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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1299
ऋषिः - पवित्र आङ्गिरसो वा वसिष्ठो वा उभौ वा
देवता - पवमानाध्येता
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
42
पा꣣वमानी꣢꣫र्यो अ꣣ध्ये꣡त्यृषि꣢꣯भिः꣣ स꣡म्भृ꣢त꣣ꣳ र꣡स꣢म् । त꣢स्मै꣣ स꣡र꣢स्वती दुहे क्षी꣣र꣢ꣳ स꣣र्पि꣡र्म꣢꣯धूद꣣क꣢म् ॥१२९९॥
स्वर सहित पद पाठपा꣣वमानीः꣢ । यः । अ꣣ध्ये꣡ति꣢ । अ꣣धि । ए꣡ति꣢꣯ । ऋ꣡षि꣢꣯भिः । स꣡म्भृ꣢꣯तम् । सम् । भृ꣣तम् । र꣡स꣢꣯म् । त꣡स्मै꣢꣯ । स꣡र꣢꣯स्वती । दुहे । क्षीर꣢म् । स꣣र्पिः꣢ । म꣡धु꣢꣯ । उद꣣क꣢म् ॥१२९९॥
स्वर रहित मन्त्र
पावमानीर्यो अध्येत्यृषिभिः सम्भृतꣳ रसम् । तस्मै सरस्वती दुहे क्षीरꣳ सर्पिर्मधूदकम् ॥१२९९॥
स्वर रहित पद पाठ
पावमानीः । यः । अध्येति । अधि । एति । ऋषिभिः । सम्भृतम् । सम् । भृतम् । रसम् । तस्मै । सरस्वती । दुहे । क्षीरम् । सर्पिः । मधु । उदकम् ॥१२९९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1299
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 8; मन्त्र » 2
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 7; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में फिर वेदाध्ययन का फल कहा गया है।
पदार्थ
(यः) जो मनुष्य (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेद के रहस्य जाननेवाले ऋषियों ने जिनके रस का आस्वादन किया है, ऐसी (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाओं का (अध्येति) अर्थज्ञानपूर्वक अध्ययन करता है, (तस्मै) उस मनुष्य के लिए (सरस्वती) वेदमाता (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी, (मधु) शहद और (उदकम्) स्वच्छ जल (दुहे) स्वयं दुह देती है ॥ वेद में अन्यत्र भी कहा गया है—मैंने वरदात्री वेदमाता की स्तुति की है, आप लोग भी उसका अध्ययन-स्तवन करो, क्योंकि वह द्विजों को पवित्र करनेवाली है। वह मुझ वेदाध्येता को आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवचर्स् देकर मेरे आत्मलोक ब्रह्मलोक में निवास करने लगी है। (अथ० १९।७१।१) ॥२॥
भावार्थ
वेद का अध्ययन करके और उसके अनुकूल आचरण करके जो पुरुषार्थी होता है, वह सब सम्पदाओं को प्राप्त कर सकता है ॥२॥
पदार्थ
(तस्मै सरस्वती) उस उपासक के लिये स्तुति वाणी६ (क्षीरं सर्पिः-मधूदकं दुहे) दूध, घृत, मधुर जल को दूहती है॥२॥
टिप्पणी
[पूर्वार्द्ध का अर्थ पूर्व समान जानें]
विशेष
<br>
विषय
दूध-घी-शदह-जल
पदार्थ
(यः) = जो (पावमानी:) = जीवन को पवित्र करनेवाली इन ऋचाओं को (अध्येति) = पढ़ता है, जिनके द्वारा (ऋषिभिः) = ऋषियों ने (रसं सभृतम्) = अपने जीवन में रस का संचार किया, अपने जीवन को रसमय बनाया, (तस्मै) = उस व्यक्ति के लिए (सरस्वती) = ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती (दुहे) = दोहती है, उसका निम्न वस्तुओं से पूरण करती है – [दुह प्रपूरणे] । १. (क्षीरम्) = दूध, जो [ क्षियति] उत्तम निवास व गति का कारण बनता है। दूध के पान से मनुष्य का शरीर नीरोग तो बनता ही है, परन्तु साथ ही वह उत्तम गतिवाला – क्रियाशील भी रहता है २. (सर्पिः) = घृत, जोकि उसे दीप्त बनाता है [दीप्ति], उसके मलों का नाश करता है [क्षरण] और इस प्रकार उसे उत्तम क्रियाशील बनाता है [सृप्] ३. (मधु) = शहद जोकि उसे उत्तम मस्तिष्कवाला बनाता है [मन्यते] ४. (उदकम्) = पानी जो उसके शरीर में शुष्कता नहीं आने देता और उसके शरीर को सदा चमकीला बनाये रखता है, अर्थात् पावमानी ऋचाओं का अध्ययन करनेवाला अपने शरीर के धारण के लिए इन चार वस्तुओं को अधिक महत्त्व देता है और अपने जीवन को उन ऋषियों की भाँति ही रसमय बनाने का ध्यान करता है ।
भावार्थ
दुग्ध, घृत, शहद व जल का समुचित प्रयोग हमारे जीवन को रसमय बनाये।
विषय
missing
भावार्थ
(यः) जो (ऋषिभिः सभृतं रसं) मन्त्रद्रष्टा, विद्वान् ऋषियों द्वारा प्राप्त अर्थात् साक्षात् किये गये ज्ञान रसस्वरूप (पावमानीः) पवमान सोम सम्बन्धी वेद की ऋचाओं का (अध्येति) अध्ययन करता है (तस्मै) उसके लिये (सरस्वती) वेदवाणी (क्षीरं) शुद्ध दुग्ध के समान आत्मज्ञान (सर्पिः) घृत के समान स्नेहपूर्ण, उज्ज्वल, ज्योतिःस्वरूप आत्मदर्शन और (मधु) मधु के समान आनन्ददायक मधुर ब्रह्मा, स्वाद और (उदकं) जल के समान शीतल, शान्तिरस को (दुहे) दोहन करती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ पराशरः। २ शुनःशेपः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४, ७ राहूगणः। ५, ६ नृमेधः प्रियमेधश्च। ८ पवित्रो वसिष्ठौ वोभौ वा। ९ वसिष्ठः। १० वत्सः काण्वः। ११ शतं वैखानसाः। १२ सप्तर्षयः। १३ वसुर्भारद्वाजः। १४ नृमेधः। १५ भर्गः प्रागाथः। १६ भरद्वाजः। १७ मनुराप्सवः। १८ अम्बरीष ऋजिष्वा च। १९ अग्नयो धिष्ण्याः ऐश्वराः। २० अमहीयुः। २१ त्रिशोकः काण्वः। २२ गोतमो राहूगणः। २३ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः॥ देवता—१—७, ११-१३, १६-२० पवमानः सोमः। ८ पावमान्यध्येतृस्तृतिः। ९ अग्निः। १०, १४, १५, २१-२३ इन्द्रः॥ छन्दः—१, ९ त्रिष्टुप्। २–७, १०, ११, १६, २०, २१ गायत्री। ८, १८, २३ अनुष्टुप्। १३ जगती। १४ निचृद् बृहती। १५ प्रागाथः। १७, २२ उष्णिक्। १२, १९ द्विपदा पंक्तिः॥ स्वरः—१, ९ धैवतः। २—७, १०, ११, १६, २०, २१ षड्जः। ८, १८, २३ गान्धारः। १३ निषादः। १४, १५ मध्यमः। १२, १९ पञ्चमः। १७, २२ ऋषभः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनर्वेदाध्ययनफलमाह।
पदार्थः
(यः) यो जनः (ऋषिभिः संभृतं रसम्) वेदरहस्यविद्भिः आस्वादितरसरूपाः (पावमानीः) पवमानदेवताका ऋचः (अध्येति२) अर्थज्ञानपूर्वकम् अधीते (तस्मै) जनाय (सरस्वती) वेदमाता (क्षीरम्) दुग्धम्, (सर्पिः) घृतम्, (मधु) माक्षिकम्, (उदकम्) स्वच्छं तोयं च (दुहे) स्वयमेव दुग्धे। [दुह प्रपूरणे, कर्मकर्तरि ‘न दुहस्नुनमाम्’। अ० ३।१।८९ इत्यादिना यक् प्रतिषिध्यते। ‘लोपस्त आत्मनेपदेषु’। अ० ७।१।४१ इति तलोपः] ॥ उक्तं चान्यत्र—‘स्तु॒ता मया॑ वर॒दा वे॑दमा॒ता प्रचो॑दयन्तां पावमा॒नी द्विजाना॑म्। आयुः॑ प्रा॒णं प्र॒जां प॒शुं की॒र्तिं द्रवि॑णं ब्रह्मवर्च॒सम्। मह्यं॑ द॒त्त्वा व्र॑जत ब्रह्मलो॒कम् ॥’ अथ० १९।७१।१ ॥२॥
भावार्थः
वेदाध्ययनेन तदनुकूलाचरणेन च पुरुषार्थिना सता सर्वाः सम्पदः प्राप्तुं शक्यन्ते ॥२॥
इंग्लिश (2)
Meaning
For him, Who studies the ennobling Vedic verses, the essence of which is expounded by the Rishis (Seers), the Vedic speech pours forth spiritual knowledge, pure like milk, spiritual light, thick like the clarified butter, joy sweet like the honey, and mental tranquility, cold like water.
Meaning
Whoever studies the Rks, sanctifying nectar preserved by the sages, for him, mother Sarasvati, omniscient divinity, herself distils and offers the milk, butter, honey and the nectar essence of life. (Rg. 9-67-32)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ: (यः) જે ઉપાસક (पावमानीः अध्येति) આનંદધારારૂપમાં પ્રાપ્ત થનાર પરમાત્માની સ્તુતિઓને પોતાની અંદર અધિગત કરે છે-આત્મામાં સમાવી લે છે. (ऋषिभिः सम्भृतं रसम्) જે સ્તુતિઓનાં કવિઓસ્તુતિકર્તાજનોને રસ-આનંદરસ પવમાન પરમાત્મરસને પોતાની અંદર પરંપરાથી સમ્યક્ ભરી-ધારા ભરીને-ધારણ કરેલ છે. (तस्मै सरस्वती) તે ઉપાસકને માટે સ્તુતિ વાણી (क्षीरं सर्पिः मधूदकं दुहे) દૂધ થી, મયુર જવાનું દોહન કરે છે. (૨)
मराठी (1)
भावार्थ
वेदाचे अध्ययन करून व त्यानुसार आचरण करून जो पुरुषार्थी बनतो, तो सर्व संपदांना प्राप्त करू शकतो. ॥२॥
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