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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1150
ऋषिः - भरद्वाजो बार्हस्पत्यः
देवता - इन्द्राग्नी
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
35
य꣢ इ꣣द्ध꣢ आ꣣वि꣡वा꣢सति सु꣣म्न꣡मिन्द्र꣢꣯स्य꣣ म꣡र्त्यः꣢ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ सु꣣त꣡रा꣢ अ꣣पः꣢ ॥११५०॥
स्वर सहित पद पाठयः । इ꣣द्धे꣢ । आ꣣वि꣢वा꣢सति । आ꣣ । वि꣡वा꣢꣯सति । सु꣣म्न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । म꣡र्त्यः꣢꣯ । द्यु꣣म्ना꣡य꣢ । सु꣣त꣡राः꣢ । सु꣣ । त꣡राः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ ॥११५०॥
स्वर रहित मन्त्र
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः । द्युम्नाय सुतरा अपः ॥११५०॥
स्वर रहित पद पाठ
यः । इद्धे । आविवासति । आ । विवासति । सुम्नम् । इन्द्रस्य । मर्त्यः । द्युम्नाय । सुतराः । सु । तराः । अपः ॥११५०॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1150
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 3; सूक्त » 4; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि अग्नि में परमेश्वर की ही दी हुई ज्योति है।
पदार्थ
(यः मर्त्यः) जो मनुष्य (इद्धे) अग्नि के प्रदीप्त होने पर (इन्द्रस्य) परमात्मा के (सुम्नम्) सुखदायक दान की (आ विवासति) प्रशंसा करता है, वह (द्युम्नाय) तेज और यश के लिए (अपः) विकट भी कर्मों को (सुतराः) आसानी से सिद्ध होनेवाला कर लेता है ॥२॥
भावार्थ
प्रज्वलित अग्नि में उसकी अपनी ज्योति नहीं है, प्रत्युत परमात्मा की ही है, ऐसा जो मानता है, वह परमात्मा का आराधक होता हुआ तेजस्वी और यशस्वी बनता है। पर जो भौतिकवादी होता है, वह भौतिक पदार्थों में ही रमता हुआ भोगों से ही भोगा जाता है ॥२॥
पदार्थ
(यः-मर्त्यः) जो मनुष्य (इद्धे-इन्द्रस्य ‘इन्द्रे’) दीप्त ऐश्वर्यवान् परमात्मनिमित्त*79 (सुम्नम्-आविवासति) अपने को साधु*80 सुन्दर हविरूप में समर्पित करता है*81 (द्युम्नाय) उस द्योतमान—यशोरूप—यशस्वी बने मनुष्य के लिये*82 (अपः सुतराः) प्राण*83 सागर को सुख से तराने वाले हो जाते हैं॥२॥
टिप्पणी
[*79. निमित्तसप्तम्यां विभक्तिव्यत्ययः।] [*80. “सुम्ने मा धत्तम्-साधौ माधत्तमित्येवैतदाह” [श॰ १.८.५.२७]।] [*81. “विवासति परिचर्याकर्मा” [निघं॰ ३.५]।] [*82. “द्युम्नं द्योतते र्यशो” [निरु॰ ५.५]।] [*83. “प्राणा वा आपः” [तां ० ८.९.४] विभक्तिव्यत्ययश्छान्दसः।]
विशेष
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विषय
भवसागर-सन्तरण
पदार्थ
(यः मर्त्यः) = जो व्यक्ति (इद्धे) = ज्ञान से दीप्त अपने हृदय में (इन्द्रस्य) = परमैश्वर्यशाली परमात्मा के (सुम्नम्) = स्तोत्र को (आविवासति) = करता है, अर्थात् स्तोत्रों के द्वारा प्रभु की पूजा करता है, वह मनुष्य (द्युम्नाय) = ज्ञान के प्रकाश के लिए समर्थ होता है । इस व्यक्ति को प्रकाश प्राप्त होता है और परिणामत: इसके लिए (अप:) = कर्म (सुतरा:) = सुगमता से तैरने योग्य हो जाते हैं। अज्ञानी को ही कर्म बाँधते हैं, क्योंकि उसकी कर्मों में आसक्ति होती है । ज्ञानी के लिए कर्मबन्धन नहीं रहता, क्योंकि यह कर्मफल की इच्छा से ऊपर उठ जाता है । इस प्रकार यह ज्ञानी निष्काम कर्मों के परिणामस्वरूप इस जन्ममरण के चक्र को पार कर लेता है । यह भवसागर में गोते नहीं खाता रहता ।
भावार्थ
हम प्रभु स्तवन करें। प्रभु-स्तवन से हमें प्रकाश प्राप्त हो । प्रकाश हमें निष्काम करके कर्मसन्तरण के योग्य बनाये ।
विषय
missing
भावार्थ
(यः मर्त्यः) जो मरणधर्मा मनुष्य (इद्धः) स्वयं प्रकाशित, ज्ञानवान होकर (इन्द्रस्य) आत्मा के (सुम्नं) सुख करने वाले ज्ञान को (आ विवासति) उद्घाटन करता है उस (द्युम्नाय) प्रकाशस्वरूप ज्ञानों के लिये (अपः) कर्म बन्धन (सुतराः) सुख से तरण योग्य हो जाते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ वृषगणो वासिष्ठः। २ असितः काश्यपो देवलो वा। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ४ यजत आत्रेयः। ५ मधुच्छन्दो वैश्वामित्रः। ७ सिकता निवावरी। ८ पुरुहन्मा। ९ पर्वतानारदौ शिखण्डिन्यौ काश्यप्यावप्सरसौ। १० अग्नयो धिष्ण्याः। २२ वत्सः काण्वः। नृमेधः। १४ अत्रिः॥ देवता—१, २, ७, ९, १० पवमानः सोमः। ४ मित्रावरुणौ। ५, ८, १३, १४ इन्द्रः। ६ इन्द्राग्नी। १२ अग्निः॥ छन्द:—१, ३ त्रिष्टुप्। २, ४, ५, ६, ११, १२ गायत्री। ७ जगती। ८ प्रागाथः। ९ उष्णिक्। १० द्विपदा विराट्। १३ ककुप्, पुर उष्णिक्। १४ अनुष्टुप्। स्वरः—१-३ धैवतः। २, ४, ५, ६, १२ षड्ज:। ७ निषादः। १० मध्यमः। ११ ऋषभः। १४ गान्धारः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथाग्नौ परमेश्वरप्रदत्तमेव ज्योतिरस्तीत्याह।
पदार्थः
(यः मर्त्यः) यो मनुष्यः (इद्धे) अग्नौ प्रदीप्ते सति (इन्द्रस्य) परमात्मनः (सुम्नम्) सुखकरं दानम् (आ विवासति) परिचरति, प्रशंसतीत्यर्थः, सः (द्युम्नाय) तेजसे यशसे च (अपः) विकटान्यपि कर्माणि (सुतराः) सुतराणि, सुसाध्यानि करोति ॥२॥२
भावार्थः
समिद्धेऽग्नौ तस्य स्वकीयं ज्योतिर्नास्ति प्रत्युत परमात्मन एवेति यो मन्यते स परमात्माराधकः सन् तेजस्वी यशस्वी च जायते। यस्तु भौतिकवादी स भौतिकेष्वेव पदार्थेषु रममाणो भोगैरेव भुज्यते ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ६।६०।११। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमं मनुष्यैर्यशसे धनाय च किं सेवितव्यमिति विषये व्याचष्टे।
इंग्लिश (2)
Meaning
A highly intellectual mortal, who unfurls knowledge that gladdens the soul, finds an easy way over the shackles of Karma, to splendid knowledge.
Meaning
Whoever the mortal that honours and adores the favour and grace of Indra when the fire is burning for the sake of excellence, the waters of his life and the flow of his actions would be blest with fulfilment. (Rg. 6-60-11)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (यः मर्त्यः) જે મનુષ્ય (इद्धे इन्द्रस्य ' इन्द्रे ') દીપ્ત ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મા માટે (सुम्नम् आविवासति) પોતાને સાધુ-સુંદર હવિરૂપમાં સમર્પિત કરે છે. (द्युम्नाय) પ્રકાશમાન-યશોરૂપ-યશસ્વી બનેલ મનુષ્યને માટે (अपः सुतराः) પ્રાણ સાગરને સુખથી તરાવનાર બની જાય છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
प्रज्वलित अग्नीत त्याची स्वत:ची ज्योती नाही, तर परमेश्वराचीच आहे, असे जो मानतो तो परमात्म्याचा आराधक बनून तेजस्वी व यशस्वी बनतो; पण जो भौतिकवादी असतो तो भौतिक पदार्थातच रमत भोगाद्वारेच भोगला जातो. ॥२॥
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