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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1359
    ऋषिः - पराशरः शाक्त्यः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    36

    स꣡ व꣢र्धि꣣ता꣡ वर्ध꣢꣯नः पू꣣य꣡मा꣢नः꣣ सो꣡मो꣢ मी꣣ढ्वा꣢ꣳ अ꣣भि꣢ नो꣣ ज्यो꣡ति꣢षावीत् । य꣡त्र꣢ नः꣣ पू꣡र्वे꣢ पि꣣त꣡रः꣢ पद꣣ज्ञाः꣢ स्व꣣र्वि꣡दो꣢ अ꣣भि꣡ गा अद्रि꣢꣯मि꣣ष्ण꣢न् ॥१३५९॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः꣢ । व꣣र्धिता꣢ । व꣡र्ध꣢꣯नः । पू꣣य꣡मा꣢नः । सो꣡मः꣢꣯ । मी꣣ढ्वा꣢न् । अ꣣भि꣢ । नः꣣ । ज्यो꣡ति꣢꣯षा । आ꣣वीत् । य꣡त्र꣢꣯ । नः꣢ । पू꣡र्वे꣢꣯ । पि꣣त꣡रः꣢ । प꣣दज्ञाः꣢ । प꣣द । ज्ञाः꣢ । स्व꣣र्वि꣡दः꣢ । स्वः꣣ । वि꣡दः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । गाः । अ꣡द्रि꣢꣯म् । अ । द्रि꣣म् । इष्ण꣢न् ॥१३५९॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वाꣳ अभि नो ज्योतिषावीत् । यत्र नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमिष्णन् ॥१३५९॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सः । वर्धिता । वर्धनः । पूयमानः । सोमः । मीढ्वान् । अभि । नः । ज्योतिषा । आवीत् । यत्र । नः । पूर्वे । पितरः । पदज्ञाः । पद । ज्ञाः । स्वर्विदः । स्वः । विदः । अभि । गाः । अद्रिम् । अ । द्रिम् । इष्णन् ॥१३५९॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1359
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 4; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में उपासक अपनी कामना प्रकट कर रहा है।

    पदार्थ

    (वर्धिता) बढ़ानेवाला, (वर्धनः) स्वयं बढ़ा हुआ अर्थात् महिमा को प्राप्त, (पूयमानः) उपासकों से प्राप्त किया जाता हुआ, (मीढ़्वान्) सुख सींचनेवाला, (सोमः) जगत् का रचयिता परमेश्वर (ज्योतिषा) ज्योति के द्वारा (नः) हमारी (अभि आवीत्) रक्षा करे, (यत्र) जिसके आश्रय में विद्यमान (पदज्ञाः) मोक्षपद के ज्ञाता, (नः) हमारे (पूर्वे पितरः) श्रेष्ठ पितृजन (गाः अभि) दिव्य प्रकाश की किरणों को प्राप्त करने के लिए (अद्रिम्) पर्वत के समान रुकावट डालनेवाले तमोजाल को (इष्णन्) दूर कर देते हैं, तथा (स्वर्विदः) मोक्ष के आनन्द को प्राप्त करनेवाले हो जाते हैं ॥३॥

    भावार्थ

    ज्योतिर्मय परमात्मा की उपासना से मनुष्य भी ज्योतिष्मान् होकर मोक्ष पा लेते हैं ॥३॥

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    पदार्थ

    (सः-सोमः) वह शान्तस्वरूप परमात्मा (वर्धिता वर्धनः) बढ़ाने वाला स्वयं समृद्ध (मीढ्वान्) सुखवर्षक (पुनानः) प्राप्त होता हुआ (नः) हमें (ज्योतिषा) अपनी ज्योति से (आवीत्) रक्षा करता है, तथा (यत्र) जहाँ (नः) हमारे (पूर्वे पितरः) पूर्व गुरु आदि उपासक (पदज्ञाः स्वर्विदः) परमपद परमात्मा को जानने वाले मोक्ष को प्राप्त कर चुके हुए (गाः-अभि-अद्रिम्-इष्णन्) स्तुति वाणियों को अभिगत कर—जीवन में सेवन कर अखण्ड मोक्ष चाहा करते हैं॥३॥

    विशेष

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    विषय

    प्रभु-प्राप्ति का मार्ग

    पदार्थ

    १. (सः) = प्रभु (वर्धनः) = सदा से वृद्ध हैं। [वर्धमानं स्वे दमे] (वर्धिताः) = अपने भक्तों के बढ़ानेवाले हैं। २. (पूयमानः) = अपने भक्तों को पवित्र करनेवाले हैं । ३. (मीढ्वान्) = हमपर सुखों का वर्षण करनेवाले हैं । ४. वे (सोमः) = शान्त प्रभु (नः) = हमें (ज्योतिषा) = ज्ञान की ज्योति से (अभिआवित्) = अन्दर व बाहर से रक्षित करें। वे प्रभु तेजस्विता की प्राप्ति के द्वारा बाह्य शत्रुओं से तथा ज्ञान की प्राप्ति के द्वारा अन्तः शत्रुओं से सुरक्षित करते हैं ।

    ५. (यत्र) = जिस स्थिति में पहुँचकर, अर्थात् अन्तः व बाह्य शत्रुओं से सुरक्षित होकर (नः) = हमारे
    [क] पूर्वे=अपना पूरण करनेवाले [पृ पूरणे], अपनी न्यूनताओं को दूर करनेवाले, [ख] पितरः=रक्षण के कार्यों में लगे हुए [पा रक्षणे], [ग] पदज्ञाः= मार्ग को जाननेवाले, अर्थात् संसार में 'कौन-सा मृत्यु का मार्ग है और कौन-सा ब्रह्म-प्राप्ति का' इसको समझनेवाले, [घ] स्वर्विदः - प्रकाश को प्राप्त करनेवाले, [ङ] अभिगा: = वेदवाणी की ओर चलनेवाले अद्रिम्-इस अविदारणीय [न दृणन्ति यम्] तथा आदरणीय [आदरयितव्यः] प्रभु को इष्णन्- चाहते हैं ।

    भावार्थ

    हम प्रभु-प्राप्ति के मार्ग पर चलें । वह मार्ग यह है – १. हम अपना पूरण करें, २. रक्षण के कार्यों में लगें, ३. 'आर्जव = सरलता ब्रह्म-मार्ग हैं' इसे समझें, ४. प्रकाश प्राप्त करें, ५. वेदवाणी की ओर चलें, ६. उस अविदारणीय प्रभु की ही कामना करें ।

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    विषय

    missing

    भावार्थ

    (सः) वह (वर्धिता) सब की वृद्धि करने हारा और (वर्धनः) स्वयं भी आगे बढ़ाने हारा, या सबके संशयों को काटने हारा और बन्धनों का भी मूलोच्छेद करने हारा (पूयमानः) शुद्ध पवित्र ज्ञानवान् होकर (सोमः) शमदमादि षट्क सम्पत्ति से युक्त विद्वान् (मीढ्वान्) आनन्द और सुखों का वर्षक, धर्ममेघ समाधि से सिद्ध, (ज्योतिषा) आत्मज्ञानमय ज्योति से (नः) हमें (अभि आवीत्) उस स्थान पर ले जावे (यत्र) जहां (नः) हमारे (पदज्ञाः) परम पद, प्राप्त ब्रह्म के ज्ञाता (स्वर्विदः) मुक्ति सुख का लाभ करने हारे (गाः) वेदवाणियों को (अभि) साक्षात् करके (पूर्वे पितरः) पूर्व पिता पितामह गुरु आदि पुरुषा एवं आचार्य लोग (अद्रिम्) उस अखण्ड ब्रह्म को (इष्णन) प्राप्त होते हैं।

    टिप्पणी

    ‘अद्रिमुष्णन्’ इति ऋ०।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१, ६ मेधातिथिः काण्वः। १० वसिष्ठः। ३ प्रगाथः काण्वः। ४ पराशरः। ५ प्रगाथो घौरः काण्वो वा। ७ त्र्यरुणत्रसदस्यू। ८ अग्नयो धिष्ण्या ऐश्वरा। ९ हिरण्यस्तूपः। ११ सार्पराज्ञी। देवता—१ इध्मः समिद्धो वाग्निः तनूनपात् नराशंसः इन्द्रश्चः क्रमेण। २ आदित्याः। ३, ५, ६ इन्द्रः। ४,७-९ पवमानः सोमः। १० अग्निः। ११ सार्पराज्ञी ॥ छन्दः-३-४, ११ गायत्री। ४ त्रिष्टुप। ५ बृहती। ६ प्रागाथं। ७ अनुष्टुप्। ४ द्विपदा पंक्तिः। ९ जगती। १० विराड् जगती॥ स्वरः—१,३, ११ षड्जः। ४ धैवतः। ५, ९ मध्यमः। ६ गान्धारः। ८ पञ्चमः। ९, १० निषादः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथोपासकः स्वकामनां प्रकटयति।

    पदार्थः

    (वर्धिता) वर्धयिता (वर्धनः) स्वयं वृद्धः प्राप्तमहिमः इत्यर्थः, (पूयमानः) उपासकैः गम्यमानः। [पवते गतिकर्मा। निघं० २।१४।], (मीढ्वान्) सुखसेक्ता। [मिह सेचने, लिटः क्वसुः।] (सोमः) जगत्स्रष्टा परमेश्वरः (ज्योतिषा) तेजसा (नः) अस्मान् (अभि आवीत्२) अभिरक्षतु। (यत्र) यस्याश्रये विद्यमानाः (पदज्ञाः) मोक्षमार्गस्य ज्ञातारः (नः) अस्माकम् (पूर्वे पितरः) श्रेष्ठाः पितृजनाः (गाः अभि) दिव्यप्रकाशरश्मीन् प्राप्तुम् (अद्रिम्) पर्वतवत् प्रतिबन्धकं तमोजालम् (इष्णन्) ऐष्णन् अपनयन्ति। [इष आभीक्ष्ण्ये क्र्यादिः, वर्तमाने लङ्।] (स्वर्विदः) प्राप्तमोक्षानन्दाश्च जायन्ते ॥३॥

    भावार्थः

    ज्योतिर्मयस्य परमात्मन उपासनया मनुष्या अपि ज्योतिष्मन्तो भूत्वा मोक्षं लभन्ते ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    May a learned person, the strengthened and remover of the doubts of all, highly pure, the showerer of joy and comforts with the light of Ms spiritual knowledge, take us to the place, where our seers of old, the knowers of God, the ergoyers of the haziness of salvation, the realisers of the significance of Vedic verses, had willingly gone td the Indivisible God.

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    Meaning

    Soma, exalted and exalting, pure and purifying, virile and generous, may, we pray, protect and promote us with the light of knowledge by which our forefathers, knowing the meaning and purpose of life step by step with a passionate desire for knowledge, rising to the sun, attained to the ultimate freedom and bliss of heaven. (Rg. 9-97-39)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (सः सोमः) તે શાન્ત સ્વરૂપ પરમાત્મા (वर्धिता वर्धनः) વર્ધક સ્વયં સમૃદ્ધ (मीढ्वान्) સુખવર્ષક (पुनानः) પ્રાપ્ત થઈને (नः) અમારી (ज्योतिषा) પોતાની જ્યોતિથી (आवीत्) રક્ષા કરે છે; તથા (यत्र) જ્યાં (नः) અમારા (पूर्वे पितरः) પૂર્વ ગુરુ આદિ ઉપાસકો (पदज्ञाः स्वर्विदः) પરમપદ પરમાત્માને જાણનારા મોક્ષને પ્રાપ્ત કરી ચૂકેલાં (गाः अभि अद्रिम् इष्णन्) સ્તુતિ વાણીઓથી અભિગત કર-જીવનમાં સેવન કર. અખંડ મોક્ષની ચાહના કરે છે. (૩)

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    ज्योतिर्मय परमात्म्याच्या उपासनेने माणसे ही ज्योतिष्मान बनून मोक्ष प्राप्त करतात. ॥३॥

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