Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1727
ऋषिः - वामदेवो गौतमः
देवता - उषाः
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम -
31
उ꣣त꣡ सखा꣢꣯स्य꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣त꣢ मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मसि । उ꣣तो꣢षो꣣ व꣡स्व꣢ ईशिषे ॥१७२७॥
स्वर सहित पद पाठउ꣣त꣢ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । असि । अश्वि꣡नोः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । मा꣣ता꣢ । ग꣡वा꣢꣯म् । अ꣣सि । उ꣣त꣢ । उ꣣षः । व꣡स्वः꣢꣯ । ई꣣शिषे ॥१७२७॥
स्वर रहित मन्त्र
उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि । उतोषो वस्व ईशिषे ॥१७२७॥
स्वर रहित पद पाठ
उत । सखा । स । खा । असि । अश्विनोः । उत । माता । गवाम् । असि । उत । उषः । वस्वः । ईशिषे ॥१७२७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1727
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 8; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 19; खण्ड » 2; सूक्त » 1; मन्त्र » 3
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
आगे फिर प्राकृतिक और दिव्य उषा वर्णित है।
पदार्थ
प्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (उत) और, हे (उषः) उषा ! तू (अश्विनोः) द्यावापृथिवी की (सखा) सहचरी (असि) है (उत) और (गवाम्) किरणों की (माता) माता (असि) है। (उत) और, तू (वस्वः) प्रकाशरूप धन की (ईशिषे) अधीश्वरी है ॥ द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (उत) और, हे (उषः) उषा के समान वर्तमान ऋतम्भरा प्रज्ञा ! तू (अश्विनोः) योगी के आत्मा और मन की (सखा) सहचरी (असि) है, (उत) और (गवाम्) ईश्वरीय प्रकाशों की (माता) माता (असि) है। (उत) और तू (वस्वः) योग-समाधि रूप धन की (ईशिषे) अधिष्ठात्री है ॥३॥ यहाँ श्लेष अलङ्कार है ॥३॥
भावार्थ
जैसे प्राकृतिक उषा द्यावापृथिवी में व्याप्त होकर ज्योतिरूप धन से सबको धनवान् कर देती है, वैसे ही योगमार्ग में ऋतम्भरा प्रज्ञा आत्मा और मन में व्याप्त होकर योगसिद्धियों के धन से योगियों को कृतार्थ करती है ॥३॥
पदार्थ
(उत-अश्विनोः सखा-असि) हाँ तू कानों की सखा—समान ख्यान—समान धर्म वाली है (उत गवां माता) और स्तुतिकर्ताओं का मान करने वाली है (उत) और (उषः) तू परमात्मरूप दीप्ति या परमात्मज्योति (वस्वः-ईशिषे) जगत् की वस्तुमात्र का१ स्वामित्व करती है॥३॥
विशेष
<br>
विषय
शक्ति, ज्ञान व धन
पदार्थ
१. हे (उषः) = उष:काल ! तू (उत) = एक तो (अश्विनोः सखा असि) = प्राणापान का सखा है । तुझमें योगीलोग प्राणापान की साधना किया करते हैं। प्रातःकाल शुद्ध वायु में भ्रमण भी स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उसमें ozone का अंश अधिक होता है, अतएव वह हमारे श्वासोच्छ्वास के लिए भी अधिक उपयोगी होती है । इस प्रकार उषा प्राणापान की मित्र है।
२. (उत) = और हे उष: !-तू (गवाम् माता असि) = हमारी इन्द्रियों की निर्मात्री है। तू उषर्बुद्धों को कर्मेन्द्रियों द्वारा यज्ञ में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरणा देती है तथा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा पाँचों प्रकार से ज्ञान प्राप्ति में जुट जाने के लिए कहती है । इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ भी सशक्त बनती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ भी उज्ज्वल ।
३. हे उषः ! तू (वस्वः उत) = निवास के लिए आवश्यक धन का भी (ईशिषे) = ईशन करती है, अर्थात् जो मनुष्य प्रातः काल उठकर अपने नित्यकृत्यों को ठीक से करता है वह शक्ति-सम्पन्न व समझदार बनकर जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन को भी ठीक से जुटा पाता है। ।
यह संसार एक संघर्ष का स्थान है। इस संघर्ष में विजयी बनने के लिए प्रात: जागरण आवश्यक है, इसीलिए इस संग्राम के करनेवाले, इन मन्त्रों के ऋषि पुरुमीढ और अजमीढ उषा से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उस प्रेरणा का परिणाम शक्ति व ज्ञानवृद्धि तथा जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन की प्राप्ति के रूप में होता है ।
भावार्थ
मैं उष:काल से प्रेरणा प्राप्त कर शक्ति, ज्ञान व धन का विजेता बनूँ ।
विषय
missing
भावार्थ
पूर्व ऋचा के समान ही हे (उषः) ज्योतिष्मति ! विशोका नामक प्रज्ञे ! (उत) यद्यपि (अश्विनोः) अश्वि अर्थात् प्राण और अपान दोनों की तू (सखा असि) सखा है, (उत गवां माता असि) और गो अर्थात् इन्द्रियों की तू उत्पादक माता के समान है। अथवा उनके गृहीत ज्ञान को भी ग्रहण करने हारी, प्रमात्री है (उत) तथापि हे उषः ! प्रकाशस्वरूप प्रज्ञे ! तू (वस्वः) आत्मा या प्राण की (ईशिषे) शक्ति को धारण करती है।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः–१ विरूप आंङ्गिरसः। २, १८ अवत्सारः। ३ विश्वामित्रः। ४ देवातिथिः काण्वः। ५, ८, ९, १६ गोतमो राहूगणः। ६ वामदेवः। ७ प्रस्कण्वः काण्वः। १० वसुश्रुत आत्रेयः। ११ सत्यश्रवा आत्रेयः। १२ अवस्युरात्रेयः। १३ बुधगविष्ठिरावात्रेयौ। १४ कुत्स आङ्गिरसः। १५ अत्रिः। १७ दीर्घतमा औचथ्पः। देवता—१, १०, १३ अग्निः। २, १८ पवमानः सोमः। ३-५ इन्द्रः। ६, ८, ११, १४, १६ उषाः। ७, ९, १२, १५, १७ अश्विनौ॥ छन्दः—१, २, ६, ७, १८ गायत्री। ३, ५ बृहती। ४ प्रागाथम्। ८,९ उष्णिक्। १०-१२ पङ्क्तिः। १३-१५ त्रिष्टुप्। १६, १७ जगती॥ स्वरः—१, २, ७, १८ षड्जः। ३, ४, ५ मध्यमः। ८,९ ऋषभः। १०-१२ पञ्चमः। १३-१५ धैवतः। १६, १७ निषादः॥
संस्कृत (1)
विषयः
अथ पुनरपि प्राकृतिकीं दिव्यां चोषसं वर्णयति।
पदार्थः
प्रथमः—प्राकृतिक्या उषसः पक्षे। (उत) अथ, हे (उषः) प्रभातकान्ते ! त्वम् (अश्विनोः) द्यावापृथिव्योः (सखा) सहचारिणी (असि) वर्तसे, (उत) अपि च (गवाम्) किरणानाम् (माता) जननी (असि) वर्तसे। (उत) अपि च, त्वम् (वस्वः) प्रकाशरूपस्य धनस्य (ईशिषे) अधीश्वरी विद्यसे ॥ द्वितीयः—दिव्याया उषसः पक्षे। (उत) अथापि, हे (उषः) उषर्वद् विद्यमाने ऋतम्भरे प्रज्ञे त्वम् (अश्विनोः) योगिनः आत्ममनसोः (सखा) सहचारिणी (असि) विद्यसे, (उत) अपि च (गवाम्) ईश्वरीयप्रकाशानाम् (माता) जननी (असि) विद्यसे। (उत) अपि च, त्वम् (वस्वः) योगसमाधिरूपस्य धनस्य (ईशिषे) अधिष्ठात्री वर्तसे ॥३॥२ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥३॥
भावार्थः
यथा प्राकृतिक्युषा द्यावापृथिव्यावभिव्याप्य ज्योतिर्धनेन सर्वान् धनवतः करोति तथैव योगमार्गे ऋतम्भरा प्रज्ञाऽऽत्ममनसी अभिव्याप्य योगसिद्धिधनेन योगिनः कृतार्थयति ॥३॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O intellect, thou art the friend of the Prana and Apana, the mother of the beams of knowledge, and the ruler of wealth!
Meaning
O Dawn, while you are a friend of the sun and moon and mother of sunrays, you also command the wealths of the world. (Rg. 4-52-3)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (उत अश्विनोः सखा असि) હાં, તું કાનોની મિત્ર-સમાન નામ-સમાનધર્મ વાળી છે. (उत गवां माता) અને સ્તુતિ કરનારાઓનું માન કરનારી છે. (उत) અને (उषः) તું પરમાત્મરૂપ દીપ્તિ અર્થાત્ પરમજ્યોતિ (वस्वः ईशिषे) જગતના પદાર્થમાત્રનું સ્વામિત્વ કરનારી છે-સ્વામિની છે. (૩)
मराठी (1)
भावार्थ
जशी प्राकृतिक उषा द्यावा पृथ्वीमध्ये व्याप्त होऊन ज्योतिरूप धनाने धनवान करते तसेच योगसिद्धींच्या धनाने योग्यांना कृतार्थ करते ॥३॥
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal