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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1380
    ऋषिः - गोतमो राहूगणः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    34

    यः꣡ स्नीहि꣢꣯तीषु पू꣣र्व्यः꣡ सं꣢जग्मा꣣ना꣡सु꣢ कृ꣣ष्टि꣡षु꣢ । अ꣡र꣢क्षद्दा꣣शु꣢षे꣣ ग꣡य꣢म् ॥१३८०॥

    स्वर सहित पद पाठ

    यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु । अरक्षद्दाशुषे गयम् ॥१३८०॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यः । स्नीहितीषु । पूर्व्यः । सञ्जग्मानासु । सम् । जग्मानासु । कृष्टिषु । अरक्षत् । दाशुषे । गयम् ॥१३८०॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1380
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 1; सूक्त » 1; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    आगे पुनः उसी विषय का कथन है।

    पदार्थ

    (पूर्व्यः) पूर्वजों से साक्षात्कार किया गया (यः) जो अग्रनायक परमेश्वर (स्नीहितीषु) वध करनेवाली (कृष्टिषु) शत्रु-प्रजाओं के (संजग्मानासु) मुठभेड़ करने पर (दाशुषे) आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक के लिए (गयम्) आश्रय को (अरक्षत्) सुरक्षित करता है, उस [(अग्नये) अग्रनायक परमेश्वर के लिए, हम (मन्त्रं वोचेम) वेदमन्त्रों का उच्चारण करें]४ ॥२॥

    भावार्थ

    परमेश्वरोपासक के मार्ग से सब विघ्न नष्ट हो जाते हैं, परमेश्वर उसे अपना सुरक्षित आश्रय और दिव्य सम्पदाएँ प्रदान करता है ॥२॥

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    पदार्थ

    (यः पूर्व्यः) जो सनातन या पूर्व ऋषियों से भी श्रेष्ठ शाश्वतिक परमात्मा (दाशुषे) आत्मदान—आत्मसमर्पण करने वाले उपासक के लिये (स्नीहितीषु) स्नेह करने वाली—(सञ्जग्मानासु) सङ्गति करने वाली—(कृष्टिषु) मनुष्य प्रजाओं में३ (गयम्-अरक्षत्) गृह४ स्थान—निवास—सङ्गमनीय की परमात्मा रक्षा करते स्तुतियों से अपनाते हैं॥२॥

    विशेष

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    विषय

    ‘गय' की प्राप्ति

    पदार्थ

    (यः) = वे प्रभु (स्नीहीतीषु) = [स्नेहकारिणीषु – द०] परस्पर स्नेह करनेवाली (संजग्मानासु) = सदा मिलकर चलनेवाली (कृष्टिषु) = कृषि आदि उत्पादक श्रम करनेवाली प्रजाओं में (पूर्व्यः) = पूरणता को उत्पन्न करनेवालों में उत्तम हैं। प्रभु हमारे जीवनों को पूर्ण बनाते हैं; बशर्ते कि – १. हम परस्पर स्नेहवाले हों, २. मिलकर चलें, ३. कुछ-न-कुछ निर्माण का कार्य अवश्य करें। जिस घर में लोग परस्पर प्रेम से चलते हैं, एक विचार के होकर मिलकर चलते हैं, जहाँ सब पौरुषवाले होकर आलस्य से दूर रहते हैं उस घर पर सदा प्रभु की कृपादृष्टि बनी रहती है।

    (दाशुषे) – दानशील और अन्ततोगत्वा प्रभु के प्रति आत्म-समर्पण करनेवाले व्यक्ति के लिए प्रभु (गयम्) = उत्तम सन्तान को [नि० २.१], उत्तम धनों को [नि० ८.१०], उत्तम गृह को [ नि० ३.४] तथा उत्तम प्राणशक्ति को [प्राणा वै गयाः – श० १४.८.१५.७] (अरक्षत्)– प्राप्त कराते हैं । एक दानशील, प्रभु के प्रति समर्पक का जीवन अत्यन्त सुखी, शान्त, समृद्ध व स्वस्थ होता है। ‘जो देता है—प्रभु उसे देते हैं' इस तत्त्व को राहूगण कभी भूलता नहीं।

    भावार्थ

    हममें स्नेह, सङ्गति, पुरुषार्थ व दानशीलता हो तो प्रभुकृपा से हमारा जीवन बड़ा फूलता-फलता होगा ।

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    विषय

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    भावार्थ

    (यः) जो (संजग्मानासु) समान भाव से संग करने हारी और (स्त्रीहितिषु) परस्पर स्नेह करने हारी, या परस्पर लड़ने हारी (कृष्टिषु) प्रजाओं में (पूर्व्यः) सब से प्रथम विद्यमान, या मुख्य पद पर विराजमान, आदरणीय, पूर्ण स्वभाव, निरपेक्ष, निष्पक्ष, न्यायशील ज्ञानी पुरुष है वही (दाशुषे) दान करने हारे त्यागी पुरुषों के (गयं) प्राण और धन की (अरक्षत्) रक्षा करे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ गोतमो राहूगणः, वसिष्ठस्तृतीयस्याः। २, ७ वीतहव्यो भरद्वाजो वा बार्हस्पत्यः। ३ प्रजापतिः। ४, १३ सोभरिः काण्वः। ५ मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ। ६ ऋजिष्वोर्ध्वसद्मा च क्रमेण। ८, ११ वसिष्ठः। ९ तिरश्वीः। १० सुतंभर आत्रेयः। १२, १९ नृमेघपुरुमेधौ। १४ शुनःशेप आजीगर्तिः। १५ नोधाः। १६ मेध्यातिथिमेधातिथिर्वा कण्वः। १७ रेणुर्वैश्वामित्रः। १८ कुत्सः। २० आगस्त्यः॥ देवता—१, २, ८, १०, १३, १४ अग्निः। ३, ६, ८, ११, १५, १७, १८ पवमानः सोमः। ४, ५, ९, १२, १६, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—१, २, ७, १०, १४ गायत्री। ३, ९ अनुष्टुप्। ४, १२, १३, १६ प्रागाथं। ५ बृहती। ६ ककुप् सतोबृहती च क्रमेण। ८, ११, १५, १० त्रिष्टुप्। १७ जगती। १६ अनुष्टुभौ बृहती च क्रमेण। २९ बृहती अनुष्टुभौ क्रमेण॥ स्वरः—१, २, ७, १०, १४ षड्जः। ३, ९, १०, गान्धारः। ४-६, १२, १३, १६, २० मध्यमः। ८, ११, १५, १८ धैवतः। १७ निषादः।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनस्तमेव विषयमाह।

    पदार्थः

    (पूर्व्यः) पूर्व्यैः साक्षात्कृतः। [पूर्वैः कृतमिनयौ च। अ० ४।४।१३३ इति कृतेऽर्थे यः प्रत्ययः।] (यः) योऽग्निः अग्रनायकः परमेश्वरः (स्नीहितीषु) वधकर्त्रीषु। [स्नेहयतिर्वधकर्मा निघं० २।१९।] (कृष्टिषु) शात्रवीषु प्रजासु (संजग्मानासु) संगतासु सतीषु (दाशुषे) आत्मसमर्पणकर्त्रे उपासकाय (गयम्२) गृहम् आश्रयमिति यावत्। [गयमिति गृहनाम। निघं० २।१०।] (अरक्षत्) रक्षति, तस्मै अग्नये परमेश्वराय मन्त्रं वोचेम इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥२॥३

    भावार्थः

    परमेश्वरोपासकस्य मार्गात् सर्वे विघ्ना नश्यन्ति, परमेश्वरस्तस्मै सुरक्षितं स्वाश्रयं दिव्यसम्पदश्च प्रयच्छति ॥२॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Let him, Who is just, unprejudiced, disinterested and venerable amongst the loving, social, learned people, preserve the life and wealth of charitable, self-sacrificing persons.

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    Meaning

    Agni is the eternal lord of yajna who, in gatherings of people meeting for the purpose of fellowship and yajna of love, protects and promotes the wealth of the generous yajamana. (Rg. 1-74-2)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (यः पूर्व्यः) જે સનાતન અર્થાત્ પૂર્વ ઋષિઓથી પણ શ્રેષ્ઠ શાશ્વતિક પરમાત્મા (दाशुषे) આત્મદાન-આત્મ સમર્પણ કરનારા ઉપાસકોને માટે (स्नीहितीषु) સ્નેહ કરનારી, (सञ्जग्मानासु) સંગઠન કરનારી, (कृष्टिषु) મનુષ્ય પ્રજાઓમાં (गयम् अरक्षत्) ગૃહસ્થાન - નિવાસ - સંગમનીયની પરમાત્મા રક્ષા કરીને સ્તુતિઓ દ્વારા અપનાવે છે. (૨)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    परमेश्वरोपासकाच्या मार्गातून सर्व विघ्ने नष्ट होतात, परमेश्वर त्याला आपला सुरक्षित आश्रय दिव्य संपदा प्रदान करतो. ॥२॥

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