Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1609
ऋषिः - वालखिल्यः (श्रुष्टिगुः काण्वः)
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती, समा सतोबृहती)
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम -
52
य꣢स्या꣣यं꣢꣫ विश्व꣣ आ꣢र्यो꣣ दा꣡सः꣢ शेवधि꣣पा꣢ अ꣣रिः꣢ । ति꣣र꣡श्चि꣢द꣣र्ये꣢ रु꣣श꣢मे꣣ प꣡वी꣢रवि꣣ तु꣡भ्येत्सो अ꣢꣯ज्यते र꣣यिः꣢ ॥१६०९॥
स्वर सहित पद पाठय꣡स्य꣢꣯ । अ꣣य꣢म् । वि꣡श्वः꣢꣯ । आ꣡र्यः꣢꣯ । दा꣡सः꣢꣯ । शे꣣वधिपाः꣢ । शे꣣वधि । पाः꣢ । अ꣡रिः꣢꣯ । ति꣣रः꣢ । चि꣣त् । अर्ये꣢ । रु꣣श꣡मे꣢ । प꣡वी꣢꣯रवि । तु꣡भ्य꣢꣯ । इत् । सः । अ꣣ज्यते । रयिः꣢ ॥१६०९॥
स्वर रहित मन्त्र
यस्यायं विश्व आर्यो दासः शेवधिपा अरिः । तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्सो अज्यते रयिः ॥१६०९॥
स्वर रहित पद पाठ
यस्य । अयम् । विश्वः । आर्यः । दासः । शेवधिपाः । शेवधि । पाः । अरिः । तिरः । चित् । अर्ये । रुशमे । पवीरवि । तुभ्य । इत् । सः । अज्यते । रयिः ॥१६०९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1609
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 7; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 19; मन्त्र » 1
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 16; खण्ड » 4; सूक्त » 3; मन्त्र » 1
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (5)
विषय
प्रथम मन्त्र में इन्द्र परमेश्वर का वर्णन है।
पदार्थ
(यस्य) जिस तुझ इन्द्र परमात्मा का (अयम्) यह प्रत्यक्ष दिखाई देता हुआ (विश्वः) सम्पूर्ण संसार है, जो तू (आर्यः)श्रेष्ठ, (दासः) दुष्टों का क्षय करनेवाला, (शेवधिपाः) निधियों का रक्षक और (अरिः) समर्थ है और जो तू (अर्ये) जीवनाधार पवन में, (रुशमे) चमकीले सूर्य में तथा(पवीरवि) बिजली-युक्त बादल में (तिरः चित्) विद्यमान है, ऐसे (तुभ्य इत्) तेरे लिए ही (सः) वह जगत् में सर्वत्र बिखरा हुआ (रयिः) धन (अज्यते) समर्पित है ॥१॥
भावार्थ
विश्व का सम्राट्, श्रेष्ठ, सज्जनों का रक्षक, दुष्टों का दलन करनेवाला, भूगर्भ में निहित निधियों का रक्षक, सब कुछ करने में समर्थ, सर्वान्तर्यामी जो परमेश्वर है, उसी का सब धन है, इस हेतु से ईश्वरापर्ण-बुद्धि से उसका सेवन करना चाहिए ॥१॥
पदार्थ
(यस्य) जिस ऐश्वर्यवान् परमात्मा का (अयं विश्वः) यह सब (आर्यः) अर्य—जगत्स्वामी३ जगदीश परमात्मा का ज्ञाता ब्राह्मण (दासः) भृत्य कर्म कर्ता शूद्र (शेवधिपाः) धनकोष का रक्षक वैश्य (अरिः) शस्त्र प्रहारकर्ता—दण्डदाता क्षत्रियजन (तिरश्चित्) छिपकर वन में रहने वाला निषाद—वनवासी भी४ (रुशमे पवीरवि तुभ्यं-‘त्वयि’ अर्ये इत्) रोचमान५ शस्त्रधारी६ तुझ सर्वस्वामी परमात्मा के निमित्त ही (रयिः-अज्यते) आत्मदान स्तुतिप्रदान समर्पित करता है७ वह तू उपास्य देव है॥१॥
विशेष
ऋषिः—पुष्टिगुः (पुष्टि-आत्मपुष्टि-आत्मसमृद्धि के लिये स्तुति जिसकी है ऐसा उपासक)॥ देवता—इन्द्रः (ऐश्वर्यवान् परमात्मा)॥ छन्दः—विषमा बृहती॥<br>
विषय
तिरोहित प्रभु का व्यञ्जन [प्रकाश]
पदार्थ
(यस्य) = जिस प्रभु का (अयम्) = यह (विश्वा:) = सारा ही संसार है; चाहे वह (आर्य:) = ब्राह्मण है— ज्ञान-प्रधान जीवन बितानेवाले हैं, चाहे (दासः) = वे शत्रुओं का नाश करनेवाले क्षत्रिय [those who destroy the enemy] हैं, चाहे (शेवधिपाः) = खजाने की रक्षा करनेवाले वैश्य हैं और चाहे (अरि:) = [ऋ गतौ] निरन्तर श्रम में लगे शूद्र हैं। सभी व्यक्ति प्रभु के हैं, उस प्रभु का किसी के प्रति पक्षपात नहीं । वह प्रभुरूप सम्पत्ति तो हम सबके हृदयरूप कोशों में तिर:-छिपी पड़ी है। (सः) = वह (तिरश्चित् रयिः) = छिपे रूप में पड़ी हुई सम्पत्ति (तुभ्य इत् अज्यते) = तेरे ही लिए व्यक्त की जाती है, किस तेरे लिए
१. (अर्ये) = जितेन्द्रिय के लिए | (अर्यः) = [स्वामी] जो इन्द्रियों का दास न बनकर इन्द्रियों का स्वामी बनता है ।
२. (रुशमे) = जितेन्द्रिय [bright] बनकर शक्ति के संयम से चमकनेवाले के लिए (रुशमे) = वह शक्ति तेरी ज्ञानाग्नि का ईंधन बन जाती है ।
३. (पवीरवि) = जो तू इस शक्ति के संयम से ही वज्र-तुल्य शरीरवाले के लिए [पवीरं = वज्र, रु= वज्र - तुल्य शरीरवाला] ।
प्रभु सर्वव्यापकता के नाते सब स्थानों पर विद्यमान हैं, हमारे शरीरों में भी प्रभु की सत्ता है, परन्तु प्रभु का दर्शन उसी को होता है जो अर्य- जितेन्द्रिय बनकर अपनी शक्ति द्वारा ज्ञानग्नि को समृद्ध करके [रुशम] बनता है और वज्रतुल्य शरीरवाला [पवीरु] होता है।
इस व्यक्ति की इन्द्रियाँ कभी क्षीणशक्ति नहीं होती, वह सदा पुष्ट गौवों - इन्द्रियोंवाला होने से 'पुष्टिगु' कहलाता है ।
भावार्थ
मैं अन्दर छिपे प्रभु को ढूँढनेवाला बनूँ ।
पदार्थ
शब्दार्थ = ( यस्य अयं विश्वः आर्यः दासः ) = जिस परमेश्वर का यह सब आर्यगण सेवक भक्त ( शेवधिपा ) = वेदनिधि का रक्षक और ( अरिः ) = प्रापक है उस ( अर्ये ) = स्वामी ( रुशमे ) = नियन्ता ( पवीरवी ) = वेदवाणी के पिता परमेश्वर में ( तिर: ) = छिपा हुआ ( चित् ) = भी ( सः रयिः ) = वह वेद का धन ( तुभ्य ) = तुझ भक्त के लिए ( इत् अज्यते ) = अवश्य प्रकट किया जाता है ।
भावार्थ
भावार्थ= संसार में दो प्रकार के मनुष्य हैं, एक अनार्य अर्थात् अनाड़ी, वेद विरुद्ध सिद्धान्त को कहने और माननेवाले। दूसरे आर्य जो वेदानुसार सिद्धान्त को माननेवाले हैं । जो आर्य हैं वे वेदनिधि के रक्षक और प्रभु के सेवक भक्त हैं, वेदरूपी गुप्त महाधन को उपयोग में लाकर आर्य लोग सदा सुखी रहते हैं।
विषय
missing
भावार्थ
(यस्य) जिस परमात्मा का (अयं) यह (विश्वः) समस्त (आर्यः) श्रेष्ठ (अरिः) मनुष्य (शेवधिपाः) उसके दिव्य धन ज्ञान की रक्षा करने हारा (दासः) भृत्य के समान है और उस यज्ञरूप (अर्ये) स्वामी (रुशमे) सबके नियन्ता (पवीरवि*) निवारक राजदण्ड के समान परम तपस्वरूप वज्र को धारण करने हारे परमात्मा में (तिरश्चित्) यह सब विद्यमान है। हे प्रभो ! (तुभ्य इत्) स्थूल सृष्टि में तेरे गुणों के दर्शन के लिये ही (सः) वह (रयिः) प्राण और देह, पृथिवी आदि सब मूर्त पदार्थ (अज्यते) प्रकट होते हैं। तू ही उन का स्वामी सञ्चाल, कर्ताधर्ता है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१, ८, १८ मेध्यातिथिः काण्वः। २ विश्वामित्रः। ३, ४ भर्गः प्रागाथः। ५ सोभरिः काण्वः। ६, १५ शुनःशेप आजीगर्तिः। ७ सुकक्षः। ८ विश्वकर्मा भौवनः। १० अनानतः। पारुच्छेपिः। ११ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः १२ गोतमो राहूगणः। १३ ऋजिश्वा। १४ वामदेवः। १६, १७ हर्यतः प्रागाथः देवातिथिः काण्वः। १९ पुष्टिगुः काण्वः। २० पर्वतनारदौ। २१ अत्रिः॥ देवता—१, ३, ४, ७, ८, १५—१९ इन्द्रः। २ इन्द्राग्नी। ५ अग्निः। ६ वरुणः। ९ विश्वकर्मा। १०, २०, २१ पवमानः सोमः। ११ पूषा। १२ मरुतः। १३ विश्वेदेवाः १४ द्यावापृथिव्यौ॥ छन्दः—१, ३, ४, ८, १७-१९ प्रागाथम्। २, ६, ७, ११-१६ गायत्री। ५ बृहती। ९ त्रिष्टुप्। १० अत्यष्टिः। २० उष्णिक्। २१ जगती॥ स्वरः—१, ३, ४, ५, ८, १७-१९ मध्यमः। २, ६, ७, ११-१६ षड्जः। ९ धैवतः १० गान्धारः। २० ऋषभः। २१ निषादः॥
संस्कृत (1)
विषयः
तत्रादाविन्द्रं परमेश्वरं वर्णयति।
पदार्थः
(यस्य) यस्य तव इन्द्रस्य परमात्मनः (अयम्) एष प्रत्यक्षं दृश्यमानः (विश्वः) सम्पूर्णः संसारो विद्यते, यः त्वम् (आर्यः) श्रेष्ठः, (दासः) दुष्टानामुपक्षयिता, (शेवधिपाः) निधिपाः। [निधिः शेवधिरिति यास्कः। निरु० २।४।] (अरिः) ईश्वरश्च वर्तसे। [अरिः ईश्वरः। निरु० ५।२।] (यश्च त्वम्) (अर्ये) स्वामिनि, जीवनाधारे पवने इत्यर्थः, (रुशमे) रुचमे, रोचिष्मति आदित्ये। [रुशदिति वर्णनाम रोचतेर्ज्वलतिकर्मणः। निरु० ६।१३।] (पवीरवि) विद्युन्मति पर्जन्ये च। [पवीरं विद्युद्वज्रं वाति प्राप्नोति तस्मिन्।] (तिरः चित्) प्राप्तः एव तिष्ठसि। [तिरः सतः इति प्राप्तस्य। निरु० ३।२०।] एतादृशाय (तुभ्य इत्) तुभ्यमेव (सः) जगति सर्वत्र विकीर्णः (रयिः) धनम् (अज्यते) समर्प्यते [तुभ्यम् इत्यस्य मकारलोपश्छान्दसः।] ॥१॥२
भावार्थः
विश्वसम्राट् श्रेष्ठः सज्जनरक्षको दुष्टानां दलयिता भूगर्भे निहितानां निधीनां रक्षकः सर्वकर्मक्षमः सर्वान्तर्यामी यः परमेश्वरोऽस्ति तस्यैव सर्वं धनमिति हेतोः तदर्पणबुद्ध्या तत् सेवनीयम् ॥१॥
इंग्लिश (2)
Meaning
All Aryas as are the devotees of God, the guardians and recipients of His knowledge of the Vedas. In God, the Lord, the Leader, the Master of speech is that knowledge hidden. God manifests the Vedic wealth to thee, the devotee.
Translator Comment
Griffith translates Rushma and Pavirn as names of two princes of a tribe. This explanation is unacceptable as it savours of history in the Veda which are free from it. Both the words refer to God as ‘Leader and Master of speech. '
Meaning
This entire world whether it is dynamic and progressive, or reactionary and slavish, whether it guards the wealth of life or destroys it, all this wealth, directly or indirectly, is circulating within the presence of Indra, the master, awfully armed, destroyer of destroyers, to whom it really and ultimately belongs. (Rg. 8-51-9)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (यस्य) જે ઐશ્વર્યવાન પરમાત્માના (अयं विश्वः) એ સમસ્ત કર્મ કર્તા (आर्यः) અર્ય = જગત સ્વામી-જગદીશ પરમાત્માના જ્ઞાતા બ્રાહ્મણ, (दासः) સેવક-કર્મ કર્તા શૂદ્ર, (शेवधिपाः) ધન કોષના રક્ષક વૈશ્ય, (अरिः) શસ્ત્ર પ્રહારકર્તા-દંડદાતા ક્ષત્રિયજન અને (तिरश्चित्) છુપાઈને વનમાં રહેનારા નિષાદ-વનવાસી પણ (रुशमे पविरवि तुभ्यं "त्वयि" अर्ये इत्) પ્રકાશમાન શસ્ત્રધારી તું સર્વના સ્વામી પરમાત્માને માટે જ (रयिः अज्यते) આત્મદાન સ્તુતિ પ્રદાન સમર્પિત કરે છે, તે તું ઉપાસ્ય દેવ છે. (૧)
बंगाली (1)
পদার্থ
যস্যায়ং বিশ্ব আর্যো দাসঃ শেবধিপা অরিঃ।
তিরশ্চিদর্যে রুশমে পবীরবি তুভ্যেৎসো অজ্যতে রয়িঃ।।৬৪।।
(সাম ১৬০৯)
পদার্থঃ (যস্য অয়ম্ বিশ্ব আর্যঃ দাসঃ) যে পরমেশ্বরের সন্তান আর্যগণ এবং তাঁর ভক্তগণ, সেই (শেবধিপা) বেদ নিধির রক্ষক এবং (অরিঃ) প্রাপক, সকলের (অর্যে) স্বামী, (রুশমে) নিয়ন্তা (পবীরবি) বেদবাণীর পিতা, পরমেশ্বর (তিরঃ চিৎ) বাহ্য ইন্দ্রিয়ে অপ্রকাশিত থেকেও (সঃ রয়িঃ) ঐ বেদ কোষের ধনরূপ জ্ঞানের মধ্য দিয়ে (তুভ্য) ভক্তদের জন্য (ইৎ অজ্যতে) অবশ্যই প্রকটিত।
ভাবার্থ
ভাবার্থঃ যে পরমেশ্বরের সন্তান আর্যগণ এবং তাঁর ভক্তগণ, সেই বেদ নিধির রক্ষক ও প্রাপক, সকলের স্বামী, জগতের নিয়ন্তা, বেদবাণীর পিতা পরমেশ্বর নিরাকার হয়েও ঐ বেদ কোষের ধনরূপ জ্ঞানের মধ্যে দিয়ে ভক্তদের নিকট প্রকটিত।।৬৪।।
मराठी (1)
भावार्थ
विश्वाचा सम्राट, श्रेष्ठ, सज्जनांचा रक्षक, दुष्टांचे दमन करणारा, भूगर्भातील निधींचा रक्षक, सर्व काही करण्यास समर्थ, सर्वांतर्यामी परमेश्वराचेच सर्व धन आहे. यामुळे ईश्वरार्पण बुद्धीने त्याचे सेवन केले पाहिजे. ॥१॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal