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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1119
    ऋषिः - असितः काश्यपो देवलो वा देवता - पवमानः सोमः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    26

    प्र꣢ स्वा꣣ना꣢सो꣣ र꣡था꣢ इ꣣वा꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢सो रा꣣ये꣡ अ꣢क्रमुः ॥१११९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र । स्वा꣣ना꣡सः꣢ । र꣡थाः꣢꣯ । इ꣢व । अ꣡र्व꣢꣯न्तः । न । श्र꣣वस्य꣡वः꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । रा꣡ये꣢ । अ꣣क्रमुः ॥१११९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र स्वानासो रथा इवार्वन्तो न श्रवस्यवः । सोमासो राये अक्रमुः ॥१११९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । स्वानासः । रथाः । इव । अर्वन्तः । न । श्रवस्यवः । सोमासः । राये । अक्रमुः ॥१११९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1119
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में गुरुओं का वर्णन है।

    पदार्थ

    (सोमासः) विद्वान् गुरु लोग (रथाः इव) रथों के समान (स्वानासः) शब्द करनेवाले और (अर्वन्तः इव) आक्रमणकारी योद्धाओं के समान (श्रवस्यवः) कीर्ति के इच्छुक होते हुए (राये) विद्यारूप ऐश्वर्य के लिए अर्थात् राष्ट्र में विद्यारूप ऐश्वर्य उत्पन्न करने के लिए (प्र अक्रमुः) उद्योग करते हैं ॥४॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥४॥

    भावार्थ

    जैसे सड़क पर चलते हुए रथ शब्द करते हैं, वैसे ही गुरुजन पढ़ाते समय भाषण करते हैं। जैसे युद्ध करने में उद्भट योद्धागण विजय की कीर्ति चाहते हैं, वैसे ही गुरु लोग राष्ट्र में सुयोग्य विद्वानों को उत्पन्न करके उनसे प्राप्त होनेवाली कीर्ति की कामना करते हैं ॥४॥

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    पदार्थ

    (स्वानासः) निष्पद्यमान—उपासित हुआ उपासना में लाया हुआ (श्रवस्यवः) उपासक को सुनाना चाहता हुआ (सोमासः) शान्तस्वरूप परमात्मा (राये) उपासक को मोक्षैश्वर्य प्रदान करने के लिए (रथाः-इव) रथ के समान (अर्वन्तः-न) घोड़ों के समान (प्र-अक्रमुः) प्रगति से प्राप्त होता है*18॥४॥

    टिप्पणी

    [*18. बहुवचनमादरार्थम्।]

    विशेष

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    विषय

    'असित, कश्यप, देवल'

    पदार्थ

    (स्वानासः) = सदा प्रभु के गुणों का उच्चारण करनेवाले, अतएव 'अ-सित'=संसार के प्रलोभनों में न फँसनेवाले, (श्रवस्यवः) = ज्ञान की कामनावाले, अतएव 'काश्यप'= ज्ञानी – तत्त्वदर्शी बननेवाले, (सोमासः) = सोम के पुञ्ज तथा विनीत, अतएव 'देवल'- दिव्य गुणों का आदान करनेवाले (रथाः इव) = गतिशील रथों के समान आगे और आगे बढ़नेवाले तथा (अर्वन्तः न) = मार्ग की सब बाधाओं को समाप्त कर आगे बढ़ते हुए [अर्व हिंसायाम्] घोड़ों के समान ये प्रभुभक्त (राये) = ज्ञानरूप परमैश्वर्य की प्राप्त के लिए (प्र अक्रमुः) = पराक्रम करते हैं |

    भावार्थ

    प्रभु के गुणों का उच्चारण हमें 'अ-सित' बनाएगा, ज्ञान की कामना हमें काश्यप बनाएगी और सौम्यता से हम 'देवल' बनेंगे । ऐसा बनने से ही हम वास्तविक सम्पत्ति को प्राप्त करेंगे । "

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    विषय

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    भावार्थ

    (स्वानासः) विशुद्ध रूप में प्रकट होने वाले (सोमासः) ज्ञानी लोग (रथा इव) वेगवान् रथों के समान और (अर्वन्तः न) अश्वों के समान (श्रवस्यवः) अन्न, ज्ञान और परम ऐश्वर्य की कामना करने हारे (राये) आत्म साक्षात्कार या परमानन्द प्राप्ति के लिये (अक्रमुः) और आगे क़दम रखते हैं।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ वृषगणो वासिष्ठः। २ असितः काश्यपो देवलो वा। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ४ यजत आत्रेयः। ५ मधुच्छन्दो वैश्वामित्रः। ७ सिकता निवावरी। ८ पुरुहन्मा। ९ पर्वतानारदौ शिखण्डिन्यौ काश्यप्यावप्सरसौ। १० अग्नयो धिष्ण्याः। २२ वत्सः काण्वः। नृमेधः। १४ अत्रिः॥ देवता—१, २, ७, ९, १० पवमानः सोमः। ४ मित्रावरुणौ। ५, ८, १३, १४ इन्द्रः। ६ इन्द्राग्नी। १२ अग्निः॥ छन्द:—१, ३ त्रिष्टुप्। २, ४, ५, ६, ११, १२ गायत्री। ७ जगती। ८ प्रागाथः। ९ उष्णिक्। १० द्विपदा विराट्। १३ ककुप्, पुर उष्णिक्। १४ अनुष्टुप्। स्वरः—१-३ धैवतः। २, ४, ५, ६, १२ षड्ज:। ७ निषादः। १० मध्यमः। ११ ऋषभः। १४ गान्धारः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ गुरून् वर्णयति।

    पदार्थः

    (सोमासः) विद्वांसो गुरवः (रथाः इव) स्यन्दना इव (स्वानासः) शब्दान् कुर्वन्तः (अर्वन्तः इव) आक्रान्तारो योद्धारः इव (श्रवस्यवः) कीर्तिकामाः सन्तः (राये) विद्यैश्वर्याय, राष्ट्रे विद्यारूपमैश्वर्यं जनयितुमित्यर्थः प्र (अक्रमुः) उद्युञ्जते ॥४॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥४॥

    भावार्थः

    यथा मार्गे चलन्तो रथाः शब्दायन्ते तथा विद्वांसो गुरुजना अध्यापनकाले भाषन्ते। यथा रणोद्भटा योद्धारो विजयकीर्तिं कामयन्ते तथा गुरवो राष्ट्रे सुयोग्यान् विदुष उत्पाद्य तज्जनितां कीर्तिमभिलषन्ति ॥४॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।१०।१।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Like cars that thunder on their way, like a fast horse, the pure, Earned persons, longing for wealth, knowledge and prosperity, march forward for the attainment of supreme bliss.

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    Meaning

    The seekers of soma in search of food for body, mind and soul rush on like resounding charioteers and warriors of horse, and go forward for the achievement of lifes wealth. (Rg. 9-10-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (स्वानासः) નિષ્પદ્યમાન-ઉપાસિત થયેલ ઉપાસનામાં લાવેલ (श्रवस्यवः) ઉપાસકને સાંભળવા ચાહતા  (सोमासः) શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા (राये) ઉપાસકને મોક્ષૈશ્વર્ય પ્રદાન કરવા માટે (रथाः इव) ૨થની સમાન (अर्वन्तः न) ઘોડાઓની સમાન (प्र अक्रमुः) પ્રગતિ-પ્રયત્નોથી પ્રાપ્ત થાય છે. (૪)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसे मार्गात चालताना रथाचा आवाज येतो तसेच गुरुजन अध्यापनात मुखर होतात. जसे युद्धात उद्भर योद्धागण विजय मिळवून कीर्ती मिळवू इच्छितात. तसेच गुरू लोक राष्ट्रात सुयोग्य विद्वान उत्पन्न करून त्यांच्याकडून मिळणाऱ्या कीर्तीची कामना करतात. ॥४॥

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