 2 के सूक्त 18 के मन्त्र
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  • ऋग्वेद - मण्डल 2/ सूक्त 18/ मन्त्र 9
    ऋषिः - गृत्समदः शौनकः देवता - इन्द्र: छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः

    नू॒नं सा ते॒ प्रति॒ वरं॑ जरि॒त्रे दु॑ही॒यदि॑न्द्र॒ दक्षि॑णा म॒घोनी॑। शिक्षा॑ स्तो॒तृभ्यो॒ माति॑ ध॒ग्भगो॑ नो बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥

    स्वर सहित पद पाठ

    नू॒नम् । सा । ते॒ । प्रति॑ । वर॑म् । जरि॒त्रे । दु॒ही॒यत् । इ॒न्द्र॒ । दक्षि॑णा । म॒घोनी॑ । शिक्ष॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । मा । अति॑ । ध॒क् । भगः॑ । नः॒ । बृ॒हत् । व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीराः॑ ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी। शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    नूनम्। सा। ते। प्रति। वरम्। जरित्रे। दुहीयत्। इन्द्र। दक्षिणा। मघोनी। शिक्ष। स्तोतृऽभ्यः। मा। अति। धक्। भगः। नः। बृहत्। वदेम। विदथे। सुऽवीराः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 2; सूक्त » 18; मन्त्र » 9
    अष्टक » 2; अध्याय » 6; वर्ग » 22; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथेश्वरोपदेशकगुणानाह।

    अन्वयः

    हे इन्द्र जगदीश्वर सत्योपदेशक वा ते तव सा जरित्रे वरं दक्षिणा मघोनी स्तोतृभ्यः प्रतिदुहीयत्। त्वमस्मान्नूनं शिक्ष नो भगो मातिधग्यतः सुवीरा वयं विदथे बृहद्वदेम ॥९॥

    पदार्थः

    (नूनम्) (सा) धारणा (ते) तव (प्रति) (वरम्) (जरित्रे) (दुहीयत्) (इन्द्र) (दक्षिणा) (मघोनी) (शिक्षा) (स्तोतृभ्यः) अध्यापकेभ्यः (मा) (अति) धक् (भगः) ऐश्वर्यम् (नः) अस्मान् (बृहत्) (वदेम) (विदथे) विद्याप्रचारे (सुवीराः) ॥९॥

    भावार्थः

    या भगवत आप्तानां विदुषां शिक्षा मनुष्यान् प्राप्नोति सा शोकसागरात् पृथक् करोति महदैश्वर्यमपि नाभिमानयतीति ॥९॥ अत्र यानपदार्थेश्वरविद्वदुपदेशकबोधवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिर्वेद्या ॥ इत्यष्टादशं सूक्तं द्वाविंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

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    हिन्दी (3)

    विषय

    अब ईश्वर और उपदेशकों के गुणों को कहते हैं।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) जगदीश्वर वा सत्योपदेशक ! (ते) आपकी (सा) वह धारणा (जरित्रे) स्तुति प्रशंसा करनेवाले के लिये और (दक्षिणा) विद्या सुशिक्षा रूपी दक्षिणा (मघोनी) जो कि बहुत ऐश्वर्ययुक्त है वह (स्तोतृभ्यः) अध्यापकों के लिये (प्रति,दुहीयत्) प्रत्येक विषय को परिपूर्ण करती है। आप हम लोगों को (नूनम्) निश्चय से (शिक्ष) शिक्षा देओ नः हम लोगों के लिये (भगः) ऐश्वर्य को (माति,धक्) मत नष्ट करो जिससे (सुवीराः) श्रेष्ठ वीरोंवाले हम लोग (विदथे) विद्याप्रचार में (बृहत्) बहुत कुछ (वदेम) कहें ॥९॥

    भावार्थ

    जो ईश्वर और आप्त विद्वानों की शिक्षा मनुष्यों को प्राप्त होती है, वह शोकरूपी समुद्र से अलग करती है और बहुत ऐश्वर्य का भी अभिमान नहीं कराती है ॥९॥ यहाँ यान, पदार्थ, ईश्वर, विद्वान् वा उपदेशकों के बोध का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अठारहवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥

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    विषय

    खूब स्तवन

    पदार्थ

    यह व्याख्या २.११.२१ पर देखिए ।सूक्त का भाव यह है कि यह शरीररथ प्रभुप्राप्ति के लिए दिया गया है, प्रभु की ओर ही हम चलनेवाले बनें। सोमरक्षण से इस रथ को ठीक बनाये रखें और प्रभुप्रियता में सदा विजयी हों। अगला सूक्त इसीलिये सोमपान का आदेश देता है

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    विषय

    विद्वान् और वीर का वर्णन ।

    भावार्थ

    व्याख्या देखो सू० १७॥९॥ इति द्वाविंशो वर्गः ॥

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    गृत्समद ऋषिः ॥ इन्द्रो देवता ॥ छन्दः—१ पङ्क्तिः । ४, ८ भुरिक् पङ्क्तिः । ५, ६ स्वराट् पङ्क्तिः । ७ निचृत् पङ्क्तिः २, ३, ९ त्रिष्टुप् ॥ नवर्चं सूक्तम् ॥

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ईश्वर व आप्त विद्वानांकडून जे शिक्षण माणसांना प्राप्त होते ते माणसांना शोकरूपी समुद्रापासून पृथक करते व ऐश्वर्याचा अभिमानीही बनवीत नाही. ॥ ९ ॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Indra, generous lord of wealth and power, honour and victory, may that magnificent generosity and kindness of your grace ever flow abundantly for us and bestow upon the singer celebrant and the disciples sure gifts of their favourite choice. And may your teaching and knowledge and your grandeur ever shine for the admirers but never burn the love, desire and self- confidence of the devotees. And may we, brave and blest with the brave, ever celebrate your heavenly glory in our noblest yajnic projects of life.

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    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The qualities of the Almighty and the Preacher are mentioned.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O Almighty God or Preacher of Truth ! you shower your teachings and knowledge on those who admire you and are much prosperous. Your knowledge makes the teacher full of all types of learning You impart us such teachings in order to have prosperous life and it never ruin us. With your blessing, we shall do much to propagate learning in the company of nice brave people.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    The learnings received from God and scholars keep human beings aloof from miseries and sorrows. Such people never become proud of their achievements.

    Foot Notes

    (जरिने) स्तोत्रे | For the admirer. (स्तोतृभ्यः) अध्यापकेभ्यः = For the teacher. (विदथे) विद्याप्रचारे = In the propagation of learning.

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