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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1226
ऋषिः - उचथ्य आङ्गिरसः
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
29
त꣢व꣣ त्य꣡ इ꣢न्दो꣣ अ꣡न्ध꣢सो दे꣣वा꣢꣫ मधो꣣꣬र्व्या꣢꣯शत । प꣡व꣢मानस्य म꣣रु꣡तः꣢ ॥१२२६॥
स्वर सहित पद पाठत꣡व꣢꣯ । त्ये । इ꣣न्दो । अ꣡न्ध꣢꣯सः । दे꣣वाः꣢ । म꣡धोः꣢꣯ । वि । आ꣣शत । प꣡व꣢꣯मानस्य । म꣣रु꣡तः꣢ ॥१२२६॥
स्वर रहित मन्त्र
तव त्य इन्दो अन्धसो देवा मधोर्व्याशत । पवमानस्य मरुतः ॥१२२६॥
स्वर रहित पद पाठ
तव । त्ये । इन्दो । अन्धसः । देवाः । मधोः । वि । आशत । पवमानस्य । मरुतः ॥१२२६॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1226
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 11; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में आनन्द-रस का विषय है।
पदार्थ
हे (इन्दो) आनन्द-रस से भिगोनेवाले परमात्मन् ! (तव) आपके (मधोः) मधुर, (पवमानस्य) पवित्र करनेवाले (अन्धसः) आनन्द-रस का (त्ये) वे (मरुतः) प्रशस्त प्राणवाले (देवाः) दिव्यगुणी विद्वान् लोग (व्याशत) उपभोग करते हैं ॥२॥
भावार्थ
प्राणायाम आदि योगाभ्यास से जिन्होंने अपने सब दोषों को जला डाला है, ऐसे विद्वान् जन ही ब्रह्मानन्द-रस के अधिकारी होते हैं ॥२॥
पदार्थ
(इन्दो) हे आनन्दरसपूर्ण परमात्मन्! (तव पवमानस्य-अन्धसः-मधोः) तुझ आध्यानीय उपासनीय धारारूप में प्राप्त होते हुए मधुमय को२ (त्ये मरुतः-देवाः-व्याशत) वे मुमुक्षु३ देव उपासकजन विशेष रूप से प्राप्त होते हैं॥२॥
विशेष
<br>
विषय
मधु और पवमान
पदार्थ
हे (इन्दो) = सर्वशक्तिमान् प्रभो ! (तव) = आपके - आपके द्वारा शरीर में रस-रुधिरादि क्रम से उत्पन्न किये गये (अन्धसः) = अत्यन्त ध्यान करने योग्य आध्यायनीय सोम का जो (मधोः) = अत्यन्त मधुर हैजीवन में माधुर्य का संचार करनेवाला है और (पवमानस्य) = जीवन को पवित्र करनेवाला है, रोगादि के कृमियों का संहार करके शरीर को नीरोग बनानेवाला है तथा मन से द्वेषादि को दूर करके मन को पवित्र करनेवाला है, उस सोम का (त्ये) = वे लोग (व्याशत) = शरीर में [अश् व्याप्तौ] व्यापन करते हैं जो १. (देवा:) = दिव्य गुणों को प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हैं – ज्ञान की ज्योति से अपने को दीप्त करने का ध्यान करते हैं, तथा २. (मरुतः) = जो प्राणसाधना में लगे हुए हैं ।
दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील, प्राणसाधना में तत्पर ये लोग प्रभु का गायन करने से ‘उचथ्य' कहलाते हंय और व्यसनों का शिकार न होने से शक्तिशाली बने रहने से 'आङ्गिरस' होते हैं ।
भावार्थ
हम सोम का शरीर में ही व्यापन करेंगे तो यह हमारे जीवन को मधुर बनाएगा और हमारे मानस को पवित्र करेगा। सोम का शरीर में व्यापन तब होगा जब हम देव बनने का प्रयत्न करेंगे और प्राणसाधना को अपनाएँगे ।
विषय
missing
भावार्थ
हे (इन्दो) सोम ! आत्मन् ! परमात्मन् ! (पवमानस्य) पवित्र करने हारे, या स्वयं पविन्न, (मधोः) अमृतरसस्वरूप (ते) तेरे (अन्धसः) जीवन धारण करने की शक्ति या उपभोग्य आनन्दरस का (त्ये) वे (मरुतः) प्राणस्वरूप (देवाः) देव अर्थात् तेजस्वी सूर्य आदि और विद्वान्जन (वि आशत) विविध प्रकार से उपभोग करते हैं।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथान्दरसविषयमाह।
पदार्थः
हे (इन्दो) आनन्दरसेन क्लेदक परमात्मन् ! (तव) त्वदीयस्य (मधोः) मधुरस्य, (पवमानस्य) पवित्रीकुर्वाणस्य (अन्धसः) आनन्दरसस्य। [द्वितीयार्थे षष्ठी।] (त्ये) ते (मरुतः) प्रशस्तप्राणाः (देवाः) दिव्यगुणा विद्वांसः (व्याशत) व्यश्नुवते, उपयुञ्जते। [विपूर्वः अशू व्याप्तौ, लडर्थे लुङि प्रथमपुरुषस्य बहुवचने रूपम्] ॥२॥
भावार्थः
प्राणायामादिना योगाभ्यासेन दग्धसकलकल्मषा विद्वांस एव जना ब्रह्मानन्दरसस्याधिकारिणो जायन्ते ॥२॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ९।५१।३, ‘मधो॒र्व्य॑श्नते’ इति पाठः।
इंग्लिश (2)
Meaning
O God, the self-abnegating learned persons, enjoy Thy purifying, divine bliss!
Meaning
Then, O Soma, Spirit of divinity, the noblest, most vibrant generous and brilliant souls have a drink of the elixir of your honey sweet presence flowing exuberantly at the purest. (Rg. 9-51-3)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (इन्दो) હે આનંદરસ પૂર્ણ પરમાત્મન્ ! (तव पवमानस्य अन्धसः मधोः) તું આધ્યાનીય ઉપાસનીય ધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થઈને મધુમયને (ते मरुतः देवाः व्याशत) તે મુમુક્ષુઓ-દેવો-ઉપાસકો વિશેષ રૂપથી પ્રાપ્ત થાય છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
प्राणायाम इत्यादी योगाभ्यासाने ज्यानी आपले दोष जाळून टाकलेले असतात, असे विद्वान लोकच ब्रह्मानंद रसाचे अधिकारी असतात. ॥२॥
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