ऋग्वेद मण्डल - 7 के सूक्त 38 के मन्त्र
1 2 3 4 5 6 7 8

मन्त्र चुनें

  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 7/ सूक्त 38/ मन्त्र 1
    ऋषि: - वसिष्ठः देवता - सविता छन्दः - निचृत्त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः
    पदार्थ -

    (यः) जो (भगः) सेवन करने योग्य सकलैश्वर्ययुक्त (पुरूवसुः) बहुत धनोंवाला (सविता) सकलैश्वर्य देने हारा (देवः) दाता ईश्वर (मानुषेभिः) मनुष्यों से (नूनम्) निश्चय से (हव्यः) स्तुति करने योग्य है जो हम लोगों के कामों को (वि, दधाति) सिद्ध करता है (स्यः) वह जगदीश्वर (उ) ही (याम्) जिस (हिरण्ययीम्) हिरण्यादि रत्नोंवाली (अमतिम्) सुन्दर रूपवती लक्ष्मी को तथा (रत्ना) रमण करने योग्य धनों को हमारे लिये (अशिश्रेत्) आश्रय करता है, उसका हम लोग (उत्, ययाम) उत्तम नियम पालें ॥१॥

    भावार्थ -

    जो मनुष्य परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥१॥

    अन्वय -

    यो भगो पुरूवसुः सविता देव ईश्वरो मानुषेभिर्नूनं हव्योऽस्ति योऽस्माकं कामान् विदधाति स्य उ यां हिरण्ययीममतिं रत्ना चास्मदर्थमशिश्रेत् तं वयमुद्ययाम ॥१॥

    पदार्थ -

    (उत्) (उ) (स्यः) स पूर्वोक्तः जगदीश्वरः (देवः) दाता (सविता) सकलैश्वर्यप्रदः (ययाम) प्राप्नुयाम (हिरण्ययीम्) हिरण्यादिप्रचुराम् (अमतिम्) सुरूपां श्रियम् (याम्) (अशिश्रेत्) आश्रयेत् (नूनम्) निश्चितम् (भगः) भजनीयः सकलैश्वर्ययुक्तः (हव्यः) स्तोतुमर्हः (मानुषेभिः) मनुष्यैः (वि) विशेषेण (यः) (रत्ना) रमणीयानि धनानि (पुरूवसुः) पुरूणि बहूनि वसूनि धनानि यस्य स। अत्र संहितायामित्याद्यपदस्य दैर्घ्यम्। (दधाति) निष्पादयति ॥१॥

    भावार्थ -

    ये मनुष्याः परमेश्वरमुपासते श्रेष्ठां श्रियं लभन्ते ॥१॥

    भावार्थ -

    भावार्थ - जी माणसे परमेश्वराची उपासना करतात ती श्रेष्ठ धन प्राप्त करतात. ॥ १ ॥

    कृपया कम से कम 20 शब्द लिखें!
    Top