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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1375
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - अग्निः
छन्दः - विराडनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
46
प्रे꣡द्धो꣢ अग्ने दीदिहि पु꣣रो꣡ नोऽज꣢꣯स्रया सू꣣꣬र्म्या꣢꣯ यविष्ठ । त्वा꣡ꣳ शश्व꣢꣯न्त꣣ उ꣡प꣢ यन्ति꣣ वा꣡जाः꣢ ॥१३७५॥
स्वर सहित पद पाठप्रे꣡द्धः꣢꣯ । प्र । इ꣣द्धः । अग्ने । दीदिहि । पुरः꣢ । नः꣣ । अ꣡ज꣢꣯स्रया । अ । ज꣣स्रया । सू꣢र्म्या꣢꣯ । य꣣विष्ठ । त्वा꣡म् । श꣡श्व꣢꣯न्तः । उ꣡प꣢꣯ । य꣣न्ति । वा꣡जाः꣢꣯ ॥१३७५॥
स्वर रहित मन्त्र
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूर्म्या यविष्ठ । त्वाꣳ शश्वन्त उप यन्ति वाजाः ॥१३७५॥
स्वर रहित पद पाठ
प्रेद्धः । प्र । इद्धः । अग्ने । दीदिहि । पुरः । नः । अजस्रया । अ । जस्रया । सूर्म्या । यविष्ठ । त्वाम् । शश्वन्तः । उप । यन्ति । वाजाः ॥१३७५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1375
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 10; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 11; खण्ड » 3; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (3)
विषय
अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।
पदार्थ
हे (यविष्ठ) अतिशय यौवनयुक्त (अग्ने) जीवात्मन् वा विद्युत् ! (प्रेद्धः) प्रदीप्त किया गया तू (अजस्रया) अक्षीण (सूर्म्या) तेजस्विता के साथ (नः पुरः) हमारे आगे (दीदिहि) चमक, (त्वाम्) तुझे (शश्वन्तः) बहुत से (वाजाः) बल (उप यन्ति) प्राप्त हैं ॥३॥
भावार्थ
जीवात्मा में बिजली के समान बड़ी भारी शक्ति निहित है। उसका उपयोग करके मनुष्य को तेजस्वी, प्रतापी, अग्रगन्ता और महान् होना उचित है ॥३॥
पदार्थ
(यविष्ठ अग्ने) हे अजर परमात्मन्! तू (प्रेद्धः) प्रसिद्ध-साक्षात् हुआ (नः पुरः) हमारे सम्मुख (अजस्रया सूर्म्या) निरन्तर शोभायमान-ज्ञान-तरङ्गों द्वारा (दीदिहि) ज्ञान प्रकाश कर३ (त्वाम्) तुझे (शश्वन्तः-वाजाः) श्रेष्ठ४ प्रजायें५ उपासक आत्माएँ प्राप्त होते हैं। अथवा बहुतेरे६ (वाजाः-वाजवन्तः) अमृत अन्न प्राप्त करने वाले७ प्राप्त होते हैं॥३॥
विशेष
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विषय
निरन्तर ज्ञान की दीप्ति के साथ
पदार्थ
हे (अग्ने) = हम सबकी अग्रगति के साधक प्रभो ! (यविष्ठ) = हे युवतम! पुण्य से सम्पृक्त तथा पाप से विपृक्त करनेवाले प्रभो ! आप (प्रेद्धः) = आत्मसंयम द्वारा शरीरवेदि पर समिद्ध किये जाकर (अजस्त्रया सूर्म्या) = निरन्तर – सतत प्रबुद्ध - ज्ञान दीप्तियों [radiance, lustre] के साथ (नः पुरः) = हमारे सामने (दीदिहि) = दीप्त होओ, अर्थात् आपकी कृपा से हम निरन्तर ज्ञान की दीप्ति को देखनेवाले बनें । हे प्रभो! (त्वाम्) = आपको (शश्वन्तः) = प्लुतगतिवाले, अर्थात् क्रिया में आलस्यशून्य [शश प्लुतगतौ ] (वाजा:) = यज्ञशील [A sacrifice] लोग (उपयन्ति) = समीपता से प्राप्त होते हैं, प्रभु की प्राप्ति के लिए ‘निरालस्य उद्योग' तथा 'यज्ञशीलता' दोनों ही आवश्यक हैं ।
भावार्थ
हम आलस्य को छोड़ें तथा यज्ञशील बनें ।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनस्तमेव विषयमाह।
पदार्थः
हे (यविष्ठ) युवतम (अग्ने) जीवात्मन् विद्युद् वा ! (प्रेद्धः) प्रदीपितः त्वम् (अजस्रया) अक्षीणया (सूर्म्या) ज्वालया, तेजस्वितया इत्यर्थः (नः पुरः) अस्माकमग्रे (दीदिहि) दीप्यस्व। [दीदयतिः ज्वलतिकर्मा। निघं० १।१६।] (त्वाम्) भवन्तं (शश्वन्तः) बहवः। [शश्वदिति बहुनाम। निघं० ३।१।] (वाजाः) बलानि (उपयन्ति) उपगच्छन्ति ॥३॥२
भावार्थः
जीवात्मनि विद्युतीव महती शक्तिर्निहिताऽस्ति। तामुपयुज्य मानवस्तेजस्वी प्रतापवानग्रगन्ता महांश्च भवितुमर्हति ॥३॥
इंग्लिश (2)
Meaning
Shine Thou before us with constant flame of knowledge, O God, Most youthful and Enkindled through Yogic practices. Austere learned persons, since times immemorial, attain unto Thee !
Meaning
O fire divine, ever youthful power and presence, well kindled and raised, shine on, radiate and illuminate us, constantly, through the continuous channel of natures dynamics. All things in constant motion reach you and flow on in the cosmic cycle. (Rg. 7-1-3)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (यविष्ठ अग्ने) હે અજર પરમાત્મન્ ! તું (प्रेद्धः) પ્રસિદ્ધ-સાક્ષાત્ થઈને (नः पुरः) અમારી સન્મુખ (अजस्रया सूर्म्या) નિરંતર શોભાયમાન-શાન તરંગો દ્વારા (दीदिहि) જ્ઞાનપ્રકાશ કર. (त्वाम्) તને (शश्वन्तः वाजाः) શ્રેષ્ઠ પ્રજાઓ-ઉપાસક આત્માઓ પ્રાપ્ત થાય છે. અથવા ઘણા બધા (वाजाः वाजवन्तः) અમૃત અન્ન પ્રાપ્ત કરવાવાળા પ્રાપ્ત થાય છે. (૩)
मराठी (1)
भावार्थ
जीवात्म्यामध्ये विद्युतप्रमाणे महान शक्ती निहित आहे. त्याचा उपयोग करून माणसाला तेजस्वी, प्रतापी, अग्रगंता (पुढे जाणारा) व महान बनता येते. ॥३॥
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