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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1144
ऋषिः - यजत आत्रेयः
देवता - मित्रावरुणौ
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
24
स꣣म्रा꣢जा꣣ या꣢ घृ꣣त꣡यो꣢नी मि꣣त्र꣢श्चो꣣भा꣡ वरु꣢꣯णश्च । दे꣣वा꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ प्रश꣣स्ता꣢ ॥११४४॥
स्वर सहित पद पाठस꣣म्रा꣡जा꣢ । स꣣म् । रा꣡जा꣢꣯ । या । घृ꣣त꣡यो꣢नी । घृ꣣त꣢ । यो꣣नी꣢इति । मि꣣त्रः꣢ । मि꣢ । त्रः꣣ । च । उभा꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । च꣣ । देवा꣢ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प्र꣣शस्ता꣢ । प्र꣣ । शस्ता꣢ ॥११४४॥
स्वर रहित मन्त्र
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च । देवा देवेषु प्रशस्ता ॥११४४॥
स्वर रहित पद पाठ
सम्राजा । सम् । राजा । या । घृतयोनी । घृत । योनीइति । मित्रः । मि । त्रः । च । उभा । वरुणः । च । देवा । देवेषु । प्रशस्ता । प्र । शस्ता ॥११४४॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1144
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का कथन है।
पदार्थ
(या) जो (सम्राजा) सम्राट् और (घृतयोनी) तेज के घर (मित्रः च वरुणः च) परमात्मा और जीवात्मा (उभा) दोनों (देवा) प्रकाशक और (देवेषु) प्रकाश करनेवाले अग्नि, सूर्य, बिजली आदि के बीच (प्रशस्ता) प्रशस्त हैं, उनके लिए (गायत) गुण-गान करो। [‘गायत’ पद पूर्व मन्त्र से यहाँ लाया गया है] ॥२॥
भावार्थ
जैसे परमेश्वर विश्वब्रह्माण्ड का सम्राट् है, वैसे ही जीवात्मा शरीर का सम्राट् है। दोनों के प्रकाश को पाकर मनुष्य को महान् बनना योग्य है ॥२॥
पदार्थ
(या) जो (सम्राजा) सम्यक् राजमान—प्रकाशमान (घृतयोनी) तेज का आश्रय—महातेजस्वी*65 (मित्रः च वरुणः च) मित्र और वरुण (च-उभा) ये दोनों धर्म वाला (देवाः) देव (देवेषु प्रशस्ता) मुमुक्षु उपासकों में प्रशंसनीय है॥२॥
टिप्पणी
[*65. “तेजो वै घृतम्” [मै॰ १.६.८] “तस्य भासा सर्वमिदं विभाति तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्” [मै॰ १.६.८]।]
विशेष
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विषय
देवताओं में प्रशस्त
पदार्थ
ये प्राणापान (सम्राजा) = हमारे जीवनों को बड़ा नियमित [well regulated] बनानेवाले हैं, हमारे शरीरों को तेजस्वी व दीप्त [राज्- दीप्त] करनेवाले हैं । (या) = जो ये (मित्रः च वरुणः च) = प्राण और अपान हैं (उभा) = दोनों (घृतयोनी) = [घृ– १. क्षरण, २. दीप्ति] मानस मलों को दूर करके हमारे मनों को दीप्त बनानेवाले हैं। हमारे मन राग-द्वेषादि के मलों से रहित होकर पवित्रता व प्रकाश से चमक उठते हैं। ये (देवा) = हमें नीरोगता देनेवाले हैं [देव:-दानात्] तथा हमारे मनों को द्योतित करनेवाले हैं [देव: द्योतनात् ] । ये प्राणापान शरीर में रहनेवाले देवेषु- सब देवों में [सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते] प्रशस्त व प्रशंसनीय हैं।
भावार्थ
प्राणापान ही सब देवताओं में श्रेष्ठ हैं। इनकी साधना ही हमें तेजस्वी शरीरवाला व द्योतित हृदयवाला बनाएगी ।
विषय
missing
भावार्थ
(या) जो (मित्रः च वरुणः च) मित्र और वरुण प्राण और अपान हैं वे (उभा) दोनों (घृतयोनी) कान्ति, प्रकाश और तेज के उत्पत्ति स्थान और (सम्राजा) स्वयं उत्तम रीति से प्रकाश देनेहारे (देवेषु) दिव्य पदार्थों, विद्वानों और इन्द्रियगण में (प्रशस्ता) प्रशंसा योग्य (देवा) सुख के दाता हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ वृषगणो वासिष्ठः। २ असितः काश्यपो देवलो वा। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ४ यजत आत्रेयः। ५ मधुच्छन्दो वैश्वामित्रः। ७ सिकता निवावरी। ८ पुरुहन्मा। ९ पर्वतानारदौ शिखण्डिन्यौ काश्यप्यावप्सरसौ। १० अग्नयो धिष्ण्याः। २२ वत्सः काण्वः। नृमेधः। १४ अत्रिः॥ देवता—१, २, ७, ९, १० पवमानः सोमः। ४ मित्रावरुणौ। ५, ८, १३, १४ इन्द्रः। ६ इन्द्राग्नी। १२ अग्निः॥ छन्द:—१, ३ त्रिष्टुप्। २, ४, ५, ६, ११, १२ गायत्री। ७ जगती। ८ प्रागाथः। ९ उष्णिक्। १० द्विपदा विराट्। १३ ककुप्, पुर उष्णिक्। १४ अनुष्टुप्। स्वरः—१-३ धैवतः। २, ४, ५, ६, १२ षड्ज:। ७ निषादः। १० मध्यमः। ११ ऋषभः। १४ गान्धारः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनस्तमेव विषयमाह।
पदार्थः
(या) यौ (सम्राजा) सम्राजौ, (घृतयोनी) तेजोगृहौ च (मित्रः च वरुणः च) परमात्मा च जीवात्मा च (उभा) उभौ (देवा) देवौ, प्रकाशकौ, (देवेषु) प्रकाशकेषु च अग्निसूर्यविद्युदादिषु मध्ये (प्रशस्ता) प्रशस्तौ स्तः, ताभ्याम् (गायत) गुणगानं कुरुत। [‘गायत’ इति पदं पूर्वमन्त्रादानीतम्] ॥२॥२
भावार्थः
यथा परमेश्वरो विश्वब्रह्माण्डस्य सम्राट् तथा जीवात्मा देहस्य सम्राडस्ति। उभयोः प्रकाशं प्राप्य मनुष्यो महान् भवितुमर्हति ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ५।६८।२। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमं राजपुरुषविषये व्याख्यातवान्।
इंग्लिश (2)
Meaning
Both Prana and Apana are the originators of loveliness, brilliancy and beauty. They themselves shed lustre. Of all the organs, they arc fit for praise the givers of happiness.
Meaning
Mitra and Varuna, both brilliant rulers of nature and humanity, sources of the showers of fertility, prosperity and felicity, are eminent and adorable, honoured among the brilliancies of nature and humanity. (Rg. 5-68-2)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (या) જે (सम्राजा) સમ્યક્ રાજમાન-પ્રકાશમાન (घृतयोनी) તેજનો આશ્રય-મહા તેજસ્વી (मित्रः च वरुणः च) મિત્ર અને વરુણ (च उभा) એ બન્ને ધર્મવાળા (देवाः) દેવ (देवेषु प्रशस्ता) મુમુક્ષુ ઉપાસકોમાં પ્રશંસનીય છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
जसा परमेश्वर विश्वब्रह्मांडाचा सम्राट आहे, तसेच जीवात्मा शरीराचा सम्राट आहे. दोन्हींचा प्रकाश प्राप्त करून माणसाने महान बनावे. ॥२॥
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