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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 297
ऋषिः - मेध्यातिथिः काण्वः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
53
क꣡ ईं꣢ वेद सु꣣ते꣢꣫ सचा꣣ पि꣡ब꣢न्तं꣣ क꣡द्वयो꣢꣯ दधे । अ꣣यं꣡ यः पुरो꣢꣯ विभि꣣न꣡त्त्योज꣢꣯सा मन्दा꣣नः꣢ शि꣣प्र्य꣡न्ध꣢सः ॥२९७॥
स्वर सहित पद पाठकः꣢ । ई꣣म् । वेद । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯न्तम् । कत् । व꣡यः꣢꣯ । द꣣धे । अय꣢म् । यः । पु꣡रः꣢꣯ । वि꣣भिन꣡त्ति꣢ । वि꣣ । भिन꣡त्ति꣢ । ओ꣡ज꣢꣯सा । म꣣न्दानः꣢ । शि꣣प्री꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः ॥२९७॥
स्वर रहित मन्त्र
क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्वयो दधे । अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्र्यन्धसः ॥२९७॥
स्वर रहित पद पाठ
कः । ईम् । वेद । सुते । सचा । पिबन्तम् । कत् । वयः । दधे । अयम् । यः । पुरः । विभिनत्ति । वि । भिनत्ति । ओजसा । मन्दानः । शिप्री । अन्धसः ॥२९७॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 297
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 7;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 1; मन्त्र » 5
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 7;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि स्तुति किया हुआ जगदीश्वर क्या करता है।
पदार्थ
(सुते) उपासना-यज्ञ में (सचा) एक-साथ (पिबन्तम्) यजमान के श्रद्धारस का पान करते हुए (ईम्) इस इन्द्र परमेश्वर को (कः वेद) कौन जानता है? (कत्) कब वह (वयः) उपासक के जीवन को (दधे) सहारा दे देता है, इसे भी कौन जानता है? अर्थात् यदि कोई जानता है तो उपासक ही जानता या अनुभव करता है। कैसे परमेश्वर को? इसका उत्तर देते हैं—(अयम्) यह (यः) जो (शिप्री) प्रशस्त स्वरूपवाला परमेश्वर (अन्धसः) यजमान के श्रद्धारस से (मन्दानः) प्रसन्न होता हुआ (ओजसा) बलपूर्वक (पुरः) उसकी मनोभूमि में दृढ़ता के साथ जमी हुई काम-क्रोधादि असुरों की नगरियों को (विभिनत्ति) तोड़-फोड़ देता है ॥५॥
भावार्थ
परमेश्वर की उपासना का यही लाभ है कि वह उपासक के मन में सब शत्रुओं को पराजित कर सकनेवाले पुरुषार्थ को उत्पन्न करके उसे समरभूमि में विजयी बना देता है ॥५॥
पदार्थ
(सुते सचा पिबन्तम्) उपासक के निष्पन्न उपासनारस होने पर उपासनारस निष्पादक के साथ समकाल ही पीते हुए—स्वीकार करते हुए को (कः-ईं वेद) कौन ही ऐसे जानता है जैसे अन्तरात्मा में विराजमान हो उसका पान करता है—स्वीकार करता है (कत्-उ-वयः-दधे) फलरूप में किसी विलक्षण जीवन—ऊँचे जीवन को—अध्यात्म जीवन को धारण करता है (यः-अयम्) जो यह (शिप्री) विभुगतिमान् (अन्धसः-मन्दानः) आध्यानीय उपासनारस के पान से प्रसाद को प्राप्त हुआ-प्रीति करता हुआ (ओजसा) स्वात्मशक्ति से (पुरः-विभिनत्ति) मानस भूमियों-मन बुद्धि चित्त अहङ्कार “मन एव पुरः” [श॰ १०.३.५.७] गुणस्वरूपों से खोलता है—विकसित करता है।
भावार्थ
उपासक के निष्पन्न उपासनारस को उसके साथ समकाल में ही पान करते हुए—स्वीकार करते हुए परमात्मा को कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं केवल उपासक ही जान पाता है ऐसा कहा जाए तो कहा जावे कौन विलक्षण जीवन उसे धारण कर सकता है। वह विभुगतिमान् परमात्मा उपासनारस के पान से प्रसन्न हुआ अपने आत्मबल—आत्मशक्ति से उपासक के मन बुद्धि चित्त अहङ्कार को खोलता है—विकसित करता है॥५॥
विशेष
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से निरन्तर अतन गमन-प्रवेश करने वाला उपासक)॥<br>
विषय
केवलादि न बनने का महान् व्रत
पदार्थ
(कः) = कौन (इम्) = निश्चय से (वेद) = पूरा ज्ञान रखता है कि इस प्रकार धन का विनियोग सर्वोत्तम होगा, परन्तु इतना नियम प्रत्येक व्यक्ति बतला सकता है कि मैं केवलादि न बनूँगा। ऐसा नियम बनाकर (सुते) = इस उत्पन्न जगत् में (सत्रा) = मिलकर (पिबन्तम्) = पान करते हुए को (क-द्वयः) = ऐहलौकिक व पारलौकिक दोनों सुख (दधे) = धारण करता है। सदा मिलकर खाने के सिद्धान्त पर चलनेवाले का दोनों ही लोकों में कल्याण सिद्ध होता है। (अयम्) = यह मिलकर खानेवाला वह व्यक्ति है (य:) = जोकि (पुरः) = काम, क्रोध और लोभ की नगरियों को (विभनत्ति) = तोड़ डालता है। इन्हें तोड़कर ही 'त्रिपुरारि' के सदृश बनता है। यह व्यक्ति वह है जोकि (ओजसा मन्दानः)=ओज के कारण सदा ओजस्वी बनता है, और आज के कारण सदा प्रसन्न होता है। यह व्यक्ति वह है जोकि (अन्धसः) = सोम के द्वारा (शिप्री) = शिरस्त्राणवाला है, उस उत्कृष्ट ज्ञानवाला है जो उसकी रक्षा का कारण बनता है।
एवं, इस मन्त्र में केवलादि न बनने के निम्न लाभ दर्शाये गये हैं–१. यह उभयलोक को कल्याण प्राप्त करता है, २. तीनों असुर पुरियों का विध्वंस कर ‘काम, क्रोध, लोभ' से ऊपर उठता है, ३. ओजस्विता से सदा प्रसन्न मनवाला होता है और ४. सोमरक्षा के द्वारा उत्कृष्ट रक्षक-ज्ञान को प्राप्त करनेवाला होता है।
इन लाभों को देखकर इस मार्ग को अपनानेवाला ही बुद्धिमान् है–'मेधातिथि' है। यही इस मन्त्र का ऋषि है।
भावार्थ
मैं केवलादि बनकर 'केवलाघ' पाप न बन जाऊँ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( सुते ) = जीवनयज्ञ में ( सचा ) = इन्द्रियगण के एक साथ ( पिबन्तं ) = सोम का पान करते हुए आत्मा को ( कः इं वेद ) = कौन जाने ? और कौन जाने कि ( कद् वयो दधे ) = वह कितनी आयु धारण करता है । ( यः ) = जो आत्मा ( शिप्री ) = वेगवान्, अपनी कर्मगति से एक देह से देहान्तर में गमन करने हारा, ( अन्धसः मन्दानः ) = अन्न द्वारा हर्ष को प्राप्त होता हुआ ( ओजसा ) = अपने तेज से ( पुरः ) = अपने भोग भूमियों, देहों को ( वि भिनत्ति ) = तोड़ डालता है और मुक्त हो जाता है ।
देह में आत्मा इन्द्रियों के साथ रस भोगता है, परन्तु उसकी उम्र को कोई नहीं जानता। वह अपने कर्मगति से देहों में भ्रमण करता और अन्नरस को भोगता और ज्ञान से देहमुक्त हो जाता है ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - मेध्यातिथिः ।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - बृहती।
स्वरः - मध्यमः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ स्तुतो जगदीश्वरः किं करोतीत्याह।
पदार्थः
(सुते) उपासनायज्ञे (सचा) युगपत् (पिबन्तम्) यजमानस्य श्रद्धारसम् आस्वादयन्तम् (ईम्) एतम् इन्द्रम् परमेश्वरम् (कः वेद) को जानाति। (कत्) कदा, सः (वयः) उपासकस्य जीवनम्, (दधे) दधाति इत्यपि को वेद ? यदि कश्चिज्जानाति उपासक एव जानाति अनुभवति वा, नान्यः कश्चनेत्यर्थः। कीदृशम् इन्द्रम् इत्याह—(अयम्) एषः (यः शिप्री) सुमुखः प्रशस्तस्वरूपः इन्द्रः परमेश्वरः प्रशस्ते शिप्रे हनू नासिके वा यस्य सः, प्रशंसार्थे मत्वर्थे इनिः। शिप्राभ्यां मुखमुपलक्ष्यते। मुखेन च स्वरूपमभिप्रेतम्, निरवयवत्वात् परमेश्वरस्य। (अन्धसः) अन्धसा श्रद्धारूपेण सोमरसेन। तृतीयार्थे षष्ठी। (मन्दानः) मोदमानः सन्। मदि स्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु, शानच्, छान्दसो मुगागमनिषेधः। (ओजसा) बलेन (पुरः) तस्य मनोभूमौ दृढं बद्धाः कामक्रोधाद्यसुराणां नगरीः (विभिनत्ति) विदारयति ॥५॥
भावार्थः
परमेश्वरस्योपासनाया अयमेव लाभो यत् स उपासकस्य मनसि समस्तशत्रुपराजयसमर्थं पुरुषार्थमुत्पाद्य समराङ्गणे तं विजेतारं करोति ॥५॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ८।३३।७, साम० १९९६, अथ० २०।५३।१, २०।५७।११ सर्वत्र ऋषिः मेध्यातिथिः।
इंग्लिश (2)
Meaning
Who knows the soul, who enjoys happiness along with the organs, in this Yajna of life? Who knows. how long wilt he stay in the body? The strong soul, migrating from one body to the other, enjoying with his dignity, the happiness of knowledge, his food, breaks down the castles of mortal frame and attains to salvation.
Translator Comment
Who knows means no one knows.
Meaning
Who would for certain know Indra in this created world of beauty and glory, how much power and force he wields while he rules and sustains it, Indra who wears the helmet and breaks down the strongholds of negativities with his lustrous might, the lord who shares and enjoys the soma of his own creation? (Rg. 8-33-7)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (सुते सचा पिबन्तम्) ઉપાસક દ્વારા ઉપાસનારસ નિષ્પન્ન થઈને ઉપાસનારસને નિષ્પાદકની સાથે મળીને પાન કરતા-સ્વીકાર કરતા -(कः ईं वेद) કોણ એમ જાણે છે જેમ અન્તરાત્મામાં બિરાજમાન છે તે પાન કરે છે-સ્વીકાર કરે છે. (कत् उ वयः दधे) ફળ રૂપમાં કોઈ વિલક્ષણ જીવન-શ્રેષ્ઠ જીવનને અધ્યાત્મ જીવનને ધારણ કરે છે (यः अयम्) જે એ (शिप्री)વિભુ ગતિમાન (अन्धसः मन्दानः) આધ્યાનીય ઉપાસનારસના પાનથી પ્રસાદને પ્રાપ્ત થયેલ-પ્રીતિ કરતા (ओजसा) પોતાની શક્તિથી (पुरः विभिनत्ति) માનસ ભૂમિઓ-મન, બુદ્ધિ, ચિત્ત, અહંકારને ગુણ સ્વરૂપોથી ઉન્નત કરે છે-વિકસિત કરે છે. (૫)
भावार्थ
ભાવાર્થ : ઉપાસકના નિષ્પન્ન ઉપાસનારસને તેની સાથે સમકાલમાં જ પાન કરતા-સ્વીકાર કરતા પરમાત્માને કોણ જાણે છે ? અર્થાત્ કોઈ નહિ. માત્ર ઉપાસક જ જાણી શકે છે. એમ કહેવું હોય તો કહી શકાય. કોણ વિલક્ષણ જીવન તેને ધારણ કરી શકે છે ? તે વિભુ ગતિમાન પરમાત્મા ઉપાસનારસના પાન દ્વારા પ્રસન્ન થઈને પોતાના આત્મબળ-આત્મશક્તિથી ઉપાસકના મન, બુદ્ધિ, ચિત્ત અને અહંકારને ઉન્નત કરે છે વિકસિત કરે છે. (૫)
उर्दू (1)
Mazmoon
کون جانے؟
Lafzi Maana
(سُتے) بھگتی رس کے پیدا ہو جانے پر ہے پرمیشور! (سچا پبنتم) اُپاسک اور آپ مل کر آنند رس پیتے ہیں، (ایم کاہ وید) ایسے بھگوان کو کون جان سکتا ہے؟ (کت وَیہ ددھدے) عابد بھی کتنی عمر تک بھگتی کا رس پی اور پلا سکتا ہے، یہ بھی کون جانے؟ ہے پرمیشور! (ایم یہ مندانہ اوجسا پُرہ سبھبنتّی) وہ ہیں جو پرسن ہو کر اپنی طاقت سے شیطانی گڑھوں کو ایسے توڑ پھوڑ دیتے ہیں، جیسے کہ (سُوشپری اندھسہ پُرا) طاقت ور فوجی کمانڈر گیہوں سے بھرے دشمنوں کے قلعوں کو تحس نحس کر دیتا ہے۔
Tashree
کون جانے کتنی آیُو آپ بخشتے ہو یہاں؟ اپنے امرت کو پِلا خُورسند کرتے ہو یہاں۔
मराठी (2)
भावार्थ
परमेश्वराच्या उपासनेचा हाच लाभ आहे, की उपासकाच्या मनात सर्व शत्रूंना पराजित करू शकणारा पुरुषार्थ उत्पन्न करून त्याला युद्धात विजयी करतो. ॥५॥
विषय
स्तोत्याने स्तुती केल्यानंतर ईश्वर काम करतो -
शब्दार्थ
(सुते) उपासना- यज्ञात (सचा) एकत्र मिळून (पिबन्तम्) यजमानाच्या हृदयातील श्रद्धा- रस पीत असणाऱ्या (ईम्) त्या इंद्र परमेश्वराला (कः वेद) कोण जाणू शकतो ? तो (कत्) केव्हा (रयः) उपासकाच्या जीवनाला (दघे) आधार देईल, हे तरी कोण सांगू शकतो ? म्हणजे ते ईश्वरीय साह्य जर कोणी जाणत असेल तर केवळ उपासकच ते जाणू वा अनुभवू शकतो. कसा आहे तो परमेश्वर ? उत्तर असे की (अयम्) हा (यः) जो (शिप्री) प्रशस्त स्वरूपवान असून (अन्धसः) यजमानाच्या श्रद्धा रसाने (मन्दानः) प्रसन्न होत (ओजसा) आपल्या बळाने (पुरः) त्याच्या मनोभूमीमध्ये दृढतेने पाया धरलेल्या काम, क्रोध आदी असुरांच्या नगरींना (विभिनत्ति) नष्ट ध्वस्त करतो, तोच परमेश्वर आहे.।। ५।।
भावार्थ
परमेश्वराच्या उपासनेचा हाच लाभ आहे की तो उपासकाच्या मनात सर्व शत्रू, विघ्न- बाधादींना पराजित करण्यास समर्थ असी पुरुषार्थ वृत्ती वा मनोबल तयार करतो आणि उपासकाला बाह्य व आंतरिक युद्धामध्ये विजयी करतो. ।। ५।।
तमिल (1)
Word Meaning
சோமனில் சேர்ந்து பருகிக்கொண்டிருக்கும் (இந்திரன்) எத்தனை வன்மையைப் பெருகிறான் என எவர் அறிவதில்லை.சோமனில் திருப்தியாக்கிக்கொண்டு பலத்தால் கோட்டைகளை இடிக்கும் (சுந்தரவதனமுடனான) தேவர் இவர்தான்.
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