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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1857
    ऋषिः - अप्रतिरथ ऐन्द्रः देवता - इन्द्रः छन्दः - त्रिष्टुप् स्वरः - धैवतः काण्ड नाम -
    34

    इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ वृ꣢ष्णो꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ रा꣡ज्ञ꣢ आदि꣣त्या꣡नां꣢ म꣣रु꣢ता꣣ꣳ श꣡र्ध꣢ उ꣣ग्र꣢म् । म꣣हा꣡म꣢नसां भुवनच्य꣣वा꣢नां꣣ घो꣡षो꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ ज꣡य꣢ता꣣मु꣡द꣢स्थात् ॥१८५७॥

    स्वर सहित पद पाठ

    इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । वृ꣡ष्णः꣢꣯ । व꣡रु꣢꣯णस्य । रा꣡ज्ञः꣢꣯ । आ꣣दित्या꣡ना꣢म् । आ꣣ । दित्या꣡ना꣢म् । म꣣रु꣡ता꣢म् । श꣡र्धः꣢꣯ । उ꣣ग्र꣢म् । म꣣हा꣡म꣢नसाम् । म꣣हा꣢ । म꣣नसाम् । भुवनच्यवा꣡ना꣢म् । भु꣣वन । च्यवा꣡ना꣢म् । घो꣡षः꣢꣯ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । ज꣡य꣢꣯ताम् । उत् । अ꣣स्थात् ॥१८५७॥


    स्वर रहित मन्त्र

    इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुताꣳ शर्ध उग्रम् । महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात् ॥१८५७॥


    स्वर रहित पद पाठ

    इन्द्रस्य । वृष्णः । वरुणस्य । राज्ञः । आदित्यानाम् । आ । दित्यानाम् । मरुताम् । शर्धः । उग्रम् । महामनसाम् । महा । मनसाम् । भुवनच्यवानाम् । भुवन । च्यवानाम् । घोषः । देवानाम् । जयताम् । उत् । अस्थात् ॥१८५७॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1857
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 3; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अब वीरों के विजय-घोष का वर्णन करते हैं।

    पदार्थ

    (वृष्णः) महाबली (इन्द्रस्य) विघ्नविदारक जीवात्मा का, (राज्ञः) सङ्कल्प बल से राजित (वरुणस्य) श्रेष्ठ मन का और (आदित्यानाम्) दोषापहारी (मरुताम्) प्राणों का (उग्रम्) उग्र (शर्धः) बल (उदस्थात्) ऊपर उठे। (महामनसाम्) बड़े हौसलेवाले, (भुवनच्यवानाम्) ब्रह्माण्ड को डिगा देनेवाले, (जयताम्) विजय-लाभ करनेवाले (देवानाम्) दिव्य भावों का और धर्मात्मा रण-बाँके वीरों का (घोषः) विजय-घोष (उदस्थात्) ऊपर उठे ॥३॥ यहाँ ‘भुवनच्यवानाम्’ में असम्बन्ध में सम्बन्धरूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है। वीर रस है ॥३॥

    भावार्थ

    उत्साही आत्मा, मन, प्राण आदि शरीरस्थ रण-बाँके वीरों की और राष्ट्र के सेनापति आदि वीरोद्भटों की देवासुरसङ्ग्राम में विजय निश्चित होती है ॥३॥

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    पदार्थ

    (इन्द्रस्य) ऐश्वर्यवान्—(राज्ञः-वृष्णः) राजमान सुखवर्षक (आदित्यानाम्) अदिति—अखण्डसुखसम्मत्ति मुक्ति के स्वामी—(मरुताम्) वासनाओं को मार देनेवाले—परमात्मा का (उग्रः शर्द्धः) तीव्र प्रभावकारी बल१ है (महामनसां भुवनच्यवानां जयतां देवानाम्) महामना—महान् ज्ञानी—सर्वज्ञलोकों को गति देनेवाले, अभिमत करने, स्वाधीन रखनेवाले दीप्यमान परमात्मा का (घोषः-उदस्थात्) आशीर्वादवचन ऊपर है॥३॥

    विशेष

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    विषय

    देवों के तीन महारथी

    पदार्थ

    देवताओं का जयघोष उठे- - गत मन्त्र में प्राण - साधना तथा इन्द्रियों के वशीकरण के द्वारा देवसेनाओं की उत्पत्ति, उद्गति व प्रगति का उल्लेख हुआ था । वे असुरों पर विजय पाती हुई आगे बढ़ रही थीं । प्रस्तुत मन्त्र में विजय पानेवाली उन्हीं देवसेनाओं के जयघोष का वर्णन हैं—

    १. (वृष्णः इन्द्रस्य) = शक्तिशाली व औरों पर सुखों की वर्षा करनेवाले, जितेन्द्रिय - इन्द्रियों के अधिष्ठाता इन्द्र का तथा २. (राज्ञः वरुणस्य) = [well regulated] अति नियमित जीवनवाले वरुण का, जिसने सब बुराइयों का वारण किया है तथा ३. (आदित्यानां मरुताम्) = अपने अन्दर निरन्तर उत्तमता का ग्रहण करनेवाले [आदानात् आदित्यः] प्राण-साधक मरुतों का [मरुतः प्राणा:] (शर्धः) = बल (उग्रम्) = बड़ा उदात्त व तीव्र होता है ।

    इन्द्र का विशेषण वृषन् है— जो भी जितेन्द्रिय बनेगा वह अवश्य शक्तिशाली व औरों पर सुखों की वर्षा करनेवाला होगा ।

    वरुण श्रेष्ठ का विशेषण 'राज्ञः ' है- - उत्तम प्रकार से नियमित जीवनवाला । वस्तुतः नियमित जीवन ही हमें उत्तम बनाता है।

    मरुत् – प्राण-साधना करनेवाले आदित्य हैं - अपने अन्दर निरन्तर दिव्यता का आदान कर रहे हैं। आदित्य अदिति-पुत्र हैं—'अदीना देवमाता' के पुत्र हैं। देवमाता इन दिव्य गुणरूप आदित्यों को जन्म देती है ।

    इन्द्र, वरुण व मरुतों का, जो देवताओं के तीन महारथी हैं, बल [शर्ध:] बड़ा उदात्त [उग्रम्] होता है, इन महारथियों का अनुगमन करनेवाले (महामनसाम्) = विशाल मनवाले (भुवनच्यवानाम्) = भुवनों का भी त्याग कर देनेवाले, अर्थात् लोकहित के लिए अधिक-से-अधिक त्याग करने के लिए उद्यत (देवानाम्) = देवताओं का (जयताम्) = जो सदा जय प्राप्त करनेवाले हैं, उनका (घोषः) = विजयघोष (उदस्थात्) = मेरे जीवन में सदा उठे, अर्थात् मेरे जीवन में सदा देवों का विजय हो और असुरों का पराजय ।
    यहाँ प्रसङ्गवश देवों की दो विशेषताओं का उल्लेख हुआ है एक तो वे ‘विशाल मनवाले’ होते हैं और दूसरा वे 'अधिक-से-अधिक त्याग के लिए उद्यत' होते हैं । विशाल हृदयता व त्याग के बिना कोई देव नहीं बन पाता ।

    भावार्थ

    मैं इन्द्र बनूँ, वरुण बनूँ, मरुत् होऊँ । हृदय को विशाल बनाऊँ, सदा त्याग के लिए उद्यत रहूँ ।

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    विषय

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    भावार्थ

    (वृष्णः) सुखों की वर्षा करने हारे सिद्ध, धर्मसेध समाधि के साधक (इन्द्रस्य) इन्द्र, आत्मा का (राज्ञः) सबक स्वामी (वरुणस्य) सर्वश्रेष्ठ परमात्मा का और (आदित्यानां) १२ आदित्य और (मरुतां) प्राण इनका (उग्रं) अति प्रबल (शर्द्धः) बल सफल हो। (महामनसां) विशाल चित एवं ज्ञान के धारणकर्त्ता (भुवनच्यवानां) भुवन अर्थात् देह के बन्धन को नाश करने हारे (जयताम्) आसुरभावों पर विजय करने वाले (देवानां) इन सात्विक साधकों का (घोषः) नाद (उद् अस्थात्) ऊपर उठे। धार्मिक राजा और उसकी सेनाओं के विषय में यह मंत्र स्पष्ट है। परमात्मा पक्ष में भी इन मंत्रों की योजना है। प्रलय काल में तीनों लोकों का विनाश ही त्रिपुरदहन है। उस कल्पना को चित्त में रखकर इस अलंकार को लगाना उचित है।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—४ अप्रतिरथ एन्द्रः। ५ अप्रतिरथ ऐन्द्रः प्रथमयोः पायुर्भारद्वाजः चरमस्य। ६ अप्रतिरथः पायुर्भारद्वाजः प्रजापतिश्च। ७ शामो भारद्वाजः प्रथमयोः। ८ पायुर्भारद्वाजः प्रथमस्य, तृतीयस्य च। ९ जय ऐन्द्रः प्रथमस्य, गोतमो राहूगण उत्तरयोः॥ देवता—१, ३, ४ आद्योरिन्द्रः चरमस्यमस्तः। इन्द्रः। बृहस्पतिः प्रथमस्य, इन्द्र उत्तरयोः ५ अप्वा प्रथमस्य इन्द्रो मरुतो वा द्वितीयस्य इषवः चरमस्य। ६, ८ लिंगोक्ता संग्रामाशिषः। ७ इन्द्रः प्रथमयोः। ९ इन्द्र: प्रथमस्य, विश्वेदेवा उत्तरयोः॥ छन्दः—१-४,९ त्रिष्टुप्, ५, ८ त्रिष्टुप प्रथमस्य अनुष्टुवुत्तरयोः। ६, ७ पङ्क्तिः चरमस्य, अनुष्टुप् द्वयोः॥ स्वरः–१–४,९ धैवतः। ५, ८ धैवतः प्रथमस्य गान्धारः उत्तरयोः। ६, ७ पञ्चमः चरमस्य, गान्धारो द्वयोः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ वीराणां विजयघोषो वर्ण्यते।

    पदार्थः

    (वृष्णः) महाबलस्य (इन्द्रस्य) विघ्नविदारस्य जीवात्मनः, (राज्ञः) संकल्पबलेन राजितस्य (वरुणस्य) श्रेष्ठस्य मनसः, (आदित्यानाम्) दोषापहारकाणाम् (मरुताम्) प्राणानां च [आददते शरीरस्थान् दोषान् ये ते आदित्याः।] (उग्रम्) तीक्ष्णम् (शर्धः) बलम् (उदस्थात्) उत्तिष्ठतु। (महामनसाम्) महोत्साहानाम्, (भुवनच्यवानाम्) ब्रह्माण्डच्यावयितॄणाम्, (जयतां) विजयं लभमानानाम् (देवानाम्) दिव्यभावानां धार्मिकाणां रणोद्भटानां वा (घोषः) विजयघोषः (उदस्थात्) उत्तिष्ठतु। [अत्र लोडर्थे लुङ्] ॥३॥२ अत्र ‘भुवनच्यवानाम्’ इत्यत्रासम्बन्धे सम्बन्धरूपोऽतिशयोक्ति- रलङ्कारः वीरो रसः ॥३॥

    भावार्थः

    उत्साहवतामात्ममनःप्राणादीनां शरीरस्थानां वीरप्रकाण्डानां, राष्ट्रस्य सेनापत्यादिवीरोद्भटानां च देवासुरसंग्रामे विजयः सुनिश्चितः खलु ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Musical instruments, to infuse valour and energy should be played upon before the commencement of the battle, by the learned soldiers of the powerful Commander, and mighty King, who possess decent homes, lofty ideas, are able to conquer the enemies, have led a life of celibacy for forty-eight years, are highly learned and strong, full of terrible power.

    Translator Comment

    See Yajur 17-41.

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    Meaning

    Great is the valour and passion of victorious and virile Indra, of the ruler Varuna, visionary Adityas and impetuous Maruts, all great and magnanimous at heart who shake the world with their vision and performance, and so let these victorious divinities tumultuous up roar of victory rise and reverberate in the skies. (Rg. 10-103-9)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (इन्द्रस्य) ઐશ્વર્યવાન, (राज्ञः वृष्णः) પ્રકાશમાન સુખવર્ષક (आदित्यानाम्) અદિતિ-અખંડ સુખ સંમતિ મુક્તિના સ્વામી, (मरुताम्) વાસનાઓને મારી નાખનાર-પરમાત્માનું (उग्रः शद्र्धः) તીવ્ર પ્રભાવકારી બળ છે. (महामनसां भुवनच्यवानां जयतां देवानाम्) મહામના-મહાજ્ઞાની-સર્વજ્ઞ લોકોને ગતિ આપનાર, અભિમત કરનાર, સ્વાધીન રાખનાર, દેદીપ્યમાન પરમાત્માના (घोषः उदस्थात्) આશીર્વાદ વચન ઉપર છે. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    उत्साही आत्मा, मन, प्राण इत्यादी शरीरस्थ रणवीरांचा व राष्ट्राचे सेनापती इत्यादी वीर उद्भटांचा देवासुरसंग्रामात विजय निश्चित असतो. ॥३॥

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