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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1248
    ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
    56

    अ꣣भि꣡ हि स꣢꣯त्य सोमपा उ꣣भे꣢ ब꣣भू꣢थ꣣ रो꣡द꣢सी । इ꣡न्द्रासि꣢꣯ सुन्व꣣तो꣢ वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣡ ॥१२४८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣भि꣢ । हि । स꣣त्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभे꣡इति꣢ । ब꣣भू꣡थ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣡सि꣢꣯ । सु꣣न्वतः꣢ । वृ꣣धः꣢ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः ॥१२४८॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । हि । सत्य । सोमपाः । सोम । पाः । उभेइति । बभूथ । रोदसीइति । इन्द्र । असि । सुन्वतः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४८॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1248
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का विषय है।

    पदार्थ

    हे (सत्य) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (सोमपाः) शान्ति के रक्षक जगदीश्वर ! आपने (हि) निश्चय ही (उभे रोदसी) द्यावापृथिवी दोनों को (अभिबभूथ) तिरस्कृत किया हुआ है। हे (इन्द्र) सर्वान्तर्यामिन् ! आप (सुन्वतः) शान्ति-स्थापना का यज्ञ करनेवाले को (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥२॥

    भावार्थ

    संसार में जो शान्ति की स्थापना के लिए यत्न करते हैं, उन्हीं का परमेश्वर सखा होता है ॥२॥

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    पदार्थ

    (सत्य सोमपाः-इन्द्र) हे सत्यस्वरूप उपासनारस को पान करने वाले—स्वीकार करने वाले ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू (उभे रोदसी-अभि बभूविथ हि) दोनों द्युलोक पृथिवीलोक को अभिभूत किए हुए उनका स्वामी बना हुआ है (दिवः पतिः) मोक्षधाम का पति है६ (सुन्वतः-वृधः) उपासनारस सम्पादन करने वाले का वर्धक है—बढ़ाने वाला है॥२॥

    विशेष

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    विषय

    दिवः पति

    पदार्थ

    ‘नृमेध आङ्गिरस’–नरमात्र के साथ अपना सम्पर्क रखनेवाला, सबको ‘मैं' के रूप में ही देखनेवाला – स्वार्थ से ऊपर उठा होने के कारण शक्तिशाली पुरुष इस मन्त्र का ऋषि है । प्रभु इससे कहते हैं कि—हे नृमेध! १. तू (सत्य) = सत्य का पालन करनेवाला बना है, २. (हि) = क्योंकि तू (सोमपा:) =  सोम का पान करनेवाला है— अपनी शक्ति की रक्षा करनेवाला है, ३. (उभे रोदसी) = दोनों द्युलोक व पृथिवीलोक को–शरीर व मस्तिष्क को (अभिबभूथ) = अपने वश में रखनेवाला है । ४. तू (इन्द्रः असि) = इन्द्रियों का अधिष्ठाता होने से सचमुच 'इन्द्र' है । ५. (सुन्वतो वृधः) = यज्ञशीलों का तू सदा सहायक व वर्धक है । यह नृमेध प्रत्येक निर्माणात्मक कार्य में हाथ बटानेवाला होता है । ६. और अन्त में (दिवः पतिः) = यह ज्ञान व दिव्यता का स्वामी बनता है ।

    भावार्थ

    हमारा जीवन सत्य हो । हम शक्ति की रक्षा करें, शरीर व मस्तिष्क पर हमारा काबू हो । हम जितेन्द्रिय बनें, यज्ञों के सहायक व ज्ञान के स्वामी बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (सत्य) सत्यस्वरूप परमात्मन् ! (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् ! आप (सोमपाः) समस्त संसार के पालन करने वाले, प्रलय-काल में सब संसार को स्वयं सूक्ष्म कारण रूप में अपने भीतर पान अर्थात लीन करने हारे हो। आप (उभे) दोनों (रोदसी) लोकों को या उत्पत्ति और विनाशरूप दोनों मर्यादाओं को (बभूथ) वश करने में समर्थ हो। आप (सुन्वत) उत्पन्न होते या अपनी शक्ति से प्रेरणा करते हुए (दिवः) सूर्य या प्रकाश को भी (वृधः) बड़े भारी, बढ़ानेहारे (पतिः) मालिक हो।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनरपि परमात्मविषयमाह।

    पदार्थः

    हे (सत्य) सत्यगुणकर्मस्वभाव, (सोमपाः) शान्तिरक्षक जगदीश्वर ! त्वम् (हि) निश्चयेन (उभे रोदसी) उभे द्यावापृथिव्यौ (अभि बभूथ) तिरस्कृतवानसि। [‘बभूविथ इति प्राप्ते’ बभूथाततन्थजगृभ्मववर्थेति निगमे। अ० ७।२।६४,इतीट्प्रतिषेधो निपात्यते।] हे (इन्द्र) सर्वान्तर्यामिन् ! त्वम् (सुन्वतः) शान्तिस्थापनायज्ञं कुर्वतः (वृधः) वर्धयिता, (दिवः पतिः) तेजस्विनो जनस्य च रक्षकः (असि) विद्यसे ॥२॥

    भावार्थः

    जगति ये शान्तिस्थापनाय यतन्ते तेषामेव परमेश्वरः सखा भवति ॥२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।९८।५, अथ० २०।६४।२।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Truthful and Supreme God, Thou art the Creator and Dissolver of the universe. Thou art Mightier than both the worlds. Thou art the Strengthener and Lord of the created heaven!

    Translator Comment

    Both the worlds: Heaven and Earth.

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    Meaning

    Lord eternal and ever true, lover, protector and promoter of the beauty and joy of existence, you are higher and greater than both heaven and earth. Indra, omnipotent lord and master of the light of heaven, you are the inspirer and giver of advancement to the pursuer of the knowledge, beauty and power of the soma reality of life. (Rg. 8-98-5)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (सत्य सोमपाः इन्द्र) હે સત્ય સ્વરૂપ ઉપાસનારસનું પાન કરનાર-સ્વીકાર કરનાર ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મન્ ! તું (उभे रोदसी अभि बभूविथ हि) બન્ને દ્યુલોક અને પૃથિવીલોકને અભિભૂત કરીને તેનો સ્વામી બનેલ છે. (दिवः पतिः) મોક્ષધામનો પતિ છે. (सुन्वतः वृधः) ઉપાસનારસ સંપાદન કરનારાનો વર્ધક છે.-વૃદ્ધિ કરનાર છે. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जगात जे शांती स्थापन करण्यासाठी यत्न करतात, त्यांचाच परमेश्वर मित्र असतो. ॥२॥

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