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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1388
ऋषिः - प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा
देवता - पवमानः सोमः
छन्दः - अनुष्टुप्
स्वरः - गान्धारः
काण्ड नाम -
27
स꣢ वी꣣रो꣡ द꣢क्ष꣣सा꣡ध꣢नो꣣ वि꣢꣫ यस्त꣣स्त꣢म्भ꣣ रो꣡द꣢सी । ह꣡रिः꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अव्यत वे꣣धा꣡ न योनि꣢꣯मा꣣स꣡द꣢म् ॥१३८८॥
स्वर सहित पद पाठसः । वी꣣रः꣢ । द꣣क्षसा꣡ध꣢नः । द꣣क्ष । सा꣡ध꣢꣯नः । वि । यः । त꣣स्त꣡म्भ꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣व्यत । वेधाः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣स꣡द꣢म् । आ꣣ । स꣡द꣢꣯म् ॥१३८८॥
स्वर रहित मन्त्र
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी । हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम् ॥१३८८॥
स्वर रहित पद पाठ
सः । वीरः । दक्षसाधनः । दक्ष । साधनः । वि । यः । तस्तम्भ । रोदसीइति । हरिः । पवित्रे । अव्यत । वेधाः । न । योनिम् । आसदम् । आ । सदम् ॥१३८८॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1388
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 2; सूक्त » 2; मन्त्र » 3
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में परमेश्वर का महत्त्व वर्णित है ॥
पदार्थ
(सः) वह (वीरः) काम, क्रोध आदि शत्रुओं को कम्पायमान करनेवाला वीर सोम परमेश्वर (दक्षसाधनः) बल का साधक है, (यः) जो (रोदसी) द्युलोक और भूलोक को (तस्तम्भ) थामे हुए है। (वेधाः न) सूर्य के समान वह (हरिः) पापहर्ता परमेश्वर (योनिम्) आत्मा-रूप घर में (आसदम्) बैठने के लिए (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में (अव्यत) आता है ॥३॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥
भावार्थ
जो बलवान् जगदीश्वर सब संसार को धारण करता है, उसकी उपासना से सीमित शक्तिवाला भी मनुष्य महान् शक्तिवाला और शत्रुओं को हराने में समर्थ हो जाता है ॥३॥
पदार्थ
(सः) वह (वीरः) स्वयं अपने वीर्य—ओज पर आश्रित८ (दक्षसाधनः) स्वाश्रित उपासक के बल को साधने वाला (यः) जो (रोदसी वितस्तम्भ) विश्व के दोनों—रोधन करने वाले द्युलोक और पृथिवी लोकों को सम्भाल रहा है, ऐसा (हरिः) दुःखापहर्ता और सुखाहर्ता परमात्मा (पवित्रे) पवित्र उपासक आत्मा में (अव्यत) प्राप्त होता है (वेधाः-न योनिम्-आसदम्) जैसे विधाता बैठने को अपने घर में प्राप्त होता है॥३॥
विशेष
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विषय
'वाच्य' का जीवन
पदार्थ
गत मन्त्र में उल्लेख हुआ था कि प्रभु की शरण में यह 'जार' 'वर' बन जाता है। अब विषयों में न भटकने से १. (सः वीरः) = यह वीर बनता है। २. (दक्षसाधनः) = [दक्ष=बल, growth= उन्नति] बल व उन्नति का सिद्ध करनेवाला होता है । ३. (यः) = यह वह बनता है जो (रोदसी) = द्युलोक और पृथिवीलोक को (वितस्तम्भ) = थामता है, अर्थात् ऐसे ही लोगों पर जगत् का आधार होता है, अथवा यह अपने शरीररूप पृथिवीलोक को स्वस्थ रखता है और मस्तिष्करूप द्युलोक को जगमगाता हुआ । ४. (हरिः) = यह औरों के दुःखों का हरण करनेवाला (पवित्रे) = उस पवित्र प्रभु में (अव्यत) = अपनी रक्षा करता है । ५. (वेधाः न) = एक समझदार व्यक्ति की भाँति (योनिम्) = अपने घर में (आसदम्) = बैठता है। अब यह इधर-उधर विषय-वासनाओं की खोज में भटकता नहीं फिरता, धीमे-धीमे यह स्थिरवृत्ति का बनता चलता है ।
भावार्थ
हम वीर, बल के बढ़ानेवाले, शरीर व मस्तिष्क के संस्थापक [न क्षीणशक्तिवाले], प्रभु चरणों में अपने को सुरक्षित करें और समझदार बनकर घर पर रहनेवाले बनें ।
विषय
missing
भावार्थ
(दक्षसाधनः) अपने बलोपार्जन का साधक (यः) जो (रोदसी) प्राण और अपान के वेगों को (तस्तम्भ) रोक लेता या वश कर लेता है (सः) वह (हरिः) इन्द्रियों का विजय करने हारा (वेधाः) ज्ञानी गृहस्थ (योनिं न) जैसे अपने घर में आता है उसी प्रकार वह भी (वेधाः) मेधावी, ज्ञानवान् साधक (योनिम्) आश्रयस्थान, परम शरणरूप मोक्ष को प्राप्त करने के लिय (पवित्रे) परम पावन परमात्मा में (अव्यत) विचरता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ गोतमो राहूगणः, वसिष्ठस्तृतीयस्याः। २, ७ वीतहव्यो भरद्वाजो वा बार्हस्पत्यः। ३ प्रजापतिः। ४, १३ सोभरिः काण्वः। ५ मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ। ६ ऋजिष्वोर्ध्वसद्मा च क्रमेण। ८, ११ वसिष्ठः। ९ तिरश्वीः। १० सुतंभर आत्रेयः। १२, १९ नृमेघपुरुमेधौ। १४ शुनःशेप आजीगर्तिः। १५ नोधाः। १६ मेध्यातिथिमेधातिथिर्वा कण्वः। १७ रेणुर्वैश्वामित्रः। १८ कुत्सः। २० आगस्त्यः॥ देवता—१, २, ८, १०, १३, १४ अग्निः। ३, ६, ८, ११, १५, १७, १८ पवमानः सोमः। ४, ५, ९, १२, १६, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—१, २, ७, १०, १४ गायत्री। ३, ९ अनुष्टुप्। ४, १२, १३, १६ प्रागाथं। ५ बृहती। ६ ककुप् सतोबृहती च क्रमेण। ८, ११, १५, १० त्रिष्टुप्। १७ जगती। १६ अनुष्टुभौ बृहती च क्रमेण। २९ बृहती अनुष्टुभौ क्रमेण॥ स्वरः—१, २, ७, १०, १४ षड्जः। ३, ९, १०, गान्धारः। ४-६, १२, १३, १६, २० मध्यमः। ८, ११, १५, १८ धैवतः। १७ निषादः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ परमेश्वरस्य महत्त्वमाह।
पदार्थः
(सः) असौ (वीरः) कामक्रोधादिशत्रुप्रकम्पकः शूरः सोमः परमेश्वरः। [वीरो वीरयत्यमित्रान्, वेतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः, वीरयतेर्वा। निरु० १।६।] (दक्षसाधनः) बलसाधनो वर्तते, (यः रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (तस्तम्भ) धारयति। (वेधाः न) सूर्य इव सः (हरिः) पापहर्ता सोमः परमेश्वरः (योनिम्) आत्मरूपं गृहम् (आसदम्) आसत्तुम् (पवित्रे) परिपूतेऽन्तःकरणे (अव्यत) आगच्छति ॥३॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥३॥
भावार्थः
यो बलवान् जगदीश्वरः सर्वं जगद्धारयति तस्योपासनेन सीमितशक्तिरपि मानवो महाशक्तिः शत्रुपराजयसमर्थश्च जायते ॥३॥
इंग्लिश (2)
Meaning
That brave man, who controls his breaths, Prana and Apana and organs of senses, being highly intellectual, and wise, wanders about in the Purest God, for the attainment of salvation, just as a learned domestic person goes to his house.
Meaning
That potent Soma, master controller of all powers, means and materials of success in existence, who sustains both heaven and earth, is the saviour power of protection and pervades the universe presiding as omniscient high priest over the vedi of cosmic yajna. (Rg. 9-101-15)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (सः ते वीरः) સ્વયં પોતાનાં વીર્ય-ઓજ પર આશ્રિત (दक्षसाधनः) સ્વાશ્રિત ઉપાસકના બળને સાધનાર (यः) જે (रोदसी वितस्तम्भ) વિશ્વના બન્ને-રોધન કરનારા દ્યુલોક અને પૃથિવીલોકોને સંભાળી રહ્યો છે, એવો (हरिः) દુઃખહર્તા, સુખદાતા પરમાત્મા (पवित्रे) પવિત્ર ઉપાસક આત્મામાં (अव्यत) પ્રાપ્ત થાય છે. (वेधाः न योनिम् आसदम्) જેમ વિધાતા બેસવા માટે પોતાના ઘરમાં પ્રાપ્ત થાય છે. (૩)
मराठी (1)
भावार्थ
जो बलवान जगदीश्वर संपूर्ण संसाराला धारण करतो, त्याची उपासना केल्यावर सीमित शक्तिवान मनुष्य महा शक्तिवान बनून शत्रूंना पराभूत करण्यात समर्थ होतो. ॥३॥
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