Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 3 के सूक्त 9 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8 9
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 3/ सूक्त 9/ मन्त्र 2
    ऋषिः - गाथिनो विश्वामित्रः देवता - अग्निः छन्दः - निचृद्बृहती स्वरः - मध्यमः

    काय॑मानो व॒ना त्वं यन्मा॒तॄरज॑गन्न॒पः। न तत्ते॑ अग्ने प्र॒मृषे॑ नि॒वर्त॑नं॒ यद्दू॒रे सन्नि॒हाभ॑वः॥

    स्वर सहित पद पाठ

    काय॑मानः । व॒ना । त्वम् । यत् । मा॒तॄः । अज॑गन् । अ॒पः । न । तत् । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । प्र॒ऽमृषे॑ । नि॒ऽवर्त॑नम् । यत् । दू॒रे । सन् । इ॒ह । अभ॑वः ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः। न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद्दूरे सन्निहाभवः॥

    स्वर रहित पद पाठ

    कायमानः। वना। त्वम्। यत्। मातॄः। अजगन्। अपः। न। तत्। ते। अग्ने। प्रऽमृषे। निऽवर्तनम्। यत्। दूरे। सन्। इह। अभवः॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 3; सूक्त » 9; मन्त्र » 2
    अष्टक » 3; अध्याय » 1; वर्ग » 5; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    विद्यार्थी कं प्राप्य सुखी भवतीत्याह।

    अन्वयः

    हे अग्ने कायमानः सँस्त्वं यन्मातॄरपोऽजगन्यन्निवर्त्तनं दूरे प्रक्षिपेर्मङ्गलायेहाभवस्तत्तस्मात्ते सकाशादहं वना प्रमृषे मत्तस्त्वं दूरे न भवेः ॥२॥

    पदार्थः

    (कायमानः) अध्यापयन्नुपदिशन् वा (वना) वनानि याचनीयानि (त्वम्) (यत्) यतः (मातॄः) मातर इव पालिकाः (अजगन्) प्राप्नुयाः (अपः) प्राणान् (न) (तत्) तस्मात् (ते) तव (अग्ने) शुभगुणैः प्रकाशमान (प्रमृषे) सुखैः संयोजयेः (निवर्त्तनम्) अन्यायाचरणात्पृथग्भवनम् (यत्) यस्मात् (दूरे) (सन्) (इह) (अभवः) भवेः ॥२॥

    भावार्थः

    यथा तृषातुरो जलं प्राप्य तृप्यति तथैवाप्तमध्यापकमुपदेशकं वा लब्ध्वा विद्याभिलाषी सर्वतः सुखी भवति ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    विद्यार्थी किसको पाकर सुखी होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

    पदार्थ

    हे (अग्ने) शुभगुणों से प्रकाशमान सज्जन ! (कायमानः) पढ़ाते वा उपदेश करते (सन्) हुए (त्वम्) आप (यत्) जिससे (मातृः) माताओं के तुल्य रक्षक वा प्रिय (अपः) प्राणों को (अजगन्) प्राप्त होवें। और (यत्) जिससे (निवर्त्तनम्) अन्यायाचरण से पृथक् होने को (दूरे) दूर फेंकिये और मङ्गल के अर्थ (इष्ट) यहाँ (अभवः) हूजिये (तत्) इससे (ते) आपसे मैं (वना) माँगने योग्य पदार्थों को (प्रमृषे) सुखों से संयुक्त करूँ और मुझसे आप दूर न हूजिये ॥२॥

    भावार्थ

    जैसे प्यासा जन जल को पा के तृप्त होता, वैसे ही आप्त, अध्यापक और उपदेशक को विद्यार्थी जन प्राप्त हो के सब ओर से सुखी होता है ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    निवर्तन की अवाञ्छनीयता -

    पदार्थ

    [१] प्रभु जीव से कहते हैं– गतमन्त्र के अनुसार (वना) = उपासना की वृत्ति को तथा ज्ञानरश्मियों को (कायमानः) = (कामयमानः) चाहता हुआ (त्वम्) = तू (यत्) = जो (मातृः) = धन का निर्माण करनेवाले (अपः) = कर्मों को (अजगन्) = प्राप्त हुआ है, अतः हे अग्ने प्रगतिशील जीव! (ते) = तेरे (तत्) = उस (निवर्तनम्) = फिर लौट जाने को (न प्रमृषे) = मैं सह नहीं सकता क्षमा नहीं कर सकता। तेरा वह कार्य ठीक नहीं। वानप्रस्थ व संन्यास में जाकर फिर गृहस्थ में लौट आने की तरह यह तेरा कार्य है। [२] संसार बड़ा चमकीला है। न जाने कब यह हमें अपनी ओर आकृष्ठ करले। हम प्रभु की उपासना की ओर चलते हैं, परन्तु हो सकता है कि धन अपनी चमक से हमें फिर अपनी ओर झुका ले। इसलिए सदा सावधान रहने की आवश्यकता है। प्रभु कहते हैं कि यह '(यत्) = जो तू (दूरे सन्) = इन विषयों से दूर जाकर (इह अभवः) = फिर यहीं हो गया' यह ठीक नहीं है। विषयों को तो छोड़ना और फिर दृढ़ता से छोड़ ही देना ठीक है। फिर उनकी ओर न झुकना चाहिए।

    भावार्थ

    भावार्थ- उपासना व ज्ञान की कामनावाले बनकर हम आगे बढ़ें और फिर विषयों से विनिवृत्त ही हो जाएँ। इन विषयों की चमक हमें फिर वापिस आकर्षित न करले।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    जलों में विद्युत्, काष्ठों में अग्निवत् विद्वान् वीर नायक की स्थिति।

    भावार्थ

    जिस प्रकार अग्नि (कायमानः) मानो चाहता हुआ, कान्तिमान् होकर (वना अजगन्) वनों में लगता और विद्युत् रूप से (अपः अजगन्) जलों को भी प्राप्त है। और उसका जिस प्रकार (निवर्त्तनं) बुझ जाना असह्य हो जाता है, अग्निस्वयं (दूरे सन् इह अभवः) दूर रहकर भी प्रकाश रूप से समीप हो जाता है उसी प्रकार हे (अझै) ज्ञानवन् ! विद्वन् ! (त्वं) तू (वना) सेवन करने योग्य ज्ञानों को (कायमानः) चाहता हुआ देता हुआ (यः) जो तू (मातॄः अपः) माता के समान स्नेहवान् वा उत्तम ज्ञानी आप्त पुरुषों को (अजगन्) प्राप्त हो, हे अग्ने ! विद्वन् ! एवं विनयशील ! (ते) तेरे (तत्) उस (निवर्त्तनम्) विद्याभ्यास के पथ से ‘निवर्त्तन’ लौट आने को मैं (न प्र मृषे) कभी सहन न करूं । (यत्) जो तू (दूरे सन्) दूर रहकर (इह अभवः) फिर यहां रहता अर्थात् विद्याभिलाषी, विद्यार्थी उत्तम ज्ञानों को चाहता हुआ मातृतुल्य विद्वान् गुरुओं को जाए, वह अधबीच में न लौटे, दूर रहकर बाद घर में आवे। (२) आचार्य के पक्ष में—वह (वना कायमानः) सेव्य ज्ञानों का उपदेश करता हुआ उत्तम ज्ञाता आप्त शिष्यों को, प्राणों को आत्मा के समान प्राप्त हो। गुरु का (निवर्त्तन) शिष्यों को अधर्म कार्यों से हटाना यह भी (तत् प्रमृषे) उत्तम तितिक्षा के लिये ही है। वह (दूरे सन्) दूर रहकर भी, देशान्तर में भी हो तो (इह अभवः) प्रेमवश हमारे पास ही रहे। (३) राष्ट्रनायक (वना) सेवनीय ऐश्वर्यो को चाहता हुआ अपने राजनिर्माता आप्त प्रजाजनों को प्राप्त करे। उसका प्रजा को कुपथ से हटाये रखना ही उत्तम तितिक्षा है। वह दूर रहकर प्रजा में दण्ड रूप से रहे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    विश्वामित्र ऋषिः॥अग्निदेवता॥ छन्दः- १, ४ बृहती। २, ५, ६, ७ निचृद् बृहती। ३, ८ विराड् बृहती। ९ स्वराट् पङ्क्ति॥ नवर्चं सूक्तम्॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा तृषार्त मानव जल प्राप्त करून तृप्त होतो, तसेच आप्त, अध्यापक व उपदेशक यांना विद्यार्थी मिळाल्यामुळे सर्वस्वी सुखी होतात. ॥ २ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Agni, lord and lover of light and knowledge, giver of light and knowledge, when you go to the waters, vibrant mother sources of light and energy, that going away is not to be endured, nor to be forgotten or neglected, because while you are away, you are still near at hand with your light. Hence I have the best that is worthy of love and value from you.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    The source of happiness for a student is indicated.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O learned person ! you are shining like fire with your noble virtues. While teaching or preaching you achieve the Pranas (vital breaths) which protect you like mother. Having thrown away all going astray from the dealing of justice, you are ready for auspicious or beneficent actions. I unite happily all desirable objects, received from you. Please don't go far away from me.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    As a thirsty person quenches his thirst and satisfies it after drinking water, in the same manner, a seeker after knowledge becomes very glad after getting an absolutely truthful enlightened teacher or preacher.

    Foot Notes

    (कायमानः) अध्यापयन्नुपदिशन् वा। = Teaching or preaching. (वना) वनानि याचनीयानि (वस्तूनि)। = Desirable objects (the things to be asked for). (प्रमुषे ) सुखैः संयोजये। = I unite with happiness. (अप) प्राणान् । आपो वै प्राणा: (भेषजम् ) जैमिनीयोपनिषद् -ब्राह्मणे 3, 10, 9 Stph. 3, 8, 2, 4) = Vital breaths.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top