Loading...

सामवेद के मन्त्र

  • सामवेद का मुख्य पृष्ठ
  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1635
    ऋषिः - शुनःशेप आजीगर्तिः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    27

    स꣡ घा꣢ नः सू꣣नुः꣡ शव꣢꣯सा पृ꣣थु꣡प्र꣢गामा सु꣣शे꣡वः꣢ । मी꣣ढ्वा꣢ꣳ अ꣣स्मा꣡कं꣢ बभूयात् ॥१६३५॥

    स्वर सहित पद पाठ

    सः꣢ । घ꣣ । नः । सूनुः꣢ । श꣡व꣢꣯सा । पृ꣣थु꣡प्र꣢गामा । पृ꣣थु꣢ । प्र꣣गामा । सुशे꣡वः꣢ । सु꣣ । शे꣡वः꣢꣯ । मी꣣ढ्वा꣢न् । अ꣣स्मा꣡क꣢म् । ब꣣भूयात् ॥१६३५॥


    स्वर रहित मन्त्र

    स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः । मीढ्वाꣳ अस्माकं बभूयात् ॥१६३५॥


    स्वर रहित पद पाठ

    सः । घ । नः । सूनुः । शवसा । पृथुप्रगामा । पृथु । प्रगामा । सुशेवः । सु । शेवः । मीढ्वान् । अस्माकम् । बभूयात् ॥१६३५॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1635
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » ; सूक्त » 7; मन्त्र » 2
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 17; खण्ड » 2; सूक्त » 3; मन्त्र » 2
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और आचार्य का विषय है।

    पदार्थ

    (सः घ) वह निश्चय ही (सूनुः) शुभ गुण, कर्म, विद्या, आदि का प्रेरक, (पृथुप्रगामा) विस्तृत कर्तव्यमार्ग का उपदेश करनेवाला, (सुशेवः) उत्तम सुख देनेवाला परमेश्वर वा आचार्य (नः) हमें (मीढ़्वान्) विद्या, धन आदि की वर्षाओं से सींचनेवाला (बभूयात्) होवे ॥२॥

    भावार्थ

    भली-भाँति उपासना किया गया परमेश्वर और भली-भाँति सेवा किया गया आचार्य विद्या, शुभ गुण-कर्म आदि के उपदेश से मनुष्यों को सुखी करते हैं ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    पदार्थ

    (सः-घ) यह अग्रणायक परमात्मा निश्चय से (नः सूनुः) हम उपासकों का प्रेरक१ (सुशेवः) शोभन सुख२ आध्यात्मिक अमृत जिससे मिले ऐसा (शवसा पृथुगामा) बल से विस्तृत—व्यापक गति वाला३ है (अस्माकं मीढ्वान् भवतु) हमारा कामनावर्षक हो॥२॥

    विशेष

    <br>

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    वह प्रभु ही हमारा हो

    पदार्थ

    (सः) = वह प्रभु (घ) = निश्चय से (अस्माकम्) = हमारा (बभूयात्) = हो । कौन-सा प्रभु ? जो— १. (नः सूनुः) = हमें प्रेरणा देनेवाला है [षू प्रेरणे] । पुत्र भी सूनु कहलाता है, क्योंकि वह हमें कमाने इत्यादि की प्रेरणा देता है । सन्तानों के लिए ही तो मनुष्य कमाता है । प्रभु इस दृष्टिकोण से भी सूनु हैं कि भक्त उन्हें अपने हृदय में जन्म देने का प्रयत्न करता है । २. (शवसा पृथुप्रगामा) = गतिमय शक्ति [Dynamic energy=शवस्] के द्वारा वह प्रभु हमें विशाल क्रिया-क्षेत्र में चलानेवाला है ।

    ३. (सुशेवः प:) = वह उत्तम सुखों को प्राप्त करानेवाला है।

    ४. (मीढ्द्वान्) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्ति का सेचन करनेवाला है। [मिह् सेचने]

    यदि हम प्रभु से अपना सम्पर्क जोड़ेंगे तो सदा उसकी उत्तम प्रेरणा को सुनेंगे, प्रबल क्रियाशक्तिवाले होंगे, सुखमय जीवन का लाभ करेंगे तथा हमारा अङ्ग-प्रत्यङ्ग शक्तिसम्पन्न होगा । इस प्रकार का जीवन बनाकर हम सचमुच इस मन्त्र के ऋषि 'शुन: शेप' होंगे - अपने जीवनों में सुखों का निर्माण करनेवाले होंगे ।

    भावार्थ

    हमारा एकमात्र आधार प्रभु ही हो । हम तन्मय हो जाएँ ।

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    (स घ) वह ही परमेश्वर ! (पृथुप्रगामा) विशाल ब्रह्माण्ड में व्यापक (शवसा सूनुः) समस्त संसार को अपने बलसे प्रेरण करने हारा (नः) हमें (सुशेवः) उत्तम रूप से भजन करने योग्य है वही (अस्माकं) हमारे (मीढ्वान्) सब सुखों को वर्षण करने वाला, मेघ के समान आनन्दकारी (बभूयात्) होवे।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१, ७ शुनःशेप आजीगतिः। २ मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः। ३ शंयुर्वार्हस्पत्यः। ४ वसिष्ठः। ५ वामदेवः। ६ रेभसूनु काश्यपौ। ८ नृमेधः। ९, ११ गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १० श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। १२ विरूपः। १३ वत्सः काण्वः। १४ एतत्साम॥ देवता—१, ३, ७, १२ अग्निः। २, ८-११, १३ इन्द्रः। ४ विष्णुः। ५ इन्द्रवायुः। ६ पवमानः सोमः। १४ एतत्साम॥ छन्दः—१, २, ७, ९, १०, ११, १३, गायत्री। ३ बृहती। ४ त्रिष्टुप्। ५, ६ अनुष्टुप्। ८ प्रागाथम्। ११ उष्णिक्। १४ एतत्साम॥ स्वरः—१, २, ७, ९, १०, १२, १३, षड्जः। ३, ९, मध्यमः, ४ धैवतः। ५, ६ गान्धारः। ११ ऋषभः १४ एतत्साम॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पुनः परमात्माचार्ययोर्विषय उच्यते।

    पदार्थः

    (स घ) स खलु। [संहितायां घा इत्यत्र ‘ऋचि तुनुघ०। अ० ६।३।१३३’ इत्यनेन दीर्घः।] (सूनुः) शुभगुणकर्मविद्यादिप्रेरकः।[षू प्रेरणे इत्यस्मादौणादिको नुः प्रत्ययः।] (पृथुप्रगामा) पृथुः विस्तीर्णः प्रगामा प्रकृष्टः कर्तव्यमार्गो यस्मात् सः, विशालशुभकर्तव्यमार्गोपदेशकः। [बहुव्रीहौ पूर्वपदप्रकृतिस्वरः।] (सुशेवः) शोभनः शेवः सुखं यस्मात् सः परमेश्वर आचार्यो वा। [शेवमिति सुखनामसु पठितम्। निघं० ३।६। ‘इण्शीभ्यां वन्’ उ० १।१५० अनेन शीङ् धातोः वन् प्रत्ययः।] (नः) अस्माकम् (मीढ्वान्) विद्याधनादीनां वृष्टिभिः सेक्ता (बभूयात्) भवेत्। [अत्र ‘वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति’ इति नियमात् लिङि लिड्वत् कार्यम्] ॥२॥२

    भावार्थः

    सूपासितः परमेश्वरः सुसेवित आचार्यश्च विद्याशुभगुणकर्माद्युप- देशेन जनान् सुखयतः ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    May the All-pervading God, Who goads the universe with His strength, be worthy of adoration by us. May He shower all joys on us.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Meaning

    May our children and successors, travelling far and wide with power and knowledge, be good and kind to us and give us showers of wealth and prosperity. (Rg. 1-27-2)

    इस भाष्य को एडिट करें

    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (सः घः) તે અગ્રણી પરમાત્મા નિશ્ચયથી (नः सूनुः) અમારા ઉપાસકોનો પ્રેરક (सुशेवः) શ્રેષ્ઠ સુખ આધ્યાત્મિક અમૃત જેનાથી પ્રાપ્ત થાય એવો (शवसा पृथुगामा) બળથી વિસ્તૃત-વ્યાપક ગતિવાળો છે. (अस्माकं मीढ्वान् भवति) અમારે કામના વર્ષક થા. (૨)
     

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    चांगल्या प्रकारे उपासना केलेला परमेश्वर व चांगल्या प्रकारे सेवा केलेला आचार्य हे विद्या व शुभ गुण इत्यादींच्या उपदेशाने माणसांना सुखी करतात ॥२॥

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top