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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 1819
ऋषिः - अग्निः पावकः
देवता - अग्निः
छन्दः - सतोबृहती
स्वरः - पञ्चमः
काण्ड नाम -
62
इ꣣रज्य꣡न्न꣢ग्ने प्रथयस्व ज꣣न्तु꣡भि꣢र꣣स्मे꣡ रायो꣢꣯ अमर्त्य । स꣡ द꣢र्श꣣त꣢स्य꣣ व꣡पु꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि पृ꣣ण꣡क्षि꣢ दर्श꣣तं꣡ क्रतु꣢꣯म् ॥१८१९॥
स्वर सहित पद पाठइरज्य꣢न् । अ꣣ग्ने । प्रथयस्व । जन्तु꣡भिः꣢ । अ꣣स्मे꣡इति । रा꣡यः꣢꣯ । अ꣣र्मत्य । अ । मर्त्य । सः꣢ । द꣣र्शत꣡स्य꣢ । व꣡पु꣢꣯षः । वि । रा꣣जसि । पृण꣡क्षि꣢ । द꣡र्शत꣢म् । क्र꣡तु꣢꣯म् ॥१८१९॥
स्वर रहित मन्त्र
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि दर्शतं क्रतुम् ॥१८१९॥
स्वर रहित पद पाठ
इरज्यन् । अग्ने । प्रथयस्व । जन्तुभिः । अस्मेइति । रायः । अर्मत्य । अ । मर्त्य । सः । दर्शतस्य । वपुषः । वि । राजसि । पृणक्षि । दर्शतम् । क्रतुम् ॥१८१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 1819
(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 4
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(कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » ; सूक्त » 1; मन्त्र » 4
(राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 20; खण्ड » 5; सूक्त » 2; मन्त्र » 4
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में जगदीश्वर की स्तुति तथा उससे प्रार्थना की गयी है।
पदार्थ
हे (अमर्त्य) अमर (अग्ने) मार्गदर्शक परमात्मन् ! (इरज्यन्) सबके ईश्वर होते हुए आप (जन्तुभिः) उत्पन्न अभ्यास, वैराग्य, प्रणव-जप, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, ज्योतिष्मती प्रज्ञा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, समाधि आदियों से (अस्मे) हमारे लिए (रायः) अभ्युदय-निःश्रेयस रूप ऐश्वर्यों का (प्रथयस्व) विस्तार करो। (सः) वह प्रसिद्ध आप (दर्शतस्य) दर्शनीय वा आपके दर्शन में सहायक (वपुषः) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय रूप पञ्च शरीरों के (वि राजसि) विशिष्ट राजा हो। आप ही हमारे मन में (दर्शतम्) ज्ञान-दर्शन के साधन (क्रतुम्) सङ्कल्प को (पृणक्षि) संयुक्त करते हो ॥४॥
भावार्थ
जगदीश्वर की ही सहायता से योगसाधना में संलग्न उपासक अपने लक्ष्य की पूर्ति में सफल होते हैं ॥४॥
पदार्थ
(अमर्त्य-अग्ने) हे मरणधर्मरहित अग्रणेता परमात्मन्! तू (इरज्यन्) स्वामित्व करता हुआ८ (अस्य जन्तुभिः ‘जन्तुभ्यः’) हम उपासक मनुष्यों के लिये९ (रायः प्रथयस्व) धनों—अध्यात्म ऐश्वर्यों—शम-दम आदियों को प्रथित कर—प्रसारित कर (सः) वह तू (दर्शतस्य वपुषः) दर्शनीयरूप—स्वरूप—मोक्ष का (विराजसि) विशेष राजा हो रहा है (दर्शतं क्रतुं पृणक्षि) दर्शनीय कर्म—जगत्१ को सम्पृक्त करता है—हमारे से मिलाता है॥४॥
विशेष
<br>
विषय
गोधन और जीवन-सौन्दर्य
पदार्थ
गत मन्त्र में सुन्दर जीवन का उल्लेख था । प्रस्तुत मन्त्र में सुन्दर जीवन के निर्माण के प्रमुख साधन का संकेत है। प्रभु कहते हैं कि (अग्ने) = उन्नति के इच्छुक जीव ! हे (अमर्त्य) = असमय में शरीर को न छोड़नेवाले अथवा लौकिक भोगों के पीछे न मरनेवाले जीव ! तू (रायः इरज्यन्) = धनों का स्वामी होना चाहता हुआ [इरज्य=to be master of] (अस्मे जन्तुभिः) = हमारे इन 'गौ, अश्व, अजा, अवि=ewe]' आदि पशुओं से (प्रथयस्व) = सम्पत्ति को विस्तृत कर - सम्पत्ति को बढ़ा ।
यहाँ ‘अग्ने' और 'अमर्त्य ' इन शब्दों से सम्बोधन करके जीव को स्पष्ट संकेत किया है कि यदि तू जीवन में प्रगति करना चाहता है, यदि तू दीर्घ जीवन का इच्छुक है, यदि तू चाहता है कि तेरे मन की भावनाएँ पवित्र बनी रहें, तू भोगासक्त न हो जाए तो तू अपनी सम्पत्ति को गौ आदि पशुओं के द्वारा ही बढ़ानेवाला बन । 'गोपालन, कृषि, ऊन व रेशम के कपड़ों का निर्माण'– ये सब कार्य पशुओं से सम्बद्ध होते हुए हमारे ऐश्वर्य को बढ़ानेवाले हैं । वैश्य ने इन्हीं कार्यों के द्वारा धन को बढ़ाने का यत्न करना है । ('अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व') = 'जूआ मत खेल, खेती ही कर ' यह वेद का स्पष्ट आदेश है । ('युनक्त सीरा:') = हल चलाओ यह वेद कह रहा है । ('ऊर्णासूत्रेण कवयो वयन्ति') = विद्वान् लोग ऊन के सूत से कपड़ा बुनते हैं – यह वेदवाक्य है । (‘येन धनेन प्रपणं चरामि')=इत्यादि मन्त्रों में धन के द्वारा क्रय-विक्रय व व्यापार का भी उल्लेख है, परन्तु सट्टे = speculation के ढंग के व्यापार का वेद में निषेध-ही- निषेध है । श्रम से प्राप्त धन ही ठीक है ।
यदि जीव इस निर्देश का पालन करेगा तो प्रभु कहते हैं कि (सः) = वह तू (दर्शतस्य वपुषः) = दर्शनीय सुन्दर शरीर से (विराजसि) = विशिष्टरूप से चमकता है। श्रम से प्राप्त धन शरीर को सुन्दर बनाता है। इतना ही नहीं, ऐसा करने पर तू (दर्शतं क्रतुम्) = दर्शनीय सुन्दर संकल्पों को (पृणक्षि) = मन में धारण करनेवाला होता है, सात्त्विक धन जहाँ शरीर को सुन्दर बनाता है वहाँ वह मन को भी पवित्र बनानेवाला होता है सात्त्विक धन के परिणामरूप मन में अशुभ संकल्प उत्पन्न नहीं होते।
इस मन्त्रार्थ से यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक संस्कृति में 'गोपालन' का इतना महत्त्व क्यों है ? ऋषियों के आश्रमों की गौवों के बिना हम कल्पना ही नहीं कर पाते । वेद तो कहता है कि 'वसु, रुद्र व आदित्यों' का निर्माण करनेवाली तो गौ ही हैं । यही धन सात्त्विक है । गोधन ही धन है । एक युग था जब पशुधन ही धन समझा जाता था ‘pecuniary' यह इंग्लिश का शब्द भी उस युग का स्मरण कर रहा है। उस समय मनुष्यों के शरीर भी सुन्दर थे । उसी युग को लाने का हमें प्रयत्न करना है ।
भावार्थ
प्रभु के आदेश को सुनते हुए हम गवादि पशुओं द्वारा ही धनी बनें और उनके दूध आदि के प्रयोग से सुन्दर, स्वस्थ, दर्शनीय शरीर व शिवसंकल्पात्मक मनोंवाले बनें ।
विषय
missing
भावार्थ
हे (अग्ने) प्रकाशस्वरूप ! हे (अमर्त्य) अविनाशी परमामान् ! आप (जन्तुभिः) उत्पन्न होने हारे जन्तुओं द्वारा (राज्यम्) ऐश्वर्य को बढ़ाते हुए (अस्मे) हमारे (रायः) धनों को (प्रथयस्व) बढ़ाओ। (सः) वह आप (दर्शतस्य) दर्शनीय (वपुषः) अपने बीज वपन करने हारे, उत्पादक सामर्थ्य से (विराजसि) सब पर ईश्वर होकर विराजमान हैं। और आप (दर्शतं) दर्शनीय (क्रतुं) अपने बनाए हुए इस संसार को (पृणज्ञि) पालन पोलण करते हो।
टिप्पणी
‘पूणक्षिसानसिं’ इति ऋ०।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः—१ अग्निः पावकः। २ सोभरिः काण्वः। ५, ६ अवत्सारः काश्यपः अन्ये च ऋषयो दृष्टलिङ्गाः*। ८ वत्सप्रीः। ९ गोषूक्तयश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ। १० त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिंधुद्वीपो वाम्बरीषः। ११ उलो वातायनः। १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इति साम ॥ देवता—१, २, ८ अग्निः। ५, ६ विश्वे देवाः। ९ इन्द्रः। १० अग्निः । ११ वायुः । १३ वेनः। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ छन्दः—१ विष्टारपङ्क्ति, प्रथमस्य, सतोबृहती उत्तरेषां त्रयाणां, उपरिष्टाज्ज्योतिः अत उत्तरस्य, त्रिष्टुप् चरमस्य। २ प्रागाथम् काकुभम्। ५, ६, १३ त्रिष्टुङ। ८-११ गायत्री। ३, ४, ७, १२ इतिसाम॥ स्वरः—१ पञ्चमः प्रथमस्य, मध्यमः उत्तरेषां त्रयाणा, धैवतः चरमस्य। २ मध्यमः। ५, ६, १३ धैवतः। ८-११ षड्जः। ३, ४, ७, १२ इति साम॥ *केषां चिन्मतेनात्र विंशाध्यायस्य, पञ्चमखण्डस्य च विरामः। *दृष्टिलिंगा दया० भाष्ये पाठः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ जगदीश्वरं स्तौति प्रार्थयते च।
पदार्थः
हे (अमर्त्य) अमर (अग्ने) मार्गदर्शक परमात्मन् ! (इरज्यन्) ईश्वरो भवन् त्वम्। [इरज्यतिः ऐश्वर्यकर्मा। निघं० २।२१।] (जन्तुभिः) जातैः अभ्यासवैराग्यप्रणवजपमैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाज्योतिष्मती- प्रज्ञाऋतम्भरा-प्रज्ञासमाध्यादिभिः। [जायन्ते जन्यन्ते वा ये ते जन्तवः। ‘कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च’ उ० १।७३ इति तुः प्रत्ययः।] (अस्मे) अस्मभ्यम् (रायः) अभ्युदयनिःश्रेयसरूपाणि ऐश्वर्याणि (प्रथयस्व) विस्तारय। (सः) असौ प्रसिद्धः त्वम् (दर्शतस्य) दर्शनीयस्य, त्वद्दर्शनसहायभूतस्य वा (वपुषः) अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञान- मयानन्दमयरूपस्य देहपञ्चकस्य (वि राजसि) विशिष्टो राजा भवसि। त्वमेवास्माकं मनसि (दर्शतम्) ज्ञानदर्शनसाधनम् (क्रतुम्) संकल्पम् (पृणक्षि) संयोजयसि ॥४ ॥२
भावार्थः
जगदीश्वरस्यैव साहाय्येन योगसाधनारता उपासकाः स्वलक्ष्यपूर्तौ सफलीभवन्ति ॥४ ॥
इंग्लिश (2)
Meaning
O Immortal God, spreading forth Thy glory, with Thy dignities give us wealth. Thou shinest out as Ruler Over all, with Thy beautiful power, and nourishest this handsome world created by Thee!
Meaning
Immortal Agni, waxing and exalting with all living beings, develop and expand the wealth and excellence of life for us. Of noble and gracious form as you are and shine and rule as you do, join us with yajnic action and bless us with abundant fruit of success and victory. (Rg. 10-140-4)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अमर्त्य अग्ने) હે મરણધર્મ રહિત અગ્રણી પરમાત્મન્ ! તું (इरज्यन्) સ્વામીત્વ કરતાં (अस्य जन्तुभिः "जन्तुभ्यः") અમારા માટે-ઉપાસક મનુષ્યો માટે (रायः प्रथयस्व) ધનો-ઐશ્વર્યો-શમ, દમ આદિને વિસ્તૃત કર-પ્રસારિત કર. (सः) તે તું (दर्शतस्य वपुषः) દર્શનીય રૂપ-સ્વરૂપ-મોક્ષનો (विराजसि) વિશેષ રાજા બની રહ્યો છે. (दर्शतं क्रतुं पृणक्षि) દર્શનીય કર્મ-જગત્ને સંપુક્ત કરે છે-અમારાથી જોડે છે. (૪)
मराठी (1)
भावार्थ
जगदीश्वराच्या साह्याने योगसाधनेत संलग्न उपासक आपल्या लक्ष्यपूर्तीत सफल होतात. ॥४॥
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