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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1249
    ऋषिः - नृमेध आङ्गिरसः देवता - इन्द्रः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः काण्ड नाम -
    37

    त्व꣡ꣳ हि शश्व꣢꣯तीना꣣मि꣡न्द्र꣢ ध꣣र्त्ता꣢ पु꣣रा꣡मसि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢꣫ दस्यो꣣र्म꣡नो꣢र्वृ꣣धः꣡ पति꣢꣯र्दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    त्वम् । हि । श꣡श्व꣢꣯तीनाम् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । ध꣣र्त्ता꣢ । पु꣣रा꣢म् । अ꣡सि꣢꣯ । ह꣣न्ता꣢ । द꣡स्योः꣢꣯ । म꣡नोः꣢꣯ । वृ꣡धः꣢꣯ । प꣡तिः꣢꣯ । दि꣣वः꣢ ॥१२४९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    त्वꣳ हि शश्वतीनामिन्द्र धर्त्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥१२४९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    त्वम् । हि । शश्वतीनाम् । इन्द्र । धर्त्ता । पुराम् । असि । हन्ता । दस्योः । मनोः । वृधः । पतिः । दिवः ॥१२४९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1249
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 9; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमेश्वर और राजा के वीरकर्मों का वर्णन करते हैं।

    पदार्थ

    हे (इन्द्र) परमवीर जगदीश्वर वा राजन् ! (त्वं हि) आप निश्चय ही (शश्वतीनाम्) बहुत सी (पुराम्) शत्रु-नगरियों के (धर्ता) भेदन करनेवाले, (दस्योः) हिंसक शत्रु के (हन्ता) विनाशक, (मनोः) मननशील शान्तिप्रिय मनुष्य के (वृधः) बढ़ानेवाले और (दिवः) तेजस्वी जन के (पतिः) रक्षक (असि) हो ॥३॥

    भावार्थ

    जैसे जगदीश्वर दुष्टों का भञ्जक और सज्जनों का रक्षक होता है, वैसे ही राजा को भी होना चाहिए ॥३॥

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    पदार्थ

    (इन्द्र त्वं हि) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू ही (शश्वतीनां पुरां धर्ता-असि) शाश्वतिक या श्रेष्ठ१ आत्माओं२ मुमुक्षुओं—जीवन्मुक्तों का धारणकर्ता है (दस्योः-हन्ता) क्षयकर्ता—कामादि विघ्नों का हननकर्ता (मनोः-वृधः) मननशील जन का वर्धक (दिवः पतिः) मोक्षधाम का पति है॥३॥

    विशेष

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    विषय

    धारण व विदारण

    पदार्थ

    मनुष्य पञ्चकोशों से बने शरीररूप नगरों में सदा से निवास करता आया है - अनादिकाल से उसे कर्मानुसार इनमें बँधना पड़ता रहा है, परन्तु आज यह ‘नृमेध'=लोकयज्ञ करनेवाला बनकर इन बन्धनों को तोड़ पाया है। प्रभु इससे कहते हैं—१. हे (इन्द्र) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता! (त्वं हि) = तू निश्चय से (शश्वतीनां पुराम्) = इन सनातन काल से चली आ रही नगरियों का (धर्ता) = दर्ता – धारण व विदारण करनेवाला बना है । २. तू (दस्योः हन्ता) = अपने में दस्यु का [अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुरन्यव्रतो अमानुषः ] अकर्मण्यता, नास्तिकता, अशास्त्रीयकर्मता व निर्दयता का नाश करनेवाला है । ३. तू (मनो: वृधः) = अपने अन्दर ज्ञान को बढ़ानेवाला है तथा ४. (पति: दिव:) = दिव्यता का रक्षक है। ऐसा बनकर ही तो हम अपने इस जीवनकाल में इन शरीरों का उत्तम धारण करनेवाले बनते हैं [धर्ता] और इस शरीर की समाप्ति पर फिर जन्म न लेने के कारण इन शरीरों का विदारण करनेवाले होते हैं [दर्ता] |

    भावार्थ

    हम इस मानव जीवन को दस्युता शून्य, ज्ञानवृद्ध, दिव्यता से पूर्ण बनाएँ, जिससे फिर जन्म न लेना पड़े ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    हे (इन्द्र) परमात्मन् ! आप (शश्वतीनां) अनादिकाल से चले आये (पुराम्) देहरूप पुरों के (दर्ता) दारण करने हारे, मुक्तिदायक (असि) हो। (दस्योः) नाशकारी अज्ञान के (हन्ता) नाश करने वाले और (मनोः) मननशील ज्ञानी आत्मा के (वृधः) बढ़ाने वाले और (दिवः) सूर्य तथा उसके समान देदीप्यमान आदित्य योगी पुरुषों और ज्ञानी और ज्ञान-प्रकाश के भी (पतिः) स्वामी हो।

    टिप्पणी

    ‘धर्त्ता पुराम्’ इति पाठः सायणसम्मतः। परमार्थतस्तु सायणोऽपि दारयिता इत्येव पर्यायमुल्लिखति। मुम्बई, अजमेरादिमुद्रितो ‘धर्त्ता’ इति पाठस्तु भाष्यकृद्भिरनादृतः। पुराभिन्दुरित्यादिश्रुत्यन्तरविरोधाच्च’।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ प्रतर्दनो दैवोदामिः। २-४ असितः काश्यपो देवलो वा। ५, ११ उचथ्यः। ६, ७ ममहीयुः। ८, १५ निध्रुविः कश्यपः। ९ वसिष्ठः। १० सुकक्षः। १२ कविंः। १३ देवातिथिः काण्वः। १४ भर्गः प्रागाथः। १६ अम्बरीषः। ऋजिश्वा च। १७ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वराः। १८ उशनाः काव्यः। १९ नृमेधः। २० जेता माधुच्छन्दसः॥ देवता—१-८, ११, १२, १५-१७ पवमानः सोमः। ९, १८ अग्निः। १०, १३, १४, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—२-११, १५, १८ गायत्री। त्रिष्टुप्। १२ जगती। १३ बृहती। १४, १५, १८ प्रागाथं। १६, २० अनुष्टुप् १७ द्विपदा विराट्। १९ उष्णिक्॥ स्वरः—२-११, १५, १८ षड्जः। १ धैवतः। १२ निषादः। १३, १४ मध्यमः। १६,२० गान्धारः। १७ पञ्चमः। १९ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमेश्वरस्य नरेशस्य च वीरकर्माणि वर्ण्यन्ते।

    पदार्थः

    हे (इन्द्र) परमवीर जगदीश्वर राजन् वा ! (त्वं हि) त्वं खलु (शश्वतीनाम्) बह्वीनाम्। [शश्वदिति बहुनाम। निघं० ३।१।] (पुराम्) शत्रुनगरीणाम् (धर्ता) भेत्ता, (दस्योः) हिंसकस्य शत्रोः (हन्ता) विनाशयिता, (मनोः) मननशीलस्य शान्तिप्रियस्य (वृधः) वर्धयिता, (दिवः) तेजस्विनः जनस्य च (पतिः) रक्षकः (असि) भवसि ॥३॥

    भावार्थः

    यथा जगदीश्वरो दुष्टानां भञ्जकः सज्जनानां च रक्षको भवति तथैव नृपतिनापि भाव्यम् ॥३॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ८।९८।६, अथ० २०।६४।३।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O God, Thou art the Grantor of salvation to eternal souls, the Slayer of ignorance, the Advancer of a contemplative learned soul, and the Lord of Yogis shining like the Sun!

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    Meaning

    Indra, you are catalyser, breaker and maker, and sustainer of the eternal forms of existence in cosmic dynamics, destroyer of the destroyer and promoter of thoughtful people. You are the guardian of the light of life, sustainer of the heavens of joy. (Rg. 8-98-6)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्द्र त्वं हि) હે ઐશ્વર્યવાન પરમાત્મન્ ! તું જ (शश्वतीनां पुरां धर्ता असि) શાશ્વતિક અર્થાત્ શ્રેષ્ઠ આત્માઓ મુમુક્ષુઓ-જીવન મુક્તોનો ધારણકર્તા છે. (दस्योः हन्ता) ક્ષયકર્તા-કામાદિ વિઘ્નોનો હનનકર્તા, (मनो वृधः) મનનશીલ જનોનો વર્ધક, (दिवः पतिः) મોક્ષધામનો પતિ છે. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    जसा जगदीश्वर दुष्टांचा भञ्जक व सज्जनांचा रक्षक असतो, तसेच राजानेही बनले पाहिजे. ॥३॥

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