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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1175
ऋषिः - प्रतर्दनो दैवोदासिः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम -
28
शि꣡शुं꣢ जज्ञा꣣न꣡ꣳ ह꣢र्य꣣तं꣡ मृ꣢जन्ति शु꣣म्भ꣢न्ति꣣ वि꣡प्रं꣢ म꣣रु꣡तो꣢ ग꣣णे꣡न꣢ । क꣣वि꣢र्गी꣣र्भिः꣡ काव्ये꣢꣯ना क꣣विः꣡ सन्त्सोमः꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣म꣡त्ये꣢ति꣣ रे꣡भ꣢न् ॥११७५॥
स्वर सहित पद पाठशि꣡शु꣢꣯म् । ज꣣ज्ञान꣢म् । ह꣣र्यत꣢म् । मृ꣣जन्ति । शुम्भ꣡न्ति꣢ । वि꣡प्र꣢꣯म् । वि । प्र꣣म् । मरु꣡तः꣢ । ग꣣णे꣡न꣢ । क꣣विः꣢ । गी꣣र्भिः꣢ । का꣡व्ये꣢꣯न । क꣣विः꣢ । सन् । सो꣡मः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्र꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । ए꣣ति । रे꣡भ꣢꣯न् ॥११७५॥
स्वर रहित मन्त्र
शिशुं जज्ञानꣳ हर्यतं मृजन्ति शुम्भन्ति विप्रं मरुतो गणेन । कविर्गीर्भिः काव्येना कविः सन्त्सोमः पवित्रमत्येति रेभन् ॥११७५॥
स्वर रहित पद पाठ
शिशुम् । जज्ञानम् । हर्यतम् । मृजन्ति । शुम्भन्ति । विप्रम् । वि । प्रम् । मरुतः । गणेन । कविः । गीर्भिः । काव्येन । कविः । सन् । सोमः । पवित्रम् । अति । एति । रेभन् ॥११७५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1175
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम मन्त्र में परमात्मा के आविर्भाव का वर्णन है।
पदार्थ
(शिशुं जज्ञानम्) पैदा होते हुए शिशु के समान अन्तरात्मा में प्रकट होते हुए (हर्यतम्) उस प्रिय सोम परमात्मा को उपासक जन (मृजन्ति) स्तोत्रों से अलंकृत करते हैं। (विप्रम्) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाले उस मेधावी परमात्मा को (मरुतः) प्राण (गणेन) अपने तरङ्गसमूह से (शुम्भन्ति) शोभित करते हैं, (गीर्भिः) प्रेरक वाणियों से (कविः) दिव्य सन्देश देनेवाला और (काव्येन) वेदकाव्य से (कविः) काव्यकार (सन्) होता हुआ (सोमः) सन्मार्गप्रेरक परमेश्वर (रेभन्) उपदेश देता हुआ (पवित्रम् अत्येति) पवित्र हृदय को लाँघकर अन्तरात्मा में पहुँचता है ॥१॥ यहाँ ‘शिशुं जज्ञानम्’ में लुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थ
अपने अन्तरात्मा में परमेश्वर को प्रकट करके भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तोत्रों द्वारा उसे अधिकाधिक अलंकृत और प्रसादित करना चाहिए ॥१॥
पदार्थ
(मरुतः) मुमुक्षुजन*1 (गणेन) स्तुतिवचन से*2 (विप्रम्) विविध कामानाओं के पूर्ण करने वाले—(हर्यतम्) कमनीय*3 (जज्ञानं-शिशुम्) उत्पन्न हुए बच्चे जैसे*4 या शंसनीय*5 साक्षात् हुए सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा को (मृजन्ति शुम्भन्ति) प्राप्त करते*6 और प्रार्थना वचन कहते हैं*7 (कविः-गोभिः) क्रान्तदर्शी परमात्मा स्तुतियों द्वारा तथा (सोमः कविः सन्-काव्येन) शान्तस्वरूप परमात्मा कवि होता हुआ कलात्मक व्यवहार से (रेभन् पवित्रम्-अत्येति) प्रवचन करता हुआ—आशीर्वाद देता हुआ पवित्र उपासक आत्मा को अत्यन्त—आशिष से प्राप्त होता है॥१॥
टिप्पणी
[*1. “मरुतो देवविशः” [श॰ २.५.१.१२]।] [*2. “गणः-वाङ् नाम” [निघं॰ १.११]।] [*3. “हर्यति कान्तिकर्मा” [निघं॰ २.६]।] [*4. लुप्तोपमावाचकालङ्कारः।] [*5. “शिशुः शंसनीयः” [निरु॰ १०.३९]।] [*6. “मार्ष्टि गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४]।] [*7. “शुम्भ भाषणे” [भ्वादि॰]।]
विशेष
ऋषिः—प्रतर्दनः (काम आदि दोषों का ताडन करने वाला उपासक)॥ देवता—सोमः (शान्तस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥<br>
विषय
प्रभु की प्राप्ति
पदार्थ
(मरुतः) = [मरुतः=प्राणाः] प्राणसाधना करके प्राणों के पुञ्ज बने हुए विद्वान् लोग (गणेन) = [गण संख्याने] उस प्रभु के संख्यान व चिन्तन के द्वारा (सोमम्) = अपनी सोम शक्ति को (मृजन्ति) = शुद्ध करते हैं—उसके अन्दर वासना-जन्य उबाल नहीं आने देते। इस सोमरक्षण के द्वारा अपने जीवन को (शुम्भन्ति) = [शोभयन्ति] अलंकृत करते हैं । यह सोम कैसा है ? १. (शिशुम्) = [ शो तनूकरणे] यह बुद्धियों को सूक्ष्म बनानेवाला २. (जज्ञानम्) = यह हमारा सर्वतोमुखी विकास–प्रादुर्भाव करनेवाला है, ३. (हर्यतम्) = [हर्य गतिकान्त्योः] यह हमारे जीवनों को गतिमय बनानेवाला है, अतएव चाहने योग्य है तथा ४. (विप्रम्) = विशेषरूप से हमारा पूरण करनेवाला है— न्यूनताओं को दूर करके पूर्णता प्राप्त कराता है।
इस सोम की रक्षा करनेवाला पुरुष १. (कविः) = क्रान्तदर्शी बनता है— सूक्ष्म-दृष्टिवाला बनकर वस्तुतत्त्व को देखनेवाला होता है । २. (गीर्भिः) = वेदवाणियों के द्वारा तथा (काव्येन) = कवित्व के द्वारा (कविः) =[कौति सर्वा विद्याः] सब ज्ञानों का उपदेष्टा (सन्) = होता हुआ यह (सोमः) = शान्तस्वभाव पुरुष (रेभन्) = प्रभु-नाम का जप करता हुआ (पवित्रम्) = उस पवित्र करनेवाले प्रभु को (अति) = अतिशयेन (एति) = प्राप्त होता है। बड़े पूजित प्रकार से यह प्रभु की ओर जाता है । यह दैवोदासि = प्रभु का दास बनता है और वासनाओं का संहार करनेवाला होने से 'प्रतर्दन' बन जाता है ।
भावार्थ
सोमरक्षा द्वारा हम सोम-प्रभु के प्रिय बनें ।
विषय
missing
भावार्थ
विद्वान् लोग (मरुतः गणेन) अपने प्राणों के गण प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, देवदत्त, कृकल, धनंजय, नाग, कूर्म आदि, अथवा मूर्धा स्थान के ७ प्राणों द्वारा (जज्ञानं) ज्ञान प्राप्त करने हारे (हर्यतं) कान्तिस्वरूप, सब का प्रकाशक (विप्रं) ज्ञान और कर्म से सम्पन्न, (शिशुं) शरीर में शयन करने हारे, आत्मा को (मृजन्ति) शुद्ध करते और (शुम्भन्ति) नाना गुणों से सुशोभित करते हैं। (कविः) क्रान्तदर्शी, तत्वज्ञानी मेधावी, पुरुष (काव्येन) कान्तदर्शी परम ज्ञानी परमेश्वर के ज्ञानमय वेदमय काव्य से (कविः) अन्यों को ज्ञान देने हारा (सन्*) परमगति को प्राप्त मुक्त होकर (सोमः) सोम्यगुणवान्, आनन्द और शमादि से सम्पन्न आत्मा (पवित्रं) सब पतितों के पावन परमात्मा की (रभेन्*) अर्चना, ध्यान, गुणगान करता हुआ (अति एति) कर्म बन्धन को पार कर जाता है।
टिप्पणी
‘वह्नि मरुतो’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
तत्रादौ परमात्माविर्भावं वर्णयति।
पदार्थः
(शिशुं जज्ञानम्) उत्पद्यमानं शिशुमिव अन्तरात्मनि प्रकटीभवन्तम्, (हर्यतम्) प्रियं (तं सोमं) परमात्मानम्, उपासकाः जनाः (मृजन्ति) स्तोत्रैः अलङ्कुर्वन्ति। (विप्रम्) विशेषेण पूरकं मेधाविनं तं परमात्मानम् (मरुतः) प्राणाः (गणेन) तरङ्गसमूहे (शुम्भन्ति) प्रसाधयन्ति। (गीर्भिः) प्रेरिकाभिर्वाग्भिः (कविः) दिव्यसन्देशप्रदाता (काव्येन) वेदकाव्येन च (कविः) काव्यकारः (सन्) भवन् (सोमः) सन्मार्गे प्रेरकः परमेश्वरः (रेभन्) उपदिशन् (पवित्रम् अत्येति) परिपूतं हृदयमतिक्रम्य अन्तरात्मानम् प्राप्नोति ॥१॥ ‘शिशुं जज्ञानम्’ इत्यत्र लुप्तोपमालङ्कारः ॥१॥
भावार्थः
स्वान्तरात्मनि परमेश्वरमाविर्भाव्य स भक्तिभावभरितैः स्तोत्रैर्भूयोभूयोऽङ्करणीयः प्रसादनीयश्च ॥१॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।९६।१७।
इंग्लिश (2)
Meaning
The learned, with their flock of breaths, brighten and decorate the soul, the seeker after knowledge, lovely, and widowed with learning and action. A wise person, with verses of God’s poetry, the Vedas, the instructor of mankind, having attained salvation, contemplating upon God, the purifier of the fallen, crosses the bondage of Karma.
Translator Comment
Flock of breaths: Prana, Apana, Vyana, Udana, Samana, Nag, Kurma, Krikala, Dev Dutta, Dhananjay.^The instructor of mankind refers to a wise person.
Meaning
Dedicated celebrants perceive the presence beatific, manifested and expansive in the experience of nature around, cleanse it like a new born baby, discover and distil it in the spirit and adore it in song. As winds in storm raise as park to blazing fire, bands of admirers celebrate it in its native glory. Omnipresent all-watching sagely divine, exalted to its omniscience and omnipotence in human consciousness by the music of the poetic voice, Soma, divine presence, radiates into the pure human heart loud and bold and transcends the soul to infinite space. (Rg. 9-96-17)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मरुतः) મુમુક્ષુજન (गणेन) સ્તુતિ વચનથી (विप्रम्) વિવિધ કામનાઓને પૂર્ણ કરનારા, (हर्यतम्) કમનીય-ચાહવા યોગ્ય (जज्ञानं शिशुम्) ઉત્પન્ન થયેલાં-જન્મેલાં બાળક સમાન સાક્ષાત્ થયેલ સોમ-શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્માને (मृजन्ति शुम्भन्ति) પ્રાપ્ત કરીને પ્રાર્થના વચન કહે છે. (कविः गोभिः) ક્રાન્તદર્શી પરમાત્મા સ્તુતિઓ દ્વારા તથા (सोमः कविः सन् काव्येन) શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા કવિ બનીને કલાત્મક વ્યવહારથી (रेभन् पवित्रम् अत्येति) પ્રવચન કરીને-આશીર્વાદ આપીને પવિત્ર ઉપાસકને અત્યંત-આશિષ દ્વારા પ્રાપ્ત થાય છે. (૧)
मराठी (1)
भावार्थ
आपल्या अंतरात्म्यात परमेश्वराला प्रकट करून भक्तिभावाने परिपूर्ण स्तोत्रांद्वारे त्याला अधिकाधिक अलंकृत व प्रसादित केले पाहिजे. ॥१॥
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