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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 1866
    ऋषिः - पायुर्भारद्वाजः देवता - संग्रामशिषः छन्दः - पङ्क्तिः स्वरः - पञ्चमः काण्ड नाम -
    36

    य꣡त्र꣢ बा꣣णाः꣢ स꣣म्प꣡त꣢न्ति कुमा꣣रा꣡ वि꣢शि꣣खा꣡ इ꣢व । त꣡त्र꣢ नो꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢ति꣣र꣡दि꣢तिः꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु वि꣣श्वा꣢हा꣣ श꣡र्म꣢ यच्छतु ॥१८६६॥

    स्वर सहित पद पाठ

    य꣡त्र꣢꣯ । बा꣣णाः꣢ । सं꣣प꣡त꣢न्ति । स꣣म् । प꣡त꣢꣯न्ति । कु꣣माराः꣢ । वि꣣शिखाः꣢ । वि꣣ । शिखाः꣢ । इ꣣व । त꣡त्र꣢꣯ । नः꣣ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । प꣡तिः꣢꣯ । अ꣡दि꣢꣯तिः । अ । दि꣣तिः । श꣡र्म꣢꣯ । य꣢च्छतु । विश्वा꣡हा꣢ । श꣡र्म꣢꣯ । य꣣च्छतु ॥१८६६॥


    स्वर रहित मन्त्र

    यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥१८६६॥


    स्वर रहित पद पाठ

    यत्र । बाणाः । संपतन्ति । सम् । पतन्ति । कुमाराः । विशिखाः । वि । शिखाः । इव । तत्र । नः । ब्रह्मणः । पतिः । अदितिः । अ । दितिः । शर्म । यच्छतु । विश्वाहा । शर्म । यच्छतु ॥१८६६॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 1866
    (कौथुम) उत्तरार्चिकः » प्रपाठक » 9; अर्ध-प्रपाठक » 3; दशतिः » ; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
    (राणानीय) उत्तरार्चिकः » अध्याय » 21; खण्ड » 1; सूक्त » 6; मन्त्र » 3
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र में युद्ध में विजय की प्रार्थना है।

    पदार्थ

    (यत्र) जिस समराङ्गण में (बाणाः) बाण आदि अस्त्र (सम्पतन्ति) गिरते हैं, (विशिखाः कुमाराः इव) जैसे चूड़ाकर्म संस्कार कराये हुए शिखा-रहित बालक चलने का अभ्यास करते हुए पग-पग पर गिरते हैं, (तत्र) उस समराङ्गण में (ब्रह्मणः पतिः) ज्ञान का रक्षक जीवात्मा और महान् राष्ट्र का रक्षक सेनापति तथा (अदितिः) कुतर्कों से खण्डित न होनेवाली बुद्धि और राष्ट्रभूमि (नः) हमें (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे, (विश्वाहा) सदा (शर्म) कल्याण (यच्छतु) प्रदान करे। [निरुक्त्त (१०।४०) में कहा गया है कि किसी वाक्य को दोहराने में बहुत सा चमत्कारिक अर्थ प्रकट होता है। जैसे-‘अहो, दर्शनीय है, अहो दर्शनीय है’, इस वाक्य में। उसी के अनुसार यहाँ ‘शर्म यच्छतु’ वाक्य को दुहराने में बहुत-सा अर्थ समाविष्ट है।] ॥३॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥३॥

    भावार्थ

    बाह्य सङ्ग्राम में सेनापति प्रतिपक्षी योद्धाओं को तेज बाणों से काट कर अपने पक्षवालों जैसे को सुख देवे, वैसे ही आध्यात्मिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा काम-क्रोध आदि रिपुओं का छेदन-भेदन करके मनोभूमि को शत्रु-रहित करे ॥३॥

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    पदार्थ

    (यत्र) जिस अवसर पर (बाणाः) कामबाण—काम आदि दोषों का बाण—प्रहारक प्रभाव (कुमाराः-विशिखाः-इव) कुत्सित मार करने वाले धूमरहित ज्वालाओं के समान (सम्पतन्ति) प्रहार कर रहे हैं (तत्र) उस अवसर पर (ब्रह्मणः-पतिः-अदितिः) ब्रह्माण्ड का स्वामी अविनाशी समस्त देवों की माता निर्माता परमात्मा (नः-शर्म यच्छतु) हमारे लिये सुख शरण दे॥३॥

    विशेष

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    विषय

    पूर्ण प्रयत्न और कल्याण

    पदार्थ

    प्रस्तुत मन्त्र में ' बाणा: ' शब्द जीवात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् में ‘प्रणव' को धनुष कहा है, ब्रह्म को ‘लक्ष्य' और आत्मा को 'शर' [शरो ह्यात्मा] । वह जीव जो निरन्तर  [वण्-to sound] उस प्रभु का गुणगान कर रहा है 'बाण' है । ये 'बाण' प्रभु के नाम जपने में लगे हों और हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे हों, ऐसी बात नहीं; वे निरन्तर क्रियाशील हैं। ये ही कामादि शत्रुओं को बुरी तरह से मारनेवाले होने से 'कुमार' है । ये अपने जीवन में वासनाओं के विनाश के लिए बद्धप्रतिज्ञ हैं, ये अपनी शिखा को उसी दिन बाँधेंगे जिस दिन अपनी प्रतिज्ञा को पूरा कर लेंगे । इसी से यहाँ मन्त्र में इन्हें 'विशिख' कहा है। जब मनुष्य अपना जीवन इस प्रकार का बनाता है तभी वह ज्ञान का पति, विनाशरहित प्रभु उनका कल्याण करते हैं । (यत्र) = जिस समय में (बाणा:) = प्रभु के नाम जप करनेवाले (सम्पतन्ति) = सम्यक् गतिशील होते हैं, अपने को सदा उत्तम कार्यों में व्याप्त रखते हैं, और इस प्रकार (कुमारा:) = कामादि वासनाओं को बुरी तरह से मारनेवाले होते हैं और (वि-शिखाइव) = ऐसे प्रतीत होते हैं कि इन्होंने वासना-विजय के लिए प्रतिज्ञा - सी धारण की है और प्रतिज्ञापूर्ति तक अपनी शिखा न बाँधने का निश्चय किया है (तत्र) = उस समय (ब्रह्मणस्पतिः) = ज्ञान का पति परमात्मा (अदितिः) = जिसकी शरण में जाने पर खण्डन या नाश का भय नहीं [अविद्यमाना दितिर्यस्मात्] (नः) = हमें (शर्म) = कल्याण व सुख (यच्छतु) = प्राप्त कराए और अब तो (विश्वाहा) = सब दिन, अर्थात् सदा (शर्म यच्छतु) = वे प्रभु हमें कल्याण प्राप्त कराएँ । 

    वस्तुत: जिस दिन हम १. वाणा: = प्रभु स्तवन में रत होंगे, २. सम्पतन्ति = उत्तम क्रियाशील होंगे। ३. कुमारा:=वासनाओं को कुचलनेवाले बनेंगे, ४. विशिखा इव - वासनाविनाश के लिए वद्धप्रतिज्ञ होंगे, उसी दिन हम प्रभु की कृपा के पात्र होंगे और कल्याण के भागी होंगे। बिना जीव के पूर्ण प्रयत्न के प्रभु अपने आप ही हमारा कल्याण नहीं कर देते । 

    भावार्थ

    हम वासना- विनाश के लिए पूर्ण प्रयत्न करते हुए प्रभु के कृपापात्र बनें ।

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    विषय

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    भावार्थ

    (यत्र) जहां (विशिखाः) शिखारहित (कुमारा इव) बालकों के समान (बाणाः) बाण (सम्पतन्ति) पड़ रहे हों (तत्र) वहां (ब्रह्मणस्पतिः) वेद का विद्वान्, परमेश्वर (अदितिः) अखण्डित सामर्थ्यवान् होकर हमें (शर्म) शान्ति और सुख (यच्छतु) प्रदान करें और (विश्वाहा) सदा (शर्म यच्छतु) कल्याण करें।

    टिप्पणी

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    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः—१—४ अप्रतिरथ एन्द्रः। ५ अप्रतिरथ ऐन्द्रः प्रथमयोः पायुर्भारद्वाजः चरमस्य। ६ अप्रतिरथः पायुर्भारद्वाजः प्रजापतिश्च। ७ शामो भारद्वाजः प्रथमयोः। ८ पायुर्भारद्वाजः प्रथमस्य, तृतीयस्य च। ९ जय ऐन्द्रः प्रथमस्य, गोतमो राहूगण उत्तरयोः॥ देवता—१, ३, ४ आद्योरिन्द्रः चरमस्यमस्तः। इन्द्रः। बृहस्पतिः प्रथमस्य, इन्द्र उत्तरयोः ५ अप्वा प्रथमस्य इन्द्रो मरुतो वा द्वितीयस्य इषवः चरमस्य। ६, ८ लिंगोक्ता संग्रामाशिषः। ७ इन्द्रः प्रथमयोः। ९ इन्द्र: प्रथमस्य, विश्वेदेवा उत्तरयोः॥ छन्दः—१-४,९ त्रिष्टुप्, ५, ८ त्रिष्टुप प्रथमस्य अनुष्टुवुत्तरयोः। ६, ७ पङ्क्तिः चरमस्य, अनुष्टुप् द्वयोः॥ स्वरः–१–४,९ धैवतः। ५, ८ धैवतः प्रथमस्य गान्धारः उत्तरयोः। ६, ७ पञ्चमः चरमस्य, गान्धारो द्वयोः॥

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ युद्धे विजयः प्रार्थ्यते।

    पदार्थः

    (यत्र) यस्मिन् समराङ्गणे (बाणाः) शराः, शरादीन्यस्त्राणि (संपतन्ति) संपातं कुर्वन्ति, (विशिखाः कुमाराः इव) यथा कृतचूडाकर्माणः शिखारहिताः बालाः पदनिक्षेपाभ्यासं कुर्वन्तः पदे पदे पतन्ति, (तत्र) तस्मिन् समराङ्गणे (ब्रह्मणः पतिः) ज्ञानस्य रक्षको जीवात्मा, बृहतो राष्ट्रस्य रक्षकः सेनापतिर्वा, (अदितिः) कुतर्कैरखण्डनीया बुद्धिः राष्ट्रभूमिर्वा (नः) अस्मभ्यम् (शर्म) कल्याणम् (यच्छतु) ददातु, (विश्वाहा) सर्वदा (शर्म) कल्याणम् (यच्छतु) ददातु। [अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते, यथाहो दर्शनीयाहो दर्शनीयेति (निरु० १०।४०) न्यायेनात्र पुनरुक्तौ भूयानर्थः समाविष्टः] ॥३॥२ अत्रोपमालङ्कारः ॥३॥

    भावार्थः

    बाह्ये संग्रामे सेनापतिः प्रतिपक्षिणो भटान् तीक्ष्णैः शरैश्छित्वा स्वपक्षीयेभ्यः सुखं प्रयच्छेत्। तथैवाध्यात्मिके देवासुरसंग्रामे जीवात्मा कामक्रोधादिरिपूंश्छित्त्वा भित्त्वा मनोभूमिं निःसपत्नां कुर्यात् ॥३॥

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    There where the flights of arrows fall like boys whose locks are unshorn, may the Commander, the protector of the big army, grant us shelter, may the entire Assembly adorned with members, grant us a happy home through all our days.

    Translator Comment

    See Yajur 17-48. Like boys: The arrow fall where they list, as the boys before the Mundan Sanskar (tonsure ceremony) play about vigorously where they like. Roth separates Vishikha from kumara and translates( where the arrow fly young and old) that is feathered and unfeathered. Swami Dayananda interprets arrows to mean weapons and arms.

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    Meaning

    O ruler, where the young soldiers with shorn hair fall upon the enemy and showers of missiles rain down upon the targets, there let the controller of nations wealth provide us total security and let the mother earth provide us a safe and comfortable shelter, a shelter of all round security. (Rg. 6-75-17)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (यत्र) જે અવસર પર (बाणाः) કામબાણ-કામ આદિ દોષોના બાણ-પ્રહારક પ્રભાવ (कुमाराः विशिखाः इव) કુત્સિત માર કરનારા ધુમાડા રહિત જ્વાળાઓની સમાન (सम्पतन्ति) પ્રહાર કરી રહેલ છે; (तत्र) તે અવસર પર (ब्रह्मणः पतिः अदितिः) બ્રહ્માંડના સ્વામી-અવિનાશી-સર્વ દેવોની માતા-નિર્માતા પરમાત્મા (नः शर्म यच्छतु) અમારે માટે સુખ શરણ આપે. (૩)
     

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    मराठी (1)

    भावार्थ

    बाह्य संग्रामात सेनापती प्रतिपक्षी योध्यांना तीक्ष्ण बाणांनी मारून आपल्या पक्षाला सुखी करतो, तसेच आध्यात्मिक देवासुर संग्रामात जीवात्म्याने काम-क्रोध इत्यादी शत्रूंचे भेदन छेदन करून मनोभूमीला शत्रूरहित बनवावे. ॥३॥

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