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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1693
    ऋषिः - विश्वामित्रः प्रागाथः देवता - इन्द्राग्नी छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम -
    36

    इ꣡न्द्रा꣢ग्नी रोच꣣ना꣢ दि꣣वः꣢꣫ परि꣣ वा꣡जे꣢षु भूषथः । त꣡द्वां꣢ चेति꣣ प्र꣢ वी꣣꣬र्य꣢꣯म् ॥१६९३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । रो꣣चना꣢ । दि꣡वः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । वा꣡जे꣢꣯षु । भू꣣षथः । त꣢त् । वा꣣म् । चेति । प्र꣢ । वी꣣र्यम्꣢ ॥१६९३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः । तद्वां चेति प्र वीर्यम् ॥१६९३॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । रोचना । दिवः । परि । वाजेषु । भूषथः । तत् । वाम् । चेति । प्र । वीर्यम् ॥१६९३॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1693
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 14; मन्त्र » 1
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 18; खण्ड » 3; सूक्त » 5; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    प्रथम मन्त्र में आत्मा और मन का विषय कहा जा रहा है।

    पदार्थ

    हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (युवाम्) तुम दोनों (वाजेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (दिवः) प्रकाशक परमात्मा की (रोचना)ज्योति को (परि भूषथः) चारों ओर से प्राप्त करते हो। (तत्) वह प्रसिद्ध (वाम्) तुम दोनों का (वीर्यम्) बल (प्र चेति) सब के द्वारा प्रकृष्टरूप से जाना जाता है ॥१॥

    भावार्थ

    मनुष्य के आत्मा और मन को योग्य है कि आन्तरिक देवासुरसङ्ग्रामों में सब आसुरी भावों को पराजित करके परमात्मा की प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचें ॥१॥

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    पदार्थ

    (इन्द्राग्नी) हे ऐश्वर्यवन् एवं ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मन्! (दिवः-रोचना) तू मोक्षधाम का प्रकाशक है (वाजेषु परिभूषथः) अर्चनावसरों में१ सर्वतः भूषित होता है, (वाम्) तुझ को (वीर्यं तत् प्रचेति) तेरा जो गुण सामर्थ्य है वह तुझे जनाता है॥१॥

    विशेष

    ऋषिः—विश्वमित्रः (सबका मित्र सब जिसके मित्र हों ऐसा उपासक)॥ देवता—इन्द्राग्नी देवते (ऐश्वर्यवान् एवं ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥<br>

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    विषय

    इन्द्र और अग्नि

    पदार्थ

    वैदिक साहित्य में इन्द्राग्नी का अर्थ है १. प्राण और अपान [प्राणापानौ वा इन्द्राग्नी–गो० २.१ ] अथवा २. ब्रह्म व क्षत्र [ब्रह्मक्षत्रे वा इन्द्राग्नी - कौ० १२.८] और वास्तव में तो ३. सब दिव्य गुण इन्द्राग्नी हैं [इन्द्राग्नी वै विश्वेदेवाः – श० १०.४.१.९]। ४. ये इन्द्राग्नी ही मूलभूत प्रतिष्ठा हैं [प्रतिष्ठे वा इन्द्राग्नी–कौ०] (इन्द्राग्नी) = ‘इन्द्र' शक्ति का प्रतीक है तो 'अग्नि' प्रकाश व ज्ञान का । ये इन्द्र और अग्नि (दिवः) = मस्तिष्करूप द्युलोक को (रोचना) = चमकानेवाले हैं और ये दोनों (वाजेषु) = शक्तियों में, बलों में, अर्थात् शक्ति के द्वारा (परिभूषथः) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग को सुभूषित करते हैं, शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण अङ्ग सौन्दर्य को लिये हुए होते हैं । इन्द्र और अग्नि तो वस्तुतः सम्पूर्ण जीवन के सौन्दर्य के आधार हैं। एक राष्ट्र में जैसे दिग्गज विद्वान् ब्राह्मण तथा शक्तिशाली क्षत्रिय उत्थान के कारण बनते हैं उसी प्रकार शरीर में ये इन्द्र और अग्नि = बल और प्रकाश शोभा का कारण बनते हैं । शरीर का जो सौन्दर्य है (तत्) = वह (वाम्) = आप दोनों [इन्द्राग्नी] का ही तो (वीर्यम्) = सामर्थ्य (प्रचेति) = समझा जाता है।

    बलशून्य शरीर मृतप्राय-सा होगा और प्रकाश के अभाव में अन्धकारमय शरीर पशु- शरीर से उत्कृष्ट न होगा। इस स्थिति से ऊपर उठने के लिए हमें अपने शरीर में इन्द्र और अग्नि का विकास करना चाहिए। इस विकास को करनेवाला व्यक्ति ही 'विश्वामित्र' होता है ।

    भावार्थ

    ज्ञान और बल हमें सब सद्गुणों से सुभूषित करें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    हे इन्द्राग्नी ! आप (दिवः रोचना) द्यौलोक को प्रकाशित करने हारे इन्द्र अर्थात् सूर्य या विद्युत् के समान प्राण और अपान होकर इस मूर्धास्थल को प्रकाशित करते हो और (वाजेषु भूषथः) सब कार्यों में या ज्ञानयज्ञों में शोभा देते, कार्य सम्पादन करते हो। (तत् वीर्यं) यह सब सामर्थ्य (वां च) आप दोनों ही का है। राजपक्ष में—इन्दाग्नी सेना सेनाध्यक्ष। और वाजेषु संग्रामों में।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चांगिरसः। २ श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। ३ शुनःशेप आजीगर्तः। ४ शंयुर्बार्हस्पत्यः। ५, १५ मेधातिथिः काण्वः। ६, ९ वसिष्ठः। ७ आयुः काण्वः। ८ अम्बरीष ऋजिश्वा च। १० विश्वमना वैयश्वः। ११ सोभरिः काण्वः। १२ सप्तर्षयः। १३ कलिः प्रागाथः। १५, १७ विश्वामित्रः। १६ निध्रुविः काश्यपः। १८ भरद्वाजो बार्हस्पत्यः। १९ एतत्साम॥ देवता—१, २, ४, ६, ७, ९, १०, १३, १५ इन्द्रः। ३, ११, १८ अग्निः। ५ विष्णुः ८, १२, १६ पवमानः सोमः । १४, १७ इन्द्राग्नी। १९ एतत्साम॥ छन्दः–१-५, १४, १६-१८ गायत्री। ६, ७, ९, १३ प्रागथम्। ८ अनुष्टुप्। १० उष्णिक् । ११ प्रागाथं काकुभम्। १२, १५ बृहती। १९ इति साम॥ स्वरः—१-५, १४, १६, १८ षड्जः। ६, ८, ९, ११-१३, १५ मध्यमः। ८ गान्धारः। १० ऋषभः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    तत्रादावात्मनो मनसश्च विषय उच्यते।

    पदार्थः

    हे (इन्द्राग्नी) आत्ममनसी ! युवाम् (वाजेषु) देवासुरसंग्रामेषु(दिवः) प्रकाशकस्य परमात्मनः (रोचना) रोचनाम् दीप्तिम्(परि भूषथः) परिप्राप्नुथः। [भू प्राप्तौ, लेटि रूपम्। रोचना इत्यत्र‘सुपां सुलुक्०’ अ० ७।१।३९ इति द्वितीयैकवचनस्य लुक्।] (तत्) प्रसिद्धम् (वाम्) युवयोः (वीर्यम्) बलम् (प्र चेति) सर्वैः प्रकृष्टतया ज्ञायते ॥१॥२

    भावार्थः

    आभ्यन्तरे देवासुरसंग्रामे सर्वानासुरान् भावान् पराजित्य मनुष्यस्यात्मा मनश्च परमात्मप्राप्तिलक्ष्यं लब्धुमर्हतः ॥१॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    O Sun and lightning, in your deeds of might. Ye deck heaven's lucid realms. Famed is that strength of yours!

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    Meaning

    Indra and Agni, you are the light and fire of heaven and you shine all round in the battles of life. And that brilliance proclaims your power and splendour. (Rg. 3-12-9)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्द्राग्नी) હે ઐશ્વર્યવાન અને જ્ઞાન પ્રકાશ સ્વરૂપ પરમાત્મન્ ! (दिवः रोचना) તું મોક્ષધામનો પ્રકાશક છે (वाजेषु परिभूषथः) અર્ચના અવસરોમાં સર્વતઃ ભૂષિત-અલંકૃત થાય છે, (वाम्) તને (वीर्यं तत् प्रचेति) તારા જે ગુણ સામર્થ્ય છે, તે તને પ્રકટ કરે છે-જણાવે છે. (૧)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    माणसांनी आत्मा व मन याद्वारे आंतरिक देवासुर संग्रामामध्ये सर्व आसुरी भाव पराजित करून परमेश्वर प्राप्तीच्या लक्ष्यापर्यंत पोचावे. ॥१॥

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