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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 105
    ऋषिः - ऋजिश्वा भारद्वाजः देवता - विश्वे देवाः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
    38

    अ꣢प꣣ त्यं꣡ वृ꣢जि꣣न꣢ꣳ रि꣣पु꣢ꣳ स्ते꣣न꣡म꣢ग्ने दुरा꣣꣬ध्य꣢꣯म् । द꣡वि꣢ष्ठमस्य सत्पते कृ꣣धी꣢ सु꣣ग꣢म् ॥१०५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣡प꣢꣯ । त्यम् । वृ꣣जिन꣢म् । रि꣣पु꣢म् । स्ते꣣न꣢म् । अ꣣ग्ने । दुराध्य꣢꣯म् । दुः꣣ । आ꣡ध्य꣢꣯म् । द꣡वि꣢꣯ष्ठम् । अ꣣स्य । सत्पते । सत् । पते । कृधि꣢ । सु꣣ग꣢म् । सु꣣ । ग꣢म् ॥१०५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अप त्यं वृजिनꣳ रिपुꣳ स्तेनमग्ने दुराध्यम् । दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम् ॥१०५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अप । त्यम् । वृजिनम् । रिपुम् । स्तेनम् । अग्ने । दुराध्यम् । दुः । आध्यम् । दविष्ठम् । अस्य । सत्पते । सत् । पते । कृधि । सुगम् । सु । गम् ॥१०५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 105
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 2; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 9
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 11;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में रिपुओं को दूर करने की प्रार्थना की गयी है।

    पदार्थ

    हे (सत्पते) सज्जनों के पालनकर्ता (अग्ने) पराक्रमशाली परमात्मन्, विद्वान् जन अथवा राजन् ! आप (त्यम्) उस (वृजिनम्) छोड़ने योग्य पाप को, (रिपुम्) कामक्रोधादि षड्रिपुवर्ग को, अथवा बाह्य शत्रु को, (स्तेनम्) चोर को, और (दुर्-आध्यम्) बुरा चिन्तन करनेवाले द्वेषी को (दविष्ठम्) दूर से दूर (अप अस्य) फेंक दीजिए ॥९॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥९॥

    भावार्थ

    पाप विचार या पापीजन, काम-क्रोध आदि आन्तरिक रिपु या बाह्य शत्रु, चोरी के विचार या चोर लोग, दुश्चिन्ताएँ या दुश्चिन्तनकारी मनुष्य, जो भी हम पर आक्रमण करते हैं, उन्हें हम परमात्मा, विद्वान् लोगों और राजा की सहायता से दूर कर दें। सद्विचार और सद्विचारशील लोग सहयोगी बनकर हमारे साथ विचरें ॥९॥

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    पदार्थ

    (सत्पते-अग्ने) हे सन्मार्गगामीजनों के पालक सर्वश्रेष्ठ अग्रणेता परमात्मन्! तू (त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनं दुराध्यम्) उस सन्मार्ग के विरोधी कुटिल पापी, शत्रु, चोर, अनिष्टचिन्तक को (दविष्ठम्-अपास्य) अत्यन्त दूर पृथक् कर (सुगम्-कृधि) अच्छा चलने वाला कर दे। या वर्जनीय पाप, शत्रुभाव, चोर प्रवृत्ति, अनिष्ट चिन्तन को हम से बहुत दूर रखे—रख, अपितु हमारे में सुगति वाले सद्भाव कर।

    भावार्थ

    परमात्मा सन्मार्गी जनों का सदा रक्षक है उसकी शरण उपासना से पापी—पापभाव, शत्रु-शत्रुभाव, चोर-चोर प्रवृत्ति, चौर्य कर्म, अनिष्ट चिन्तन से मनुष्य बचा रहता है अर्थात् सुप्रवृत्ति वाला बना देता है॥९॥

    विशेष

    ऋषिः—ऋजिश्वा भारद्वाजः (परमात्मा के अर्चन बल को धारण करने में समर्थ ऋजुगामी उपासक)॥<br>देवताः—वैश्वदेवोऽग्निः (सर्वश्रेष्ठ गुणवान् अग्रणेता परमात्मा)॥

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    विषय

    दूर से दूर फेंकिए [ सात समुद्र पार ]

    पदार्थ

    हे (सत्पते)=सयनों के रक्षक! हमारे मार्ग को (सुगम्) = सुगमता से जाने योग्य, सरल (कृधि) = कीजिए। हम सब कभी-न-कभी उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ चलने का संकल्प अवश्य करते हैं, उस मार्ग पर चल भी पड़ते हैं, परन्तु उसपर चलना ('क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति') सचमुच छुरे की तेज धार के समान कठिन प्रतीत होता है और हम फिर-फिर रुक जाया करते हैं। तब हम प्रभु से आराधना करते हैं कि (दविष्ठम्) = दूर-से-दूर [बहुत दूर] (अस्य) = इसे फेंकिए। यह बारम्बार लौटकर हमारे मार्ग को दुर्गम न बनाती रहे। स्पष्ट है कि यह मार्ग का विघ्न बड़ा धृष्ट [हठी obstinate] है, इसे हम परे फेंक भी दें, यह फिर आ जाता है, अतः हारकर हम प्रभु से कहते हैं कि आप इसे दूर से दूर [ सात समुद्र पार] फेंकिए जिससे यह फिर न लौट आये।

    इस विघ्न का चित्रण ही 'वृजिनं, रिपुं, स्तेनं व दुराध्यम्' इन चार शब्दों से हुआ है। यह विघ्नरूप वासना [काम] (वृजिनम्) = वर्जनीय [वृजी वर्जने] है। इसकी आकृति अत्यन्त सुन्दर है, वस्तुत: सब देवों में सर्वाधिक सुन्दर 'काम' ही है। यह अत्यन्त कान्त है, परन्तु यह सुन्दराकृति सर्प के समान है, जो विषमय होने से बचकर चलने योग्य है। हम इसके फन्दे में पड़ गये तो यह 'रिपु' है, हमारा विदारण [Rip] करनेवाला है। यह हमें नष्ट-भ्रष्ट कर देगा। भोगों को हम भोगने लगें तो हम उनका शिकार हो जाएँगें । ये हमारी इन्द्रियशक्तियों को जीर्ण कर देंगे–(सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः) । इतना ही नहीं, यह स्तेन है। ('संस्त्यानमस्मिन् पापकम्') इसमें पाप घनीभूत होकर रह रहा है। इसके वशीभूत होने पर हमारा जीवन पापमय हो जाएगा।

    यह सब-कुछ होते हुए यह 'दुराध्य' है, (दुःखेन वशीकर्तुं योग्यम्') [दयानन्द]। इसका वश में करना बड़ा कठिन है और इसे दूर किये बिना आगे बढ़ना असम्भव है, अतः हम प्रभु से कहते हैं कि (त्यम्) = इस प्रसिद्ध वासनारूप शत्रु को (अप-अस्य) = हमसे दूर फेंकिए [असु क्षेपणे] जिससे हम आगे बढ़ सकें। हे प्रभो! आप (अग्ने) = हमें आगे ले-चलनेवाले हैं। हम स्वयं आगे क्या बढ़ पाएँगे? आपकी शक्ति से शक्तिसम्पन्न होकर मैं 'भरद्वाज' बनूँगा और तभी सरलता से अपने मार्ग पर आग बढ़नेवाला 'ऋजिश्वा' [ऋजु सरल, शिव - गति] हो सकूँगा।

    भावार्थ

    प्रभुकृपा से हम 'ऋजिश्वा भरद्वाजः' बन पाएँ ।

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    विषय

    परमेश्वर की स्तुति

    भावार्थ

    भा० =  हे ( सत्पते ) = सत्पुरुषों के प्रतिपालक ! ( त्यं ) = उस ( वृजिनं ) = पापशील, त्याग करने योग्य ( रिपुं ) = हिंसक, शत्रु, ( स्तेनं ) = चोर, ( दुरा ध्यम् ) = दुःख से वश करने योग्य ( दविष्ठं  ) = हृदय से दूर, द्वेषी पुरुष को ( अप अस्य ) = दूर कर और हमारे लिये उसको ( सुगं ) = सुखसे वश करने योग्य ( कृधि ) = बना दे |
     

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - भरद्वाज:।

    छन्दः - उष्णिक्।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ रिपूनपनेतुं प्रार्थयते।

    पदार्थः

    हे (सत्पते) सतां पालयितः (अग्ने) पराक्रमशालिन् परमात्मन्, विद्वन्, राजन् वा ! त्वम् (त्यम्) तम् (वृजिनम्) वर्जनीयं पापम्। वृजी वर्जने। वृजिनानि वर्जनीयानि इति निरुक्तम् १०।४१। (रिपुम्) कामक्रोधादिषड्रिपुवर्गम्, बाह्यं शत्रुं वा, (स्तेनम्) चौरम्, (दुर्-आध्यम्२) दुष्टचिन्तनपरायणं द्वेषिणं च। दुर्-आ-ध्यै चिन्तायाम्। (दविष्ठम्) दूरतमं यथा स्यात् तथा। अतिशयेन दूरं दविष्ठम्। दूरशब्दाद् इष्ठनि स्थूलदूर० अ० ६।४।१५६ इति यणादिपरस्य लोपः, पूर्वस्य गुणः। (अप अस्य३) अप क्षिप। असु क्षेपणे, दिवादिः, लोटि मध्यमैकवचने रूपम्। अस्माकं कृते (सुगम्४) सुगम्यं सन्मार्गं च। ‘सुदुरोरधिकरणे।’ अ० ३।२।४८ वा० इत्यनेन अधिकरणेऽर्थे गम् धातोर्डः प्रत्ययः। (कृधी) कुरु, प्रकाशय इत्यर्थः। कुरु इति प्राप्ते श्रुशृणुपॄकृवृभ्यश्छन्दसि। अ० ६।४।१०२ इति हेर्धिः। अन्येषामपि दृश्यते।’ अ० ६।३।१३७ इति दीर्घः ॥९॥५ अत्र अर्थश्लेषालङ्कारः ॥९॥

    भावार्थः

    पापविचाराः पापिनो जना वा, कामक्रोधाद्या आभ्यन्तरा रिपवो बाह्याः शत्रवो वा, स्तेयविचाराः स्तेना वा, दुश्चिन्तनानि दुश्चिन्तनकारिणो वा येऽप्यस्मानाक्रामन्ति तान् वयं परमात्मनो विद्वज्जनानां नृपतेश्च साहाय्येन दूरं प्रक्षिपेम। सद्विचाराः सद्विचारशीला जनाश्च सहयोगिनो भूत्वाऽस्माभिः सार्धं विचरन्तु ॥९॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ६।५१।१३ २. दुराध्यं कुत्सितम् आभिमुख्येन ध्यानं यस्य स दुराध्यः तं कुत्सितध्यानम् पापसंकल्पमित्यर्थः—इति वि०। ३. विवरणकारस्तु अस्य इति नामपदमाह—अस्य च रिपोः स्तेनस्य च इति। तत्तु न विचारसहं, स्वरविरोधात्। अपास्य अपक्षिप—इति भ०, सा०। ४. सुगं सुखेन गम्यं पन्थानम्—इति भ०। ५. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिणा मन्त्रोऽयं विद्वत्पक्षे व्याख्यातः।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, Lord of the virtuous, drive far away the sinful foe, the troublesome thief, and make him pursue the right path.

    Translator Comment

    God can change the nature of wicked foes, and evil-hearted thieves, and make them tread the path of virtue.

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    Meaning

    Agni, O divine leader, cast away that crooked thief, that strenuous enemy, far from the path of the aspirant. O protector and promoter of the good and the true, make it easy for him to follow the course simple and straight. (Rg. 6-51-13)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (सत्यते अग्ने) હે સન્માર્ગગામી જનોના પાલક , સર્વશ્રેષ્ઠ પરમાત્મન્ ! તું (त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनं दुराध्यम्) તે સન્માર્ગના વિરોધી કુટિલ = કપટી , પાપી , શત્રુ , ચોર , અનિષ્ઠ ચિંતકને  (दविष्ठम् अपास्य) અત્યંત દૂર - પૃથક્ કર , (सुगं कृधि) સન્માર્ગી બનાવી દે. અથવા વર્જનીય એવા પાપ , શત્રુભાવ , ચોર પ્રવૃત્તિ તથા અનિષ્ટ ચિંતનને અમારાથી અત્યંત દૂર રાખો-રાખ , પરંતુ અમારામાં સુમતિવાળો સદ્ભાવ ઉત્પન્ન કર. (૯)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ :  પરમાત્મા સન્માર્ગીજનોનો હંમેશા રક્ષક છે એની શરણે - ઉપાસનાથી પાપી - પાપભાવ , શત્રુ - શત્રુભાવ , ચોર - ચોરપ્રવૃત્તિ , ચૌર્યકર્મ , અનિષ્ટ ચિંતનથી માણસ બચતો રહે છે એટલે કે  સુપ્રવૃત્તિવાળો બનાવી દે છે. (૯)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    چور کی طرح گُھسے ہوئے ہمارے اندر پاپ رُوپی دُشمن کو دُور کرو

    Lafzi Maana

    (اگنے) ہے جگت کے والی! (اپ کردھی) دُور کردیجیئے (تیّم ورجنم) اُس پاپ (بُرائی) جو ہمارے اندر (رِپُو) دشمن ہو کر (ستینم) چور کی طرح گُھسا ہوا ہے۔ (دُرادھیّم) جس کا خیال کرنا بھی بُرا ہے (ست پتے) ہے سچے مالک ایشور! (دوشٹھم اسیہ) اُسے ہم سے پرے کر دیجئے (سُگم کردھی) جس سے ہماری زندگی کا راستہ آسان اور سُکھ مئے ہو جائے، ایسا سُگم کر دو۔

    Tashree

    دُور بھگاؤ بھگون ہم سے چور کُٹل پا جی جَن کو، اندر بیٹھے چِت چوروں کو جو ہرتے وِچار دھن کو۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    पाप विचार किंवा पापीजन, काम, क्रोध इत्यादी आंतरिक रिपु किंवा बाह्य शत्रू, चोरीचा विचार किंवा चोर लोक, दुश्चिन्ता किंवा दुश्चिन्तन करणारी माणसे, आमच्यावर जे आक्रमण करतात, त्यांना आम्ही परमात्मा, विद्वान लोक व राजा यांच्या साह्याने दूर करावे. सद्विचार व सद्विचारशील लोकांनी सहकारी बनून आमच्याबरोबर राहावे. ॥९॥

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    विषय

    आता शत्रूंना दूर ठेवण्यासाठी वा रिपु- निवारणासाठी प्रार्थना केली आहे -

    शब्दार्थ

    हे (सत्यते) सज्जनांच्या पालका, (अग्ने) पराक्रमी परमेश्वरा अथवा हे विद्वान वा हे राजन्, आपण (त्यम्) त्या (कृजिनम्) ज्याचा अवश्य त्याग करावा. अशा (रिपुम्) काम, क्रोधादी सहा शत्रूंना अथवा बाह्य शत्रूंना तसेच (स्तेनम्) चोरांना व (दुर् आराध्यम्) आमचे वाईट चिंतणाऱ्या द्वेषी मनुष्यांना आमच्यापासून (दविष्ठम्) शक्य तेवढे दूर (अप अस्य) असू दे. फेकून दे. ।। ९।।

    भावार्थ

    पापमय विचार अथवा पापी लोक, काम क्रोधादी आंतरिक शत्रू वा बाह्य शत्रू, चौर्य कर्माचा विचार करणारे वा चोर, तसेच दुश्चिंता आणि दुश्चिन्तकारी मनुष्य, हे सर्व वा जे जे विरोधी जन आम्हांवर आक्रमण करतात, त्या सर्वांना आम्ही (ईश्वरापासक) परमेश्वराच्या, विद्वज्जनांच्या आणि राजाच्या साह्याने दूर करण्यात यशस्वी होू. मनात सद्विचार आपण सद्विचारीजन आमचे सहकारी होऊन सदैव आमच्यासह राहावेत. (अशी आम्ही कामना वा निश्चय करतो.) ।। ९।।

    विशेष

    या मंत्रात अर्थश्लेष अलंकार आहे ।। ९।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    அக்னியே! நீ பிரசித்த சத்துரு துஷ்டனான ஹிம்சை செய்பவனை வெகுதூரம் துரத்தவும். நல்லோர்களை காப்பவனே! சுகத்தை செய்யவும்.

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