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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1426
    ऋषिः - कुत्स आङ्गिरसः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    29

    अ꣣भि꣢ वा꣣युं꣢ वी꣣꣬त्य꣢꣯र्षा गृणा꣣नो꣢३꣱ऽभि꣢ मि꣣त्रा꣡वरु꣢꣯णा पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣡ न꣢꣯रं धी꣣ज꣡व꣢नꣳ रथे꣣ष्ठा꣢म꣣भी꣢न्द्रं꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢बाहुम् ॥१४२६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣भि꣢ । वा꣣यु꣢म् । वी꣣ति꣢ । अ꣣र्ष । गृणानः꣢ । अ꣣भि꣢ । मि꣣त्रा꣢ । मि꣣ । त्रा꣢ । व꣡रु꣢꣯णा । पू꣣य꣡मा꣢नः । अ꣣भि꣢ । न꣡र꣢꣯म् । धी꣣ज꣡व꣢नम् । धी꣣ । ज꣡व꣢꣯नम् । र꣣थेष्ठा꣢म् । र꣣थे । स्था꣢म् । अ꣡भि꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣡ज्र꣢꣯बाहुम् । व꣡ज्र꣢꣯ । बा꣣हुम् ॥१४२६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानो३ऽभि मित्रावरुणा पूयमानः । अभि नरं धीजवनꣳ रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम् ॥१४२६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अभि । वायुम् । वीति । अर्ष । गृणानः । अभि । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । पूयमानः । अभि । नरम् । धीजवनम् । धी । जवनम् । रथेष्ठाम् । रथे । स्थाम् । अभि । इन्द्रम् । वृषणम् । वज्रबाहुम् । वज्र । बाहुम् ॥१४२६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1426
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 6; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 18; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 12; खण्ड » 6; सूक्त » 1; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में उपासक को प्रेरित किया गया है।

    पदार्थ

    हे सोम अर्थात् शान्तिमय उपासक ! (गृणानः) परमात्मा की स्तुति करता हुआ तू (वीती) वेग से (वायुम्) गतिशील मन को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर। (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ तू (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर, (धीजवनम्) ध्यान में वेगवान्, (रथेष्ठाम्) देह-रथ में स्थित (नरम्) नेता जीवात्मा को (अभि अर्ष) परमात्मा के प्रति प्रेरित कर और (वृषणम्) सुखवर्षक, (वज्रबाहुम्) शस्त्रास्त्रधारी सेनापति के समान शत्रुओं के विनाश में समर्थ (इन्द्रम्) परमेश्वर को (अभि अर्ष) अपनी ओर प्रेरित कर ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य जब अपने मन, बुद्धि, प्राण-अपान और जीवात्मा को परमात्मा की ओर प्रेरित करता है, तब परमात्मा झट स्वयं ही उसके सम्मुख प्रकट हो जाता है ॥१॥

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    पदार्थ

    (गृणानः पूयमानः) हे सोमस्वरूप परमात्मन्! तू स्तूयमान—स्तुति में आता हुआ१२ साथ ही अध्येष्यमाण—प्रेरित आकर्षित किया जाता हुआ१३ (वीती) व्याप्ति या कामपूर्ति के लिये१४ (वायुम्-अभि-अर्ष) गतिशील मन को१५ अभिप्राप्त हो—पहुँच मय मनन करता रहे (मित्रावरुणा-अभि) प्राण अपानों को१६ अभिगत हो—पहुँच वे अच्छी गति करते रहें (धीजवनं नरम्-अभि) बुद्धि से अपने विषयों में गति करने वाला—नेत्रादि ज्ञानेन्द्रिय ग्राम समूह१७ को अभिप्राप्त हो—पहुँच जिससे उचित विषय में गमन करे (रथेष्ठाम्-वृषणं-वज्रबाहुम्-इन्द्रम्-अभि) शरीररथ में स्थित अङ्गों में शक्तिवर्षक, ओजरूप१ बलवीर्य२ जिसका है ऐसे आत्मा को अभिगत—पहुँच प्राप्त हो जिससे तेरे में रहा रहे॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—कुत्सः (स्तुतियों का कर्ता)॥ देवता—पवमानः सोमः (धारारूप में प्राप्त होने वाला परमात्मा)॥<br>

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    विषय

    विविध नामों द्वारा प्रभु-स्मरण

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि 'कुत्स' है, जो सब अशिव भावनाओं को [कुथ हिंसायाम्] हिंसित कर देता है । १. यह कहता है कि (वीति) = वीतये=गतिशीलता के लिए [वी-गति] (वायुम् अभि अर्ष) ='वायु' की ओर जानेवाला बन । [वा-गतिगन्धनयोः] । गतिशील–‘स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च'– स्वाभाविकरूप से क्रियावाले प्रभु का ध्यान कर । इस गतिशीलता के द्वारा तू अपनी सब बुराइयों का गन्धन–हिंसन करनेवाला हो । वायु नाम से (गृणान:) = स्तुति करता हुआ तू भी 'वायु' सदृश ही बन जाएगा। २. (पूयमानः) = अपने को पवित्र करता हुआ तू वीतये – सब बुराइयों को परे फेंकने के लिए [वी-असन] (मित्रावरुणा अभि अर्ष) = मित्र और वरुण नामक प्रभु की ओर गतिवाला बन । प्रभु ‘मित्र' इसलिए हैं कि वे सभी के साथ स्नेह करते हैं, 'वरुण' इस लिए कि वे द्वेष का निवारण करते हैं। इस रूप में प्रभु का स्मरण करता हुआ कुत्स भी राग-द्वेष को परे फेंककर सबके साथ स्नेह से वर्तता है और पवित्र जीवनवाला होता है ३. (वीतये) = अपने प्रकृष्ट विकास के लिए (नर) = [नृ नये ] सबको आगे ले-चलनेवाले (धीजवनम्) = [जवन=Quickness] बुद्धि की मन्दता को दूर करनेवाले (रथेष्ठाम्) = शरीररूप रथ पर सारथि के रूप में स्थित प्रभु की ओर (अभिअर्ष) = जानेवाला बन । तू प्रभु को ही अपना सारथि बना, जिससे तेरी सब शक्तियों का विकास ठीक ढङ्ग से हो । प्रभु के हाथ में लगाम होगी तो अवनति का प्रश्न होता ही नहीं । ४. हे कुत्स ! तू (इन्द्र) = उस सर्वशक्तिमान् (वृषणम्) = शक्तिशाली (वज्रबाहुम्) = बाहुओं में वज्र लिये हुए प्रभु की ओर (अभिअर्ष) = गति कर | बुराइयों के नष्ट करनेवाले प्रभु का स्मरण 'वीतये' – पवित्रता [Cleaning] के लिए आवश्यक ही है ।

    भावार्थ

    प्रभु के भिन्न-भिन्न नामों का स्मरण करते हुए हम अपने जीवन के लिए प्रेरणा प्राप्त करें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे (सोम) विद्वन् ! (वायुं) कोष्ठगत वायुरूप प्राण को (वीति) सर्व शरीर में व्याप्त होने के लिये (अभि अर्ष) प्रेरित कर। और (मित्रावरुणा) प्राण और अपान दोनों को (पूयमानः) पावन करता हुआ, उत्तम रूप से गति देता हुआ (अभि) उनको भी प्रेरित कर। (रथेष्ठाम्) इस देहरूप रथ पर सारथि बनकर स्थित (धीजवनं) ध्यान, संकल्पमात्र के वेग से जाने वाले, (नरं) इन्द्रियगणों के नेता मन को (अभि) उत्तम रीति से प्रेरित कर, और इस प्रकार प्राणायाम द्वारा जितेन्द्रिय और जितचित होकर हे सोम ! विद्वन् ! तब (वज्रबाहुम्) अज्ञान का नाश करने हारे ज्ञानरूप वज्र को हाथ में लिये ऋतम्भरावस्था में प्रज्ञाऽऽलोक के खुल जाने पर (वृषणं) सब सुखों के वर्षक (इन्द्रं) उस आत्मा को (अभि-अर्ष) साक्षात् कर।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१ गोतमो राहूगणः, वसिष्ठस्तृतीयस्याः। २, ७ वीतहव्यो भरद्वाजो वा बार्हस्पत्यः। ३ प्रजापतिः। ४, १३ सोभरिः काण्वः। ५ मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ। ६ ऋजिष्वोर्ध्वसद्मा च क्रमेण। ८, ११ वसिष्ठः। ९ तिरश्वीः। १० सुतंभर आत्रेयः। १२, १९ नृमेघपुरुमेधौ। १४ शुनःशेप आजीगर्तिः। १५ नोधाः। १६ मेध्यातिथिमेधातिथिर्वा कण्वः। १७ रेणुर्वैश्वामित्रः। १८ कुत्सः। २० आगस्त्यः॥ देवता—१, २, ८, १०, १३, १४ अग्निः। ३, ६, ८, ११, १५, १७, १८ पवमानः सोमः। ४, ५, ९, १२, १६, १९, २० इन्द्रः॥ छन्दः—१, २, ७, १०, १४ गायत्री। ३, ९ अनुष्टुप्। ४, १२, १३, १६ प्रागाथं। ५ बृहती। ६ ककुप् सतोबृहती च क्रमेण। ८, ११, १५, १० त्रिष्टुप्। १७ जगती। १६ अनुष्टुभौ बृहती च क्रमेण। २९ बृहती अनुष्टुभौ क्रमेण॥ स्वरः—१, २, ७, १०, १४ षड्जः। ३, ९, १०, गान्धारः। ४-६, १२, १३, १६, २० मध्यमः। ८, ११, १५, १८ धैवतः। १७ निषादः।

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्राद्ये मन्त्रे उपासकं प्रेरयति।

    पदार्थः

    हे सोम शान्तिमय उपासक ! (गृणानः) परमात्मानं स्तुवन् त्वम् (वीती) वीत्या वेगेन (वायुम्) गतिशीलं मनः (अभि अर्ष) परमात्मानं प्रति प्रेरय, (पूयमानः) पवित्रीक्रियमाणः त्वम् (मित्रावरुणा) प्राणापानौ (अभि अर्ष) परमात्मानं प्रति प्रेरय। (धीजवनम्२) धियां ध्याने जवनं वेगवन्तम्, (रथेष्ठाम्) देहरथे स्थितम् (नरम्) नेतारं जीवात्मानम् (अभि अर्ष) परमात्मानं प्रति प्रेरय। (वृषणम्) सुखवर्षकम्, (वज्रबाहुम्)शस्त्रास्त्रधारिणं सेनापतिमिव शत्रुविनाशसमर्थम् (इन्द्रम्) परमेश्वरम् (अभि अर्ष) स्वात्मानं प्रति प्रेरय। [अभि इत्यस्यावृत्त्या अर्ष इति क्रियापदं स्वयमेवावर्तते।] ॥१॥

    भावार्थः

    मनुष्यो यदा मनो बुद्धिं प्राणापानौ जीवात्मानं च परमात्मानं प्रति प्रेरयति तदा परमात्मा झटिति स्वयमेव तत्सम्मुखमाविर्भवति ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O praiseworthy learned person, urge the breath to pervade the whole body, urge also the Prana and Apana, cleansing them seated as a driver in the chariot-like body, actuated by reflection and resolve, urge the mind, the leader of the host of organs. With the weapon of knowledge in thy hand, realise the showerer of joys !

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    Meaning

    O Soma, pure and purifying, resounding across the spaces, flow, sung and celebrated, and bring peace, progress and fulfilment to humanity, to the man of vibrant enthusiasm, to the man of love and judgement. To humanity, bring readiness of intellect and understanding, firm and undisturbed yet dynamic like a master of the chariot sitting at peace, unmoving and undisturbed, while the chariot may be speeding at the velocity of light. So also flow to Indra, master ruler of the arms of thunder, virile and generous, mighty yet calm. (Rg. 9-97-49)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (गृणानः पूयमानः) હે સોમ-શાંત સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! તું સ્તૂયમાન-સ્તુતિમાં આવીને સાથે જ અધ્યેષ્યમાણ-પ્રેરિત આકર્ષિત કરીને (वीती) વ્યાપ્તિ અથવા કામપૂર્તિને માટે (वायुम् अभि अर्ष) ગતિશીલ મનને અભિપ્રાપ્ત થા-પહોંચીને મનન કરતો રહે. (मित्रावरुणा अभि) પ્રાણ અપાનોને અભિગત થા - પહોંચ તે શ્રેષ્ઠ ગતિ કરતા રહે. (धीजवनं नरम् अभि) બુદ્ધિ દ્વારા પોતાના વિષયમાં ગતિ કરનારા નેત્ર આદિ જ્ઞાનેન્દ્રિય ગ્રામ સમૂહને અભિપ્રાપ્ત થા-પહોંચ જેથી ઉચિત વિષયમાં ગમન કરે. (रथेष्ठाम् वृषणं वज्रबाहुम् इन्द्रम् अभि) શરી૨૨થમાં સ્થિત અંગોમાં શક્તિવર્ષક, ઓજરૂપ બળ વીર્ય જેના છે, એવા આત્માને અભિગત-પહોંચ પ્રાપ્ત થા, જેથી તારામાં રહ્યા કરે. (૧)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणूस जेव्हा आपले मन, बुद्धी, प्राण-अपान व जीवात्म्याला परमेश्वराकडे प्रेरित करतो, तेव्हा परमात्मा ताबडतोब स्वत: त्याच्यासमोर प्रकट होतो. ॥१॥

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