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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1315
    ऋषिः - सप्तर्षयः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - द्विपदा विराट् स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    38

    प꣡रि꣢ स्वा꣣न꣡श्चक्ष꣢꣯से देव꣣मा꣡द꣢नः꣣ क्र꣢तु꣣रि꣡न्दु꣢र्विचक्ष꣣णः꣢ ॥१३१५

    स्वर सहित पद पाठ

    प꣡रि꣢꣯ । स्वा꣣नः꣢ । च꣡क्ष꣢꣯से । दे꣣वमा꣡द꣢नः । दे꣣व । मा꣡द꣢꣯नः । क्र꣡तुः꣢꣯ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । वि꣣चक्षणः꣢ । वि꣣ । चक्षणः꣢ ॥१३१५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    परि स्वानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुर्विचक्षणः ॥१३१५


    स्वर रहित पद पाठ

    परि । स्वानः । चक्षसे । देवमादनः । देव । मादनः । क्रतुः । इन्दुः । विचक्षणः । वि । चक्षणः ॥१३१५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1315
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 12; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 10; खण्ड » 9; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में परमात्मा के ध्यान का विषय है।

    पदार्थ

    (देवमादनः) विद्वानों को आनन्दित करनेवाला, (क्रतुः) कर्ममय अर्थात् जगद्धारण के कर्मों का कर्ता, (विचक्षणः) विशेषरूप से सबका द्रष्टा, (इन्दुः) तेजस्वी और रस से भिगोनेवाला परमेश्वर (चक्षसे) दर्शनार्थ, अर्थात् साक्षात्कार के लिए (परि स्वानः) हमसे ध्यान किया जाता है ॥३॥

    भावार्थ

    परमात्मा का साक्षात्कार करके हम भी उसके समान दूसरों को आनन्दित करनेवाले, कर्मयोगी, विवेकदृष्टि से सम्पन्न, तेजस्वी और परोपकारी बनें ॥३॥

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    पदार्थ

    (इन्दुः) आनन्दरसपूर्ण परमात्मा (देवमादनः) मुमुक्षु उपासकों का हर्षानेवाला (विचक्षणः) सर्वज्ञ (क्रतुः) जगत् रचयिता (स्वानः) उपासित हुआ (चक्षसे) उपासक के दर्शनार्थ (परि) परिप्राप्त होता है॥३॥

    विशेष

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    विषय

    सोमपान के छह लाभ

    पदार्थ

    हे सोम! तू जब शरीर में व्याप्त होता है तब १. (परिस्वान:) = [परि + सु + आनः] अङ्ग-प्रत्यङ्ग । में बड़ी उत्तमता से प्राणशक्ति भरनेवाला होता है [आनयति ] | सारी प्राणशक्ति सोम के कारण ही है। २. (चक्षसे) = तू दृष्टिशक्ति को बढ़ानेवाला है। वीर्यरक्षा से चक्षु अपना कार्य करने में बड़ी समर्थ होती हैं। ३. (देवमादन:) = तू ही मनुष्यों को 'देव' बनानेवाला है और उनके जीवनों में 'मद' हर्ष भरनेवाला है, देवताओं को एक मस्ती प्राप्त करानेवाला है । ४. (क्रतुः) = तू उनके जीवनों को यज्ञमय बनाता है। वस्तुतः सोमरक्षा से मनुष्य की मनोवृत्ति उत्तम होती है और परिणामतः वह स्वार्थ से ऊपर उठ जाता है । ५. (इन्द्रः) = यह अपने पान करनेवाले को शक्तिशाली बनाता है [इन्द् to be powerful] । ६. (विचक्षणः) = यह हमारे ज्ञान को बढ़ाकर हमें विशिष्ट दृष्टिकोणवाला बनाता है। 

    भावार्थ

    सोम हमें प्राणित करता है, दृष्टिशक्ति को बढ़ाता है, एक दिव्य मस्ती देता है, हमारे जीवन को यज्ञिय बनाता है, शक्तिशाली बनाता है तथा हमारे ज्ञान को बढ़ाने का साधन होता है।

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    विषय

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    भावार्थ

    (इन्दुः) परमैश्वर्यवान् उक्त सोम रूप शुक्र का पालन करने हारा ब्रह्मचारी, (विचक्षणः) नाना प्रकार के विज्ञानों का दष्टश, (क्रतुः) कर्म करने हारा, (देवमादनः) अपनी इन्द्रियों और दिव्यगुण युक्त विद्वान् पुरुषों को हृष्ट पुष्ट करने और आनन्द देने हारा, (स्वानः) स्वयं निष्पन्न होता हुआ (परिचक्षसे) सब के देखने योग्य होजाता है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ पराशरः। २ शुनःशेपः। ३ असितः काश्यपो देवलो वा। ४, ७ राहूगणः। ५, ६ नृमेधः प्रियमेधश्च। ८ पवित्रो वसिष्ठौ वोभौ वा। ९ वसिष्ठः। १० वत्सः काण्वः। ११ शतं वैखानसाः। १२ सप्तर्षयः। १३ वसुर्भारद्वाजः। १४ नृमेधः। १५ भर्गः प्रागाथः। १६ भरद्वाजः। १७ मनुराप्सवः। १८ अम्बरीष ऋजिष्वा च। १९ अग्नयो धिष्ण्याः ऐश्वराः। २० अमहीयुः। २१ त्रिशोकः काण्वः। २२ गोतमो राहूगणः। २३ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः॥ देवता—१—७, ११-१३, १६-२० पवमानः सोमः। ८ पावमान्यध्येतृस्तृतिः। ९ अग्निः। १०, १४, १५, २१-२३ इन्द्रः॥ छन्दः—१, ९ त्रिष्टुप्। २–७, १०, ११, १६, २०, २१ गायत्री। ८, १८, २३ अनुष्टुप्। १३ जगती। १४ निचृद् बृहती। १५ प्रागाथः। १७, २२ उष्णिक्। १२, १९ द्विपदा पंक्तिः॥ स्वरः—१, ९ धैवतः। २—७, १०, ११, १६, २०, २१ षड्जः। ८, १८, २३ गान्धारः। १३ निषादः। १४, १५ मध्यमः। १२, १९ पञ्चमः। १७, २२ ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ परमात्मध्यानविषयमाह।

    पदार्थः

    (देवमादनः) विदुषामानन्दयिता, (क्रतुः) कर्ममयः जगद्धारणकर्मणां कर्ता, (विचक्षणः) विशेषेण सर्वेषां द्रष्टा, (इन्दुः) तेजस्वी रसेन क्लेदकश्च परमेश्वरः (चक्षसे) दर्शनाय, साक्षात्काराय। [चष्टे पश्यतिकर्मा। निघं० ३।११। तुमर्थे असेन् प्रत्ययः।] (परि स्वानः) परिषूयमाणः, अस्माभिर्ध्यायमानः भवति ॥३॥

    भावार्थः

    परमात्मानं साक्षात्कृत्य वयं तद्वत् परेषामानन्दयितारः कर्मयोगिनो विवेकदृष्टिसम्पन्नास्तेजस्विनः परोपकारिणश्च भवेम ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    A Brahmchari, the preserver of semen, the seer of different sorts of knowledge, the performer of noble deeds, the bringer of joy to the learned, being accomplished, becomes the cynosure of all.

    Translator Comment

    Brahmchari: One who takes the vow of celibacy.

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    Meaning

    Celebrated in our thoughts and perceptions, joy of the sages, power of holy yajnic action, brilliant and blissful, all intelligent and omniscient, we adore you for the augmentation of our intelligence and enlightenment. (Rg. 9-107-3)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्दुः) આનંદરસપૂર્ણ પરમાત્મા (देवमादनः) મુમુક્ષુ ઉપાસકોને આનંદ આપનાર(विचक्षणः) સર્વજ્ઞ (क्रतुः) જગત રચયિતા (स्वानः) ઉપાસિત થઈને (चक्षसे)  ઉપાસકનાં દર્શન માટે (परि) પરિપ્રાપ્ત થાય છે. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमात्म्याचा साक्षात्कार करून आम्हीही त्याच्याप्रमाणे इतरांना आनंदित करणारे, कर्मयोगी, विवेक दृष्टीने संपन्न, तेजस्वी व परोपकारी बनावे. ॥३॥

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