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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1357
    ऋषिः - पराशरः शाक्त्यः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    47

    आ꣡ जागृ꣢꣯वि꣣र्वि꣡प्र꣢ ऋ꣣तं꣢ म꣢ती꣣ना꣡ꣳ सोमः꣢꣯ पुना꣣नो꣡ अ꣢सदच्च꣣मू꣡षु꣢ । स꣡प꣢न्ति꣣ यं꣡ मि꣢थु꣣ना꣢सो꣣ नि꣡का꣢मा अध्व꣣र्य꣡वो꣢ रथि꣣रा꣡सः꣢ सु꣣ह꣡स्ताः꣢ ॥१३५७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ꣢ । जा꣡गृ꣢꣯विः । वि꣡प्रः꣢꣯ । वि । प्रः꣣ । ऋत꣢म् । म꣣तीना꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣सदत् । चमू꣡षु꣢ । स꣡प꣢꣯न्ति । यम् । मि꣣थुना꣡सः꣢ । नि꣡का꣢꣯माः । नि । का꣣माः । अध्वर्य꣡वः꣢ । र꣣थिरा꣡सः꣢ । सु꣣ह꣡स्ताः꣢ । सु꣣ । ह꣡स्ताः꣢꣯ ॥१३५७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ जागृविर्विप्र ऋतं मतीनाꣳ सोमः पुनानो असदच्चमूषु । सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः ॥१३५७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    आ । जागृविः । विप्रः । वि । प्रः । ऋतम् । मतीनाम् । सोमः । पुनानः । असदत् । चमूषु । सपन्ति । यम् । मिथुनासः । निकामाः । नि । कामाः । अध्वर्यवः । रथिरासः । सुहस्ताः । सु । हस्ताः ॥१३५७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1357
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में परमात्मा का विषय है।

    पदार्थ

    (जागृविः) जागरूक, (विप्रः) विशेषरूप से पूर्णता प्रदान करनेवाला, (मतीनाम्) बुद्धियों के (ऋतम्) व्यापार को (पुनानः) पवित्र करनेवाला, (सोमः) सत्कर्मों की प्रेरणा देनेवाला परमेश्वर (चमूषु) आत्मा, मन, प्राण आदि में वा सूर्य, चन्द्र, भूमण्डल आदि लोकों में (आ असदत्) नियामकरूप से स्थित है, (यम्) जिस परमेश्वर को (निकामाः) निरन्तर पाने की लौ लगाये हुए, (रथिरासः) उत्कृष्ट शरीर-रथवाले, (सुहस्ताः) सिद्धहस्त (अध्वर्यवः) उपासना-यज्ञ के इच्छुक (मिथुनासः) स्त्री-पुरुष (सपन्ति) प्राप्त कर लेते हैं ॥१॥

    भावार्थ

    शरीर और बाह्य जगत् का जो सञ्चालन करता है, उस जगदीश्वर की सबको भली-भाँति उपासना करनी चाहिए ॥१॥

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    पदार्थ

    (जागृविः) जागरूक—जागरणशील—सदा सावधान ज्ञानपूर्ण (विप्रः) विशेष कामनापूरक (सोमः) शान्तस्वरूप परमात्मा (मतीनाम्-ऋतं पुनानः) मेधावी प्रार्थनाकर्ताओं के५ सत्य प्रार्थनीय विषय को प्राप्त कराने के हेतु (चमूषु-आसदत्) अदन—स्वादन पात्रों—मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कारों में आ बैठता है (यम्) जिसको (मिथुनासः) मिले हुए (निकामाः) बाह्यकामनाओं को छोड़ निहित—आध्यात्मिक कामनाओं वाले (रथिरासः) रमणीय मोक्ष के अधिकारी (सुहस्ताः) शोभन हस्त—यशोभागी (अध्वर्यवः सपन्ति) अध्यात्मयज्ञकर्ता उपासकजन स्पर्श करते हैं या सम्प्राप्त करते हैं१॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—पराशरः (दोषों का अत्यन्त नष्टकर्ता उपासक)॥ देवता—पवमानः सोमः (धारारूप में आने वाला परमात्मा)॥ छन्दः—त्रिष्टुप्॥<br>

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    विषय

    सर्वव्यापक सोम का 'सवन'

    पदार्थ

    १. (आजागृविः) = चारों ओर जागरणशील, अर्थात् सर्वत्र सावधान, सबका सदा ध्यान करनेवाले प्रभु हैं। उनसे कोई बात छिपी नहीं, कोई बात अज्ञात नहीं । २. (मतीनाम्) = मननशील पुरुषों के अन्दर (ऋत) = सत्य ज्ञान को (विप्रः) = विशेषरूप से पूरण करनेवाले हैं | हृदयस्थ रूप से वे प्रभु सदा सत्य ज्ञान दे रहे हैं । ३. (पुनानः) = इस ज्ञान के द्वारा वे प्रभु उनके जीवनों को पवित्र बना रहे हैं पवित्रता के लिए एकमात्र साधन ज्ञान ही है । ज्ञान वह अग्नि है, जिसमें सब मलिनताएँ भस्म हो जाती हैं। ४. (सोमः) = यह अत्यन्त शान्त प्रभु (चमूषु) = द्युलोक व पृथिवीलोक में, अर्थात् तदन्तर्गत प्राणिमात्र में और पदार्थमात्र में (असदत्) = रह रहे हैं, विराजमान हैं। कोई भी स्थल प्रभु की व्याप्ति से शून्य नहीं । 

    ये प्रभु वे हैं—(यम्) = जिनको १. (मिथुनास:) = दम्पती - पति-पत्नी क्या पुरुष और क्या स्त्री सभी (सपन्ति) = पूजते [worship] हैं, २. (निकामा:) = विभिन्न कामनावाले पुरुष (यम्) = जिसके (सपन्ति) = सम्पर्क [contect] में आते हैं, भिन्न-भिन्न कामनाओं से पुरुष उस प्रभु को भजते हैं। प्रभु भी उसी प्रकार उसकी कामना को पूर्ण करते हैं, ३. (यम्) = जिस प्रभु को (अध्वर्यवः) = हिंसा से शून्य जीवनवाले (सपन्ति) = प्राप्त [obtain] करते हैं। पूर्ण अहिंसामय जीवन ही प्रभु-प्राप्ति का मुख्य साधन है, ४. (यम्) = जिस प्रभु को (रथिरासः) = उत्तम रथोंवाले (सपन्ति) = अन्त में छूते [touch] हैं । यह शरीररूप रथ प्रभु-प्राप्ति के लिए ही दिया गया है, इसे रथिर व्यक्ति ही यात्रा पूर्ण करके छूनेवाले होते हैं, ५. (यम्) = जिस प्रभु की (सुहस्ताः) = उत्तम हाथोंवाले– हाथों से उत्तम कर्म करनेवाले ही (सपन्ति) = [ to obey, to perform] आज्ञाओं का पालन करते हुए तदाज्ञानुसार कर्म करते हैं । प्रभु ने यही तो आज्ञा दी थी कि 'कर्मणे हस्तौ विसृष्टौ'- कर्म के लिए तुझे ये हाथ दिये गये हैं, अत: कर्म करते हुए सुहस्त उसके आदेश का पालन कर ही रहा है।

    इस प्रकार प्रभु के सम्पर्क में आनेवाले ये व्यक्ति 'पराशर ' हैं – शत्रुओं को सुदूर शीर्ण करनेवाले हैं तथा ‘शाक्त्य’=शक्ति के पुतले होते हैं । 
     

    भावार्थ

    —हम उस सर्वव्यापक सोम का ‘सवन' [पूजन] करनेवाले बनें । 

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    (जागृविः) जागरणशील, कभी आलस्य न करने हारा, सर्वदा सचेत, (मतीनां) मनन करनेहारी बुद्धियों या मनन करने योग्य वेदवाणियों के (ऋतं) सारभूत सत्यज्ञान को (पुनानः) प्रकाशित करता हुआ (विप्रः) मेधाबुद्धि से सम्पन्न विद्वान् (सोमः) शम, दम आदि साधनों से सम्पन्न होकर (चमूषु) प्रजाओं में (असदत्) विराजता है। (यं) जिसके पास (निकामः) नाना प्रकार की कामनाओं से युक्त (मिथुनासः) गृहस्थ नर नारी (अध्वर्यवः) अपने यज्ञादि कर्मकाण्ड में लगे हुए विद्वान्, (रथिरासः) देहधारी, (सुहस्ताः) उत्तम कर्म करने में कुशल पुरुष भी (सपन्ति) ज्ञान और सत्संग प्राप्त करने के लिये आते हैं।

    टिप्पणी

    ‘ऋता मतीना’।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१, ६ मेधातिथिः काण्वः। १० वसिष्ठः। ३ प्रगाथः काण्वः। ४ पराशरः। ५ प्रगाथो घौरः काण्वो वा। ७ त्र्यरुणत्रसदस्यू। ८ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा। ९ हिरण्यस्तूपः। ११ सार्पराज्ञी। देवता—१ इध्मः समिद्धो वाग्निः तनूनपात् नराशंसः इन्द्रश्चः क्रमेण। २ आदित्याः। ३, ५, ६ इन्द्रः। ४,७-९ पवमानः सोमः। १० अग्निः। ११ सार्पराज्ञी ॥ छन्दः-३-४, ११ गायत्री। ४ त्रिष्टुप। ५ बृहती। ६ प्रागाथं। ७ अनुष्टुप्। ४ द्विपदा पंक्तिः। ९ जगती। १० विराड् जगती॥ स्वरः—१,३, ११ षड्जः। ४ धैवतः। ५, ९ मध्यमः। ६ गान्धारः। ८ पञ्चमः। ९, १० निषादः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्रादौ परमात्मविषयमाह।

    पदार्थः

    (जागृविः) जागरूकः, (विप्रः) विशेषेण पूरकः, (मतीनाम्) बुद्धीनाम् (ऋतम्) व्यापारम्। [ऋ गतिप्रापणयोः, निष्ठायां रूपम्।] (पुनानः) पवित्रीकुर्वन्, (सोमः) सत्कर्मसु प्रेरकः परमेश्वरः (चमूषु) आत्ममनःप्राणादिषु सूर्यचन्द्रभूमण्डलादिषु वा लोकेषु (आ असदत्) नियामकत्वेन आनिषण्णोऽस्ति, (यम्) सोमं परमेश्वरम् (निकामाः) निरन्तरं कामयमानाः (रथिरासः) उत्कृष्टदेहरथवन्तः, (सुहस्ताः) सिद्धहस्ताः (अध्वर्यवः) उपासनायज्ञकामाः। [अध्वर्युः अध्वरयुः, अध्वरं युनक्ति, अध्वरस्य नेता, अध्वरं कामयत इति वा। निरु० १।७।] (मिथुनासः) स्त्रीपुरुषाः (सपन्ति) प्राप्नुवन्ति। [षप समवाये, भ्वादिः। ‘सपतिः स्पृशतिकर्मा’ इति निरुक्तम्। (५।१६)] ॥१॥

    भावार्थः

    देहस्य बाह्यजगतश्च सञ्चालनं यः करोति स जगदीश्वरः सर्वैः समुपासनीयः ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    A vigilant learned person, possessing mental quietness and self control, preaching the essence of the true-knowledge of cogitable Vedic verses, manifests himself amongst the people. To him resort the married couples with manifold desires, and in their fine conveyances the learned priests skilled in the performance of noble deeds.

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    Meaning

    Ever wakeful, all intelligent, ever true, pure, purifying and celebrated, Soma abides in the heartcore of the visionary sages, and him, loving yajakas dedicated to yajna of love and non-violence, noble of action commanding their body chariot of personality, together serve, adore and worship with high love and devotion of their mind and soul. (Rg. 9-97-37)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (जागृविः) જાગરુક-જાગરણશીલ-સદા સાવધાન જ્ઞાનપૂર્ણ (विप्रः) વિશેષ કામનાપૂરક સોમઃશાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા (मतीनाम् ऋतं पुनानः) મેધાવી પ્રાર્થના-કર્તાને સત્ય પ્રાર્થનીય વિષયને પ્રાપ્ત કરાવવા માટે (चमूषु आसदत्) અદન-સ્વાદન પાત્રો-મન, બુદ્ધિ, ચિત્ત, અહંકારોમાં આવીને બેસે છે. (यम्) જેને (मिथुनासः) મળેલા (निकामाः) બાહ્ય-કામનાઓને છોડીને નિહિત-અધ્યાત્મ કામનાઓવાળા (रथिरासः) રમણીય મોક્ષના અધિકારી (सुहस्ताः) શોભન હસ્ત-યશોભાગી (अध्वर्यवः सपन्ति) અધ્યાત્મયજ્ઞકર્તા ઉપાસકજનો સ્પર્શ કરે છે અથવા સારી રીતે પ્રાપ્ત કરે છે. (૧)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    शरीर व बाह्य जगाचे जो संचालन करतो, त्या जगदीश्वराची सर्वांनी चांगल्या प्रकारे उपासना केली पाहिजे ॥१॥

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