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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1012
    ऋषिः - कृतयशा आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    23

    आ꣡ व꣢च्यस्व सुदक्ष च꣣꣬म्वोः꣢꣯ सु꣣तो꣢ वि꣣शां꣢꣫ वह्नि꣣र्न꣢ वि꣣श्प꣡तिः꣢ । वृ꣣ष्टिं꣢ दि꣣वः꣡ प꣢वस्व री꣣ति꣢म꣣पो꣢꣫ जिन्व꣣न्ग꣡वि꣢ष्टये꣣ धि꣡यः꣢ ॥१०१२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ꣢ । व꣣च्यस्व । सुदक्ष । सु । दक्ष । चम्वोः । सु꣣तः꣢ । वि꣣शा꣢म् । व꣡ह्निः꣢꣯ । न । वि꣣श्प꣡तिः꣢ । वृ꣣ष्टि꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣣वस्व । रीति꣢म् । अ꣣पः꣢ । जि꣡न्व꣢꣯न् । ग꣡वि꣢꣯ष्टये । गो । इ꣣ष्टये । धि꣡यः꣢꣯ ॥१०१२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ वच्यस्व सुदक्ष चम्वोः सुतो विशां वह्निर्न विश्पतिः । वृष्टिं दिवः पवस्व रीतिमपो जिन्वन्गविष्टये धियः ॥१०१२॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ । वच्यस्व । सुदक्ष । सु । दक्ष । चम्वोः । सुतः । विशाम् । वह्निः । न । विश्पतिः । वृष्टिम् । दिवः । पवस्व । रीतिम् । अपः । जिन्वन् । गविष्टये । गो । इष्टये । धियः ॥१०१२॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1012
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 17; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 6; खण्ड » 6; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में फिर आचार्य को कहा जा रहा है।

    पदार्थ

    हे (सुदक्ष) शुभ योगबल से युक्त आचार्यप्रवर ! (चम्वोः) द्यावापृथिवी के तुल्य परा और अपरा विद्याओं में (सुतः) निष्णात आप (विशाम्) प्रजाओं के (वह्नि) भार को उठानेवाले (विश्पतिः न) प्रजापालक राजा के समान (आ वच्यस्व) प्रशंसा प्राप्त कीजिए, (गविष्टये) दिव्य प्रकाश के इच्छुक मुझ शिष्य के लिए (धियः) प्रज्ञानों को (जिन्वन्) प्रेरित करते हुए आप (दिवः) मूर्धा-लोक से (वृष्टिम्) धर्ममेघ समाधि में होनेवाली ज्योति की वर्षा को और (अपः) आनन्द-जल की (रीतिम्) धारा को (पवस्व) प्रवाहित कीजिए ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

    भावार्थ

    योगविद्या में पारङ्गत आचार्य भौतिक विज्ञानों के पाण्डित्य के साथ-साथ योगविद्या का पाण्डित्य भी शिष्यों में उत्पन्न करता हुआ उनके सम्मुख मानो दिव्य ज्योति एवं ब्रह्मानन्द की धारा को प्रवाहित कर देता है ॥२॥

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    पदार्थ

    (सुदक्ष) हे श्रेष्ठ बल वाले शान्तस्वरूप परमात्मन्! (चम्वोः सुतः) योग की भूमिरूप अभ्यास और द्यौः—मूर्धारूप वैराग्य में सम्पन्न हुआ—साक्षात् हुआ (विशां वह्निः-न विश्पतिः) उपासकरूप प्रजाओं का निर्वाहक प्रजापालक राजा के समान होता हुआ (आवच्यस्व) आ जा—प्राप्त हो*90 (दिवः-वृष्टिं पवस्व) अपने अमृतधाम से आनन्दवृष्टि को प्रेरित कर (अपः-रीतिं जिन्वन्) कामनाओं*91 की गति को प्रेरित करता हुआ (गविष्टये धियः) स्तोता की इष्टि—इच्छापूर्ति के लिए धारणाएँ साधित कर॥२॥

    टिप्पणी

    [*90. “वञ्चति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] नकारलोपश्छान्दसः।] [*91. “आपो वै सर्वे कामाः” [का॰ १०.४.५.१५]।]

    विशेष

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    विषय

    वैज्ञानिक अन्वेषण व ब्रह्मदर्शन

    पदार्थ

    १. हे (सुदक्ष) = उत्तम दक्षता पैदा करनेवाले सोम! तू २. (चम्वोः)-[द्यावापृथिव्योः] मस्तिष्क व शरीर के लिए (सुतः) = उत्पादित हुआ-हुआ (आवच्यस्व) = शरीर में सर्वत्र गतिवाला हो । सोम की रक्षा से मनुष्य कार्यकुशल बनता है और जहाँ अपने मस्तिष्क को उज्वल बनाता है, वहाँ अपने शरीर को सुदृढ़ बनाता है । ३. यह सोम तो (विशाम्) = प्रजाओं की (वह्निः न) = एक सवारी [Vehicle] के समान है जो उन्हें लक्ष्यस्थान पर पहुँचाने में सहायक होती है । इस सोम की रक्षा से ही उस सोम [प्रभु] तक पहुँचा जाएगा । ४. (विश्पतिः) = यह सोम प्रजाओं का रक्षक है- उन्हें रोगों से बचाकर मृत्यु से बचानेवाला है । ५. हे सोम ! तू (दिवः) = द्युलोक से (वृष्टिम्) = वृष्टि को (पवस्व) = क्षरित कर । सोम की रक्षा से एक योगी जब धर्ममेघ समाधि में पहुँचता है, तब मस्तिष्करूप द्युलोक में स्थित सहस्रधारचक्र से आनन्द के कणों की वर्षा होती है । ६. हे सोम! तू (अपः रीतिम्) = कर्मों के प्रवाह को (पवस्व) = प्राप्त करा । सोमरक्षा से मनुष्य इस मानव जीवन में अन्त तक सतत कर्म करनेवाला बना रहता है। ७. हे सोम! तू (गविष्टये) = उस प्रभु की खोज के लिए अथवा वैज्ञानिक तत्त्वों के अन्वेषण के लिए (धियः) = हमारे प्रज्ञानों व कर्मों को (जिन्वन्) = प्रीणित करनेवाला हो । हमारी बुद्धि इतनी तीव्र हो और क्रियाशक्ति इतनी प्रबल हो कि हम वैज्ञानिक तत्त्वों का अन्वेषण करते हुए अन्त में ब्रह्म की महिमा का दर्शन करें और प्रभु का साक्षात्कार करनेवाले हों ।

    सोम की रक्षा से अपने जीवन को मन्त्रवर्णित दिशा में ले चलनेवाला व्यक्ति ‘कृतयशाः आङ्गिरस'=यशस्वी व शक्तिशाली होता है । 

    भावार्थ

    हम सोम का पान करें और जीवन को सुन्दर बनाते हुए तथा वैज्ञानिक तत्त्वों की खोज करते हुए प्रभु-दर्शन करनेवाले बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (सुदक्ष) उत्तम बलसम्पन्न सोम ! (विशां) प्रजाओं की (वह्निः) सुव्यवस्था का भार वहन करने हार ! आत्मन् (चम्वोः) दोनों सेनाओं के बीच (सुतः) विराजमान (विश्पतिः न) राजा के समान आप प्रजापति, परमात्मा (गविष्टये) गतिशील पशुओं, प्राणियों और पृथ्वी के समस्त जीवों के हित के लिये (अपः जिन्वन्) जलों को नीचे गिराते हुए (दिवः) अन्तरिक्ष से (रीति) अन्नों के देने हारी, विशाल (वृष्टिं) जलवृष्टि को (आवच्यस्व) प्रेरित कर और (धियः) उत्तम बुद्धियों को (पवस्व) प्रेरित कर मेघ रूप प्रजापति पक्ष में—द्यौ और पृथ्वी ‘चमू’ हैं। अध्यात्म पक्ष में—ज्ञानभूमि और कर्मभूमि, या ज्ञानेन्द्रिय और प्राणेन्द्रिय तदनुसार मस्तक के ऊपर के और नीचे के दोनों भाग चमू है। धर्ममेघ समाधि में प्रकट होने वाली ब्रह्मरस की वृष्टि और अपः=कर्म अथवा लिङ्ग शरीरमय प्राणों और धियः=ध्यानवृत्तियों को प्रेरित करता हुआ आत्मा, गौः=इन्द्रियों के हित के लिये या स्वयं वृषभरूप आत्मा के हित के लिये सोम=शुक्र कान्तिरूप में प्रकट होता है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—त्रय ऋषिगणाः। २ काश्यपः ३, ४, १३ असितः काश्यपो देवलो वा। ५ अवत्सारः। ६, १६ जमदग्निः। ७ अरुणो वैतहव्यः। ८ उरुचक्रिरात्रेयः ९ कुरुसुतिः काण्वः। १० भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा १२ मनुराप्सवः सप्तर्षयो वा। १४, १६, २। गोतमो राहूगणः। १७ ऊर्ध्वसद्मा कृतयशाश्च क्रमेण। १८ त्रित आप्तयः । १९ रेभसूनू काश्यपौ। २० मन्युर्वासिष्ठ २१ वसुश्रुत आत्रेयः। २२ नृमेधः॥ देवता—१-६, ११-१३, १६–२०, पवमानः सोमः। ७, २१ अग्निः। मित्रावरुणौ। ९, १४, १५, २२, २३ इन्द्रः। १० इन्द्राग्नी॥ छन्द:—१, ७ नगती। २–६, ८–११, १३, १६ गायत्री। २। १२ बृहती। १४, १५, २१ पङ्क्तिः। १७ ककुप सतोबृहती च क्रमेण। १८, २२ उष्णिक्। १८, २३ अनुष्टुप्। २० त्रिष्टुप्। स्वर १, ७ निषादः। २-६, ८–११, १३, १६ षड्जः। १२ मध्यमः। १४, १५, २१ पञ्चमः। १७ ऋषभः मध्यमश्च क्रमेण। १८, २२ ऋषभः। १९, २३ गान्धारः। २० धैवतः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरप्याचार्य उच्यते।

    पदार्थः

    हे (सुदक्ष) शुभयोग बलयुक्त आचार्यप्रवर ! (चम्वोः) द्यावापृथिव्योरिव पराऽपराविद्ययोः (सुतः) निष्णातः त्वम् (विशाम्) प्रजानाम् (वह्निः) भारवाहकः (विश्पतिः न) प्रजापालकः नृपतिरिव (आ वच्यस्व) प्रशंसां लभस्व। [वच परिभाषणे, कर्मणि ‘उच्यस्व’ इति प्राप्ते सम्प्रसारणाभावश्छान्दसः।] (गविष्टये) गोकामाय दिव्यप्रकाशेच्छुकाय शिष्याय मह्यम् (धियः) प्रज्ञानानि (जिन्वन्) प्रेरयन् त्वम् (दिवः) मूर्धलोकात् (वृष्टिम्) धर्ममेघसमाधौ जायमानां ज्योतिर्वृष्टिम् (अपः) आनन्दवारिणश्च (रीतिम्) धाराम्। [री गतिरेषणयोः, क्र्यादिः।] (पवस्व) प्रवाहय ॥२॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥२॥

    भावार्थः

    योगविद्यापारंगत आचार्यो भौतिकविज्ञानेषु पण्डित्येन साकं योगविद्यापाण्डित्यमपि शिष्याणां कुर्वन् तेषां पुरतो दिव्यज्योतिषो ब्रह्मानन्दस्य च धारामिव प्रवाहयति ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।१०८।१०, ‘री॒तिम॒यां जिन्वा॒’ इति पाठः।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Mighty God, like a King bearing the burden of administering his subjects, and standing in the midst of two armies, for the good of humanity, sending down waters, pour rain on us from heaven, for ripening our harvest, and develop our intellects!

    Translator Comment

    Sayana has translated Trita as a Rishi. This explanation as inacceptable as there is no history in the Veda. Trita means thought, word and deed. Some commentators have explained Sapta Dhama as seven metres as Gayatri. Trishtup , Anushtup. Brihati, Jagati, Ushnik and Pankti. Pt. Jaidev Vidyalankar translates it as seven breaths beside. Prana, Apana, Vyana, Udana, Samana, Kurma, Krikla, Dev Dutta, Dhananjaya. Griffith writes, this stanza is almost unintelligible, and its mining it obscure. Sorry, Griffith has not been able to understand the right significance of this stanza.

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    Meaning

    O Spirit omnipotent of divine action, invoked, adored and vibrant in the internal world of mind and soul and in the external world of nature, sustainer and ruler as burden bearer of humanity, stimulate the radiation of light from heaven, sanctify the shower of bliss, and inspire and illuminate the mind and intelligence for the seeker of enlightenment. (Rg. 9-108-10)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (सुदक्ष) હે શ્રેષ્ઠ બળવાળા શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! (चम्वोः सुतः) યોગની ભૂમિરૂપ અભ્યાસ અને દ્યૌઃ - મૂર્ધારૂપ વૈરાગ્યમાં સંપન્ન થયેલ-સાક્ષાત થયેલ (विशां वह्निः न विश्पतिः) ઉપાસકરૂપ પ્રજાઓના નિર્વાહક પ્રજાપાલક રાજાની સમાન બનીને (आवच्यस्व) આવી જા, પ્રાપ્ત થા. (दिवः वृष्टिं पवस्व) તારા અમૃતધામથી આનંદવૃષ્ટિને પ્રેરિત કર (अपः रीतिं जिन्वन्) કામનાઓની ગતિને પ્રેરિત કરીને (गविष्टये धियः) સ્તોતાની ઇષ્ટિ-ઇચ્છા પૂર્તિને માટે ધારણાને સાધિત કર. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    योगविद्येत पारंगत आचार्य भौतिक विज्ञानाच्या पाण्डित्याबरोबर योगविद्येचे पाण्डित्य ही शिष्यांमध्ये उत्पन्न करतो. त्यांच्यासमोर जणू दिव्य ज्योती व ब्रह्मानंदची धारा प्रवाहित करतो. ॥२॥

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