Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1160
    ऋषिः - अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - द्विपदा विराट् स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    28

    प्र꣢ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्षाः स꣣ह꣡स्र꣢धारस्ति꣣रः꣢ प꣣वि꣢त्रं꣣ वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢म् ॥११६०॥

    स्वर सहित पद पाठ

    प्र꣢ । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्षारि꣡ति꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢धारः । स꣣ह꣡स्र꣢ । धा꣣रः । तिरः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । वि । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् ॥११६०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    प्र वाज्यक्षाः सहस्रधारस्तिरः पवित्रं वि वारमव्यम् ॥११६०॥


    स्वर रहित पद पाठ

    प्र । वाजी । अक्षारिति । सहस्रधारः । सहस्र । धारः । तिरः । पवित्रम् । वि । वारम् । अव्यम् ॥११६०॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1160
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 8; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में ज्ञानरस का विषय कहा जा रहा है।

    पदार्थ

    (वाजी) बलवान् (सहस्रधारः) अनन्त धाराओंवाला पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेवाला ज्ञानरस(पवित्रम्) पवित्र मन को (तिरः) पार करके (अव्यम्) अविनश्वर (वारम्) दोषनिवारक जीवात्मा के प्रति (प्र वि अक्षाः) उत्तम प्रकार से विविधरूप में क्षरित हो रहा है ॥१॥

    भावार्थ

    आचार्य से प्रवाहित होता हुआ विज्ञानरस मन के माध्यम से जीवात्मा में प्रविष्ट होकर उसे पवित्र और विद्वान् बना देता है ॥१॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (वाजी सहस्रधारः) बलवान् सोम—परमात्मा बहुत आनन्दधारा वाला (पवित्रं तिरः) पवित्र आत्मा के अन्दर*95 (प्र-अक्षाः) प्रक्षरित होता है—पहुँचता है—प्राप्त होता है (अव्ययं वार वि) पृथिवी के बने—पार्थिव देह आवरक को विगत करके—हटाकर॥१॥

    टिप्पणी

    [*94. “धिषणा वाक्” [निघ॰ १.११]।] [*95. “तिरोऽन्तधौं” [अष्टा॰ १.४.७०] “तिरोदधे-अन्तर्धत्ते” [निरु॰]।]

    विशेष

    ऋषिः—अग्नयो धिष्ण्याः (धिषणा*94—स्तुतिवाणी के साधक उपासक)॥ देवता—सोमः (शान्तस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—द्विपदा विराट्॥<br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    [क] (वाजी) = बलवाला, [ख] (सहस्रधारः) = [स-हस्र, धारा - वाणी] सदा आनन्दमय मधुर वाणीवाला उस प्रभु की ओर (प्र अक्षाः) = [प्रकर्षेण क्षरति धावति] तेजी से बढ़ चलता है, जो प्रभु - १. (तिरः) = उसके ही अन्दर छिपे हुए हैं, २. (पवित्रम्) = उसके जीवन को पवित्र बनानेवाले हैं, ३. (विवारम्) = विशेषरूप में हमारी वासनाओं का निवारण करनेवाले हैं और ४. (अव्यम्) = रक्षण में उत्तम हैं।

    इस मन्त्र में प्रभु-प्राप्ति के दो साधनों का उल्लेख है – १. शक्ति और २. मधुर वाणी - इन दो साधनों से हम उस प्रभु को प्राप्त करते हैं जो प्रभु हमारे ही अन्दर अन्तर्हित हैं, पवित्र हैं, वरणीय हैं और रक्षक हैं ।

    भावार्थ

    हम शक्ति और माधुर्य के मेल से प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें ।

    टिप्पणी

    नोट – वारम् के दो अर्थ हैं— [१] निवारण करनेवाले, [२] वरणीय ।
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    (वाजी) शक्तिमान्, ज्ञानी या आनन्दरस (सहस्रधारः) सहस्रों धारण करने वाली शक्तियों से युक्त होकर (अव्यं) ध्रुव, प्राणमय, (पवित्रं) पावन करने हारे (वारं) वरणीय, या दुःखों के वारक आत्मा को (तिरः वि प्र अक्षाः) साक्षात्, नाना प्रकार से उत्तम रीति से प्राप्त हो।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ वृषगणो वासिष्ठः। २ असितः काश्यपो देवलो वा। ११ भृगुर्वारुणिर्जमदग्निः। ८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। ४ यजत आत्रेयः। ५ मधुच्छन्दो वैश्वामित्रः। ७ सिकता निवावरी। ८ पुरुहन्मा। ९ पर्वतानारदौ शिखण्डिन्यौ काश्यप्यावप्सरसौ। १० अग्नयो धिष्ण्याः। २२ वत्सः काण्वः। नृमेधः। १४ अत्रिः॥ देवता—१, २, ७, ९, १० पवमानः सोमः। ४ मित्रावरुणौ। ५, ८, १३, १४ इन्द्रः। ६ इन्द्राग्नी। १२ अग्निः॥ छन्द:—१, ३ त्रिष्टुप्। २, ४, ५, ६, ११, १२ गायत्री। ७ जगती। ८ प्रागाथः। ९ उष्णिक्। १० द्विपदा विराट्। १३ ककुप्, पुर उष्णिक्। १४ अनुष्टुप्। स्वरः—१-३ धैवतः। २, ४, ५, ६, १२ षड्ज:। ७ निषादः। १० मध्यमः। ११ ऋषभः। १४ गान्धारः॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्रादौ ज्ञानरसविषय उच्यते।

    पदार्थः

    (वाजी) बलवान्, (सहस्रधारः) अनन्तधारः पवमानः सोमः पवित्रकारी ज्ञानरसः (पवित्रम्) पूतं मनः(तिरः) पारं कृत्वा (अव्यम्) अव्ययम् अविनश्वरम् (वारम्) दोषनिवारकं जीवात्मानं प्रति (प्र वि अक्षाः) प्रकर्षेण विविधं क्षरति। [अक्षाः क्षरति। निरु० ५।३] ॥१॥

    भावार्थः

    आचार्यात् प्रवहन् विज्ञानरसो मनोमाध्यमेन जीवात्मानं प्रविश्य तं पुनाति विद्वांसं च करोति ॥१॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।१०९।१६, ‘प्र सु॑वा॒नो अ॑क्षाः’ इति भेदः।

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    A learned person, endowed with a thousand excellent forces, nicely, directly realises the firm purifying soul, the alleviator of miseries.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    The mighty Soma spirit of divinity realised and exalted by the celebrant, streaming in a thousand showers, reaches and sanctifies the pure, protected and sanctified heart of its cherished devotee. (Rg. 9-109-16)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (वाजी सहस्रधारः) બળવાન સોમ-પરમાત્મા અનેક આનંદધારાવાળા (पवित्रं तिरः) પવિત્ર આત્માની અંદર (प्र अक्षाः) પ્રક્ષરિત થાય છે-પહોંચે છે-પ્રાપ્ત થાય છે. (अव्ययं वार वि) પૃથિવીનો બનેલપાર્થિવ દેહ આવરકને દૂર કરીને-હટાવીને [પહોંચે છે] (૧)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    आचार्याद्वारे प्रवाहित होणारा विज्ञानरस मनाच्या माध्यमाने जीवात्म्यामध्ये प्रविष्ट होऊन त्याला पवित्र व विद्वान बनवितो. ॥१॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top