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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 219
ऋषिः - ब्रह्मातिथिः काण्वः
देवता - अश्विनौ, मित्रावरुणौ
छन्दः - गायत्री
स्वरः - षड्जः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
43
दू꣣रा꣢दि꣣हे꣢व꣣ य꣢त्स꣣तो꣢ऽरु꣣ण꣢प्सु꣣र꣡शि꣢श्वितत् । वि꣢ भा꣣नुं꣢ वि꣣श्व꣡था꣢तनत् ॥२१९॥
स्वर सहित पद पाठदू꣣रा꣢त् । दुः꣣ । आ꣢त् । इ꣣ह꣢ । इ꣣व । य꣢त् । स꣣तः꣢ । अ꣣रुण꣡प्सुः꣢ । अ꣡शि꣢꣯श्वितत् । वि । भा꣣नु꣢म् । वि꣣श्व꣡था꣢ । अ꣣तनत् । ॥२१९॥
स्वर रहित मन्त्र
दूरादिहेव यत्सतोऽरुणप्सुरशिश्वितत् । वि भानुं विश्वथातनत् ॥२१९॥
स्वर रहित पद पाठ
दूरात् । दुः । आत् । इह । इव । यत् । सतः । अरुणप्सुः । अशिश्वितत् । वि । भानुम् । विश्वथा । अतनत् । ॥२१९॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 219
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 11;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 3; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 2; खण्ड » 11;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि सूर्य के प्रकाश से और अध्यात्म-प्रकाश से दूरस्थ पदार्थ भी समीपस्थ के समान दीखते हैं।
पदार्थ
प्रथम—खगोल पक्ष में। (अरुणप्सुः) चमकीले रूपवाला सूर्यरूपी इन्द्र (यत्) जब (दूरात्) खगोल में स्थित दूरवर्ती प्रदेश से, मङ्गल-बुध-चन्द्रमा आदि ग्रहोपग्रहों को (इह इव सतः) मानो यहीं समीप में ही स्थित करता हुआ (अशिश्वितत्) चमकाता है, तब (भानुम्) अपने प्रकाश को (विश्वथा) बहुत प्रकार से (वि अतनत्) विस्तीर्ण करता है ॥ द्वितीय—अध्यात्म के पक्ष में। (अरुणप्सुः) तेजस्वी रूपवाला इन्द्र परमेश्वर (यत्) जब, (दूरात्) दूर से अर्थात् व्यवधानयुक्त अथवा दूरस्थ प्रदेश से, पदार्थों को (इह इव सतः) यहाँ समीपस्थ के समान करता हुआ (अशिश्वितत्) योगी के मानस को प्रकाशित करता है, तब (भानुम्) भासमान जीवात्मा को (विश्वथा) सर्व प्रकार से (वि अतनत्) योगैश्वर्य प्राप्त कराकर विस्तीर्ण अर्थात् व्यापक ज्ञानवाला कर देता है ॥६॥ योगाभ्यासी मनुष्य को परमात्मा द्वारा प्रदत्त दिव्य आलोक से सूक्ष्म, ओट में स्थित और दूरस्थ पदार्थों का दूरस्थित ताराव्यूहों का और ध्रुव आदि नक्षत्रों का समीपस्थ वस्तु के समान हस्तामलकवत् साक्षात्कार हो सकता है, यह योगदर्शन में विभूतिपाद में महर्षि पतञ्जलि ने कहा है। योगसिद्धियों के सम्बन्ध में स्वामी दयानन्द के विचार इसी मन्त्र की संस्कृत टिप्पणी में देखें ॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘दूरस्थित को भी मानो समीप-स्थित करता हुआ’ इसमे उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥६॥
भावार्थ
चमकीला सूर्य जब अपने प्रकाश को मङ्गल, बुध, बृहस्पति, चन्द्र आदि ग्रहोपग्रहों पर फेंकता है, तब उसके प्रकाश से वे प्रकाशित हो जाते हैं और वह प्रकाश हमारी आँखों पर प्रतिफलित होकर उन दूरस्थित पदार्थों कोभी समीप में स्थित के समान दिखाता है। उसी प्रकार योगाभ्यास से योगियों के मनों में परमात्मा का दिव्य आलोक प्रतिबिम्बित होकर उनके अन्दर वह शक्ति उत्पन्न कर देता है, जिससे वे सूक्ष्म, ओट में स्थित तथा दूरस्थित पदार्थों को भी साक्षात् समीपस्थ के समान देखने लगते हैं ॥६॥
पदार्थ
(अरुणप्सुः) आरोचमानरूप जिसका है ऐसा इन्द्र—परमात्मा “प्सुः-रूपनाम” [निघं॰ ३.७] “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णम्” [यजु॰ ३१.१८] (दूरात्) दृष्टिपथ से दूर होते हुए (इह-इव) यहीं समीप सा होकर हृदय में या अन्तरात्मा में होकर (यत्) यदा—जब (सतः) सत्पुरुषों—उपासकों को (अशिश्वितत्) रञ्जित कर देता है “श्विता वर्णें” [भ्वादि॰] तब (विश्वथा) सब प्रकार से (भानुम्) ज्ञानप्रकाश को (वि-अतनत्) विशेष रूप से फैलाता—बढ़ाता है।
भावार्थ
सूर्यसमान आरोचमानरूप वाला परमात्मा दृष्टि से दूर होकर भी समीप सा हृदय में अन्तरात्मा में जब सत्पुरुषों उपासकों को रञ्जित कर देता है तब सब प्रकार ज्ञानप्रकाश को विशेषरूप से फैला देता है—बढ़ा देता है॥६॥
विशेष
ऋषिः—ब्रह्मातिथिः (ब्रह्म—परमात्मा में निरन्तर गति रखने वाला उपासक)॥<br>
विषय
सूर्य की भाँति
पदार्थ
इन्द्र इस मन्त्र का देवता है। इन्द्र नाम सूर्य का भी है और इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव का भी। सूर्य (अरुणप्सु) = तेज को खानेवाला [प्सा भक्षणे] अर्थात् अत्यन्त तेजस्वी है। उदय होने पर सब तारों के व ज्योतिष्पिण्डों के तेज को मानो वह खा जाता है । (यत्) = यह सूर्य दूरात् (इह इव) = दूर से भी यहाँ की भाँति (सतः) = सब सत्तावाले पदार्थों को (अशिश्वितत्) = श्वेत कर देता है-चमका देता है। यह सूर्य अपनी (भानुम्) = किरणों को प्रकाश को (विश्वधा) चारों ओर वि (अतनत्) = फैला देता है। १. सूर्य यहाँ से १५ करोड़ किलोमीटर दूर है, परन्तु दूरी का ध्यान न करता हुआ (इह इव) = यहाँ की ही भाँति - मानो समीप ही हो इस प्रकार वह प्रकाश प्राप्त कराता है। इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव को भी अपने प्रकाश - विस्तार के महान् कार्य में कभी किसी को अपने से दूर नहीं मानना । वह लोकहित के कार्य में सभी को अपना परिवार ही समझे। (‘अयुतोऽहम्’)='मैं अपृथक् हूँ' यह उसकी भावना हो। ('वसुधैव कुटुम्बकम्') = सारी पृथिवी उसका कुटुम्ब हो। २. (सतः) = सूर्य विद्यमान पदार्थमात्र को चमका देता है। इसी प्रकार इसके सत्सङ्ग में सभी का अव्याहत प्रवेश हो, तथाकथित दलित व अछूत न आ सकें, ऐसी बात न हो। यह सभी को ज्ञान देना अपना कर्तव्य समझे। ३. सूर्य अपने प्रकाश को सीधी किरणों के रूप में, तिरछी किरणों के रूप में, मृदुरूप में व प्रखररूप में सब प्रकार से फैलाता है, उसकी सब किरणें प्राणशक्ति देनेवाली होती हैं, इसी प्रकार यह इन्द्र भी सीधे शब्दों में व दृष्टान्तों के द्वारा, कभी मृदु शब्दों में और कभी तेजस्वी शब्दों में ज्ञान को फैलाने का कार्य किया करता है।
परन्तु यह सब-कुछ वह कर तभी सकेगा यदि वह 'अरुणप्सु' बनेगा। तेज का - तेजस्वी ज्ञान का-भक्षण करनेवाला बनेगा। 'ब्रह्मचर्य' की मूल भावना ज्ञान का भक्षण ही है। ग्रन्थों को निगलकर मनन करनेवाले व्यक्ति 'अरुणप्सु' बना करते हैं। ये अरुणप्सु ही सूर्य की भाँति प्रकाश फैलानेवाले होते हैं। ये स्वयं ब्रह्मातिथि ज्ञान की ओर चलनेवाले होते हैं तभी औरों को ज्ञान दे पाते हैं। कण-कण करके इन्होंने ज्ञान का संचय किया है, अतः ये ‘काण्व' हैं। ये अपने ज्ञानकणों को औरों को भी प्राप्त करानेवाले होते हैं।
भावार्थ
हम अरुणप्सु बनें और अपने ज्ञान के अरुण प्रकाश को चारों ओर फैलाएँ।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० = ( दूरात् ) = दूर ( सतः ) = विद्यमान रहकर भी परमेश्वर सूर्य के समान ( यत् ) = जब ( अरुणप्सुः ) = प्रातःकालिक प्रभा के समान कान्तिमान् ( इह एव ) = यहां ही ( अशिश्वितत् ) = चमकता है तब ( भानुं ) = कान्ति, प्रजा या दीप्ति को ( विश्वथा वि अतनत् ) = सब ओर फैलाता है । साधक की साधना की सिद्धि के लक्षण विशेष दीप्तियों का मस्तक पर विशेष रूप से चारों ओर दीखना ही है। जैसा लिखा है--
'व्यद्युतद् व्यद्युतदा न्यमीमीषद्' इत्यादि । केन उ० । तद्दूरे तदु अन्तिक इत्यादि । ईश उ० ।
टिप्पणी
२१९–‘यत्सत्यरणप्सुः', 'विश्वधातनत्' इति ऋ० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - ब्रह्मातिथिः :।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - गायत्री।
स्वरः - षड्जः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ सूर्यप्रकाशेनाध्यात्मप्रकाशेन च दूरस्था अपि पदार्था अन्तिकस्था इव दृश्यन्त इत्याह।
पदार्थः
प्रथमः—खगोलपरः। (अरुणप्सुः) अरुणः आरोचमानः प्सुः रूपं यस्य सोऽरुणप्सुः इन्द्रः सूर्यः। अरुणः आरोचनः। निरु० ५।२१। प्सुः इति रूपनाम। निघं० ३।७। (यत्) यदा (दूरात्) खगोलस्थाद् दूरवर्तिप्रदेशात्, मङ्गलबुधचन्द्रादीन् ग्रहोपग्रहान् (इह इव सतः) इह समीपे इव विद्यमानान् कुर्वन् (अशिश्वितत्) आरोचयति। श्विता वर्णे धातोर्ण्यन्तात् लुङि चङि रूपम्। यच्छब्दयोगात् ‘तिङ्ङतिङः’ अ० ८।१।२८ इति प्राप्तस्य निघातस्य ‘यद्वृत्तान्नित्यम्। अ० ८।१।६६’ इति प्रतिषेधः। तदा (भानुम्) निजं प्रकाशम् (विश्वथा) बहुप्रकारेण। अत्र ‘प्रकारवचने थाल्। अ० ५।३।२३’ इति थाल् प्रत्ययः, न तु ‘प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल् छन्दसि। अ० ५।३।१११’ इत्यस्य प्रवृत्तिः, इवार्थाभावात्। (वि-अतनत्) वितनोति विस्तृणाति। तनु विस्तारे स्वादिः, वेदे भ्वादिरपि दृश्यते ॥ अथ द्वितीयः—अध्यात्मपरः। (अरुणप्सुः) आरोचमानरूपः इन्द्रः परमेश्वरः (यत्) यदा (दूरात्) व्यवहिताद् विप्रकृष्टाद् वा प्रदेशात्, पदार्थान् (इह इव सतः) अत्र समीप इव विद्यमानान् कुर्वन् (अशिश्वितत्) आरोचयति, योगिनो मानसं प्रकाशयति, तदा (भानुम्) भासमानं जीवात्मानम् (विश्वथा) सर्वथा (वि-अतनत्) योगैश्वर्यप्रापणेन विस्तारयति व्यापकज्ञानयुक्तं करोतीत्यर्थः ॥६॥ योगाभ्यासिनो जनस्य परमात्मप्रदत्तेन दिव्यालोकेन सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टानां पदार्थानां, दूरस्थानां ताराव्यूहानां, ध्रुवादिनक्षत्राणां च समीपस्थवस्तुवद् हस्तामलसाक्षात्कारो भवितुमर्हतीति योगदर्शने विभूतिपादे महर्षिः पतञ्जलिराह३ ॥ अत्र श्लेषालङ्कारः। ‘दूरादिहेव यत् सतः’ इत्यत्र चोत्प्रेक्षा ॥६॥
भावार्थः
आरोचमानरूपः सूर्यो यदा स्वप्रकाशं मङ्गलबुधबृहस्पतिचन्द्रादिषु ग्रहोपग्रहेषु प्रक्षिपति तदा तत्प्रकाशेन ते प्रकाशिता जायन्ते, प्रकाशश्चास्मच्चक्षुषोः प्रतिफलितः सन् दूरस्थानपि तान्, समीपवर्तिन इव दर्शयति। तथैव योगाभ्यासेन योगिनां मनःसु परमात्मनो दिव्यालोकः प्रतिफलितः सन् तेषु तां शक्तिं जनयति यया ते सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टानपि पदार्थान् साक्षादन्तिकस्थानिव पश्यन्ति ॥६॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।५।१ अश्विनौ देवते। ‘सतोऽरुणप्सु’ ‘विश्वथा’ इत्यत्र ‘सत्यरुणप्सु’ ‘विश्वधा’ इति पाठः। २. माधवभरतस्वामिसायणैः सर्वैरेवास्या ऋचो व्याख्याने उषसः प्रक्रम्य अश्विनोरपसंहृतम्। ऋग्वेदेऽस्या अश्विनौ देवते निर्दिष्टे, ‘सतः’ इत्यस्य स्थाने च ‘सती’ इति स्त्रीलिङ्गः पाठः। तत्र तु ‘दूरादपि इहेव सती अरुणप्सुः उषाः अशिश्विवत्’ इति व्याख्यानमुचितम्। अत्र तु इन्द्रदेवताकत्वाद् ऋचः तद्व्याख्यानं न समञ्जसमिति दिक्। ३. द्रष्टव्यम्—योगदर्शनम् ३।१६, १९, २५-२८, ३३, ४१। योगसिद्धीनां विषये महर्षिदयानन्दस्य विचाराः य० १७।६७, ७१ भाष्ये, पूनाप्रवचनस्य ११शप्रवचने च द्रष्टव्याः। तथा हि—‘यदा मनुष्यः स्वात्मना सह परमात्मानं युङ्क्ते तदा अणिमादयः सिद्धयः प्रादुर्भवन्ति। ततोऽव्याहतगत्याभीष्टानि स्थानानि गन्तुं शक्नोति नान्यथा’ इति य० १७।६७ भाष्ये भावार्थः। “योगी विभूति सिद्ध करता है, यह योगशास्त्र में लिखा है। अणिमा आदि विभूतियाँ हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग जो यह मानते हैं कि योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है।” इति च पूनाप्रवचनम्।
इंग्लिश (2)
Meaning
Just as the Sun from afar sheds his lustre on all objects, as if he were near, so does God spread from all sides His light of Justice.
Meaning
The bright red dawn from far off, which yet appears so close, wraps the world in crimson glory and then spreads it over with the light of the sun. (Rg. 8-5-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अरुणस्युः) અત્યંત તેજસ્વી રૂપવાળા ઇન્દ્ર-પરમાત્મા (दूरात्) નજરથી દૂર હોવાં છતાં (इह इव) અહીં સમીપમાં રહીને હૃદયમાં અથવા અન્તરાત્મામાં રહીને (यत्) જ્યારે (सतः) સત્પુરુષો - ઉપાસકોને (अशिश्वितत्) રંજિત બનાવી દે છે, ત્યારે (विश्वथा) સર્વ પ્રકારથી (भानुम्) જ્ઞાન પ્રકાશને (वि अतनत्) વિશેષ રૂપથી ફેલાવે છે - વધારે છે. (૬)
भावार्थ
ભાવાર્થ : સૂર્ય સમાન અત્યંત તેજસ્વી રૂપવાળા પરમાત્મા નજરથી દૂર હોવા છતાં પણ નજીકની સમાન હૃદયમાં અથવા અન્તરાત્મામાં જ્યારે સત્પુરુષો ઉપાસકોને રંજિત કરી દે છે, ત્યારે સર્વ પ્રકારથી જ્ઞાનપ્રકાશને વિશેષ રૂપથી ફેલાવી દે છે-વધારી દે છે. (૬)
उर्दू (1)
Mazmoon
عابد کی روح کو روشن کرو
Lafzi Maana
(اِودُورات ستہ ارُونپُسو) جیسے دُور سے آتی ہوئی اُوشا کی لالی (اِیہہ آششِوِتت) روئے زمین کو چمکا دیتی ہے۔ ویسے ہی پرمیشور! اُوشا کی کِرنوں کی طرح جب آپ کی روشنی دل میں بھر جاتی ہے، تب آپ اُپاسک کو پاکیزہ عقل کو دے (بھانُوم) گیان روُپی سورج کی روشنی کو (وِشویا وی آتنت) سب طرف پھیلا دیتے ہیں۔
Tashree
سُندر سُنہری کِرنوں والی چمکتی جیسے اُشا، بھگت کے ہِردے میں اپنی جوت دو ایسی جگا۔
मराठी (2)
भावार्थ
प्रकाशमान तेजस्वी सूर्य आपला प्रकाश मंगल, बुध, बृहस्पती, चंद्र इत्यादी ग्रहोपग्रहांवर प्रसृत करतो. तेव्हा त्याच्या प्रकाशाने ते प्रकाशित होतात व तो प्रकाश आमच्या नेत्रांवर प्रतिफलित होऊन दूर असलेल्या पदार्थांनाही जवळ स्थित असल्याप्रमाणे दाखवितो. त्याचप्रकारे योगाभ्यासाने योग्यांच्या मनात परमात्म्याचा दिव्य आलोक प्रतिबिंबित होऊन त्यांच्यामध्ये तो शक्ती उत्पन्न करतो, ज्यामुळे ते सूक्ष्म दूरस्थित पदार्थांनाही साक्षात् जवळ असल्याप्रमाणे पाहू शकतात. ॥६॥
विषय
सूर्यप्रकाशाने व अध्यात्म प्रकाशाने दूरस्थ पदार्थही समीपस्थ दिसतात -
शब्दार्थ
(प्रथम अर्थ) (खगोलपर) - (अरुणप्सुः) चमकदार रूप असणारा सूर्यरूप इन्द्र (य़त्) जेव्हा (दूरात्) खगोल प्रदेश आपल्या दूरवर्ती स्थानावरून मंगल, बुध, चंद्र आदी ग्रह उपग्रहांना अशा प्रकारे (अशिश्वतत्) प्रकाशित करतो की (इह इव सतः) जणू ते अगदी जवळ आहेत, तेव्हा (भानुम्) सूर्य आपल्या प्रकाशाला (विश्वधा) अनेक प्रकारे (विजतनत्) विस्तृत करतो आणि इतरही अनेक ग्रहांना प्रकाशाने उजळून टाकतो.)।। द्वितीय अर्थ - (अध्यात्मपर) (अरुणप्सुः) तेजस्वी रूपवान इन्द्र परमेश्वर (यत्) जेव्हा (दूरात्) दूरस्थ प्रदेशाहून वा मध्ये व्यवधान वा बाधा असतानाही पदार्थांना (इह इव सतः) जणू अगदी जवळ आहे अशा प्रकारे (अशिश्वितत्) योगी मनुष्याच्या मनाला प्रकाशित करतो, तेव्हा (भानुम्) भासमान जीवात्म्याला (विश्वथ) सर्व प्रकारे (वि अतनत्) योगेश्वर्य देऊन विस्तीर्ण अर्थात व्यापक ज्ञानवान करतो.।।६।। योगाभ्यासी मनुष्याला परमेश्वर जो दिव्य आलोक देतो, त्याद्वारे योगी सूक्ष्म वस्तूंचा, भिंतीआड असणारा पदार्थांचा वा दूरस्थ पदार्थांचा, त्याचप्रमाणे तारा मंडळ, ध्रुव आदी नक्षत्रांचा साक्षात्कार समीपस्थ असल्याप्रमाणे होतो. सर्व ग्रह- नक्षत्र त्याला हस्तामलकवत होतात, असा उल्लेख महर्षी पतंजली यांनी योगदर्शनाच्या विभूतिपाद अध्यायात केला आहे. योग सिद्धीविषयी स्वामी दयानंदानीने विचार व्यक्त केले आहेत, ते या ंत्राच्या भावार्थानंतर पाद टिप्पणी म्हणून लिहिले आहेत. वाचकांनी ते विचार तिथे वाचावेत.
भावार्थ
दीप्तिमान सूर्य जेव्हा आपला प्रकाश मंगल, बुध, बृहस्पती, चंद्र आदी ग्रह उपग्रहांवर फेकतो, तेव्हा ते त्या (संस्कृत भाषेतील - मराठी अऩुवाद) ।। संदर्भ पहा- योगदर्शनम् ३/ १६, १९, २५-२८, ३३, ४१. योगसिद्धीविषयी महर्षी दयानंद यांचे विचार - यजुर्वेद भाष्याच्या १७/ ६७, ७१ येथे तसेच पुणे - प्रवचनाच्या ११ व्या प्रवचनात पहावेत. ते विचार असे - ङ्गङ्घजेव्हा माणूस आपल्या आत्म्यास परमात्म्याशी संयुक्त करतो तेव्हा योगाच्या अणिमा आदी सिद्धी गरिमा महिमा, लधिमा, प्राप्ती, प्राकाम्य, ईशित्व, वशिर्बया आठ सिद्धी) उत्पन्न होतात (वा योगी व्यक्तीला साध्य होतात) या सिद्धी प्राप्त करून योगी अबाध वा निर्बाध गतीने आपल्या इच्छित स्थानापर्यंत जाऊ शकतो. (या सिद्धीशिवाय) असे कदापि शक्य नाही. (हा उतारा यजुर्वेद भाष्य १७/६७ च्या भावार्थातून) ङ्गङ्घयोगी मनुष्य विभूती सिद्ध करतो, असे योगशास्त्रात लिहिले आहे. अणिमा आदी विभूती आहेत. त्या योगी मनुष्याच्या चित्तात उत्पन्न होतात. सांसारिक जन जे असे मानतात की त्या विभूती योग्याच्या शरीरात उत्पन्न होतात, ते बरोबर नाही.फफ पुणे प्रवचन (११ वे). प्रकाशाने उजळून निघतात. तो प्रकाश आमच्या डोळ्यांवर प्रतिफलित होतो, तेव्हा आम्ही त्या दूरस्थ पदार्थांनाही जवळ असलेल्याप्रमाणे पाहू शकतो. त्याचप्रमाणे योगाभ्यासामुळे योगी मनुष्याच्या हृदयात परमात्म्याचा दिव्य प्रकाश आलोकित होतो आणि त्या प्रकाशामुळे योगी सूक्ष्म, आड असलेल्या व दूरस्थित पदार्थांना साक्षात समीपस्थ असल्याप्रमाणे पाहू लागतो.।। ६।।
विशेष
या मंत्रात श्लेष अलंकार आहे. ङ्गदूरादिहेवफ या शब्दामध्ये उत्प्रेक्षा अलंकार आहे.।। ६।।
तमिल (1)
Word Meaning
(தூரத்தில்) இருந்தும் இங்கு சமீபம் இருப்பது போல் சிகப்பான அருணன் ப்ரகாசமாகிறான். எல்லா பக்கங்களிலும் சோதியைப் பரப்புகிறான்.
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