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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 32
    ऋषिः - मेधातिथिः काण्वः देवता - अग्निः छन्दः - गायत्री स्वरः - षड्जः काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
    73

    क꣣वि꣢म꣣ग्नि꣡मुप꣢꣯ स्तुहि स꣣त्य꣡ध꣢र्माणमध्व꣣रे꣢ । दे꣣व꣡म꣢मीव꣣चा꣡त꣢नम् ॥३२॥

    स्वर सहित पद पाठ

    क꣣वि꣢म् । अ꣣ग्नि꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣हि । स꣣त्य꣡ध꣢र्माणम् । स꣣त्य꣢ । ध꣣र्माणम् । अध्वरे꣢ । दे꣣व꣢म् । अ꣣मीवचा꣡त꣢नम् । अ꣣मीव । चा꣡त꣢꣯नम् ॥३२॥


    स्वर रहित मन्त्र

    कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे । देवममीवचातनम् ॥३२॥


    स्वर रहित पद पाठ

    कविम् । अग्निम् । उप । स्तुहि । सत्यधर्माणम् । सत्य । धर्माणम् । अध्वरे । देवम् । अमीवचातनम् । अमीव । चातनम् ॥३२॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 32
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 3; मन्त्र » 12
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 3;
    Acknowledgment

    हिन्दी (5)

    विषय

    भौतिक अग्नि के समान परमेश्वर के भी गुण सबके जानने योग्य हैं, यह कहते हैं।

    पदार्थ

    प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) हिंसादिरहित जीवनयज्ञ में (कविम्) वेदकाव्य के कवि एवं क्रान्तदर्शी, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) सुख आदि के दाता, (अमीवचातनम्) अज्ञान आदि तथा व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य आदि योगविघ्नकारी मानस रोगों को विनष्ट करनेवाले (अग्निम्) तेजस्वी परमेश्वर की (उप स्तुहि) उपासना कर ॥ द्वितीय—भौतिक अग्नि के पक्ष में। हे मनुष्य, तू (अध्वरे) शिल्पयज्ञ में (कविम्) गतिमान्, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण-कर्म-स्वभाववाले, (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक और व्यवहार-साधक, (अमीवचातनम्) ज्वरादि रोगों को नष्ट करनेवाले, (अग्निम्) आग, बिजली और सूर्य के (उप स्तुहि) गुणों का वर्णन कर ॥१२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१२॥

    भावार्थ

    मनुष्यों को शिल्पविद्या की सिद्धि के लिए जैसे भौतिक आग, बिजली और सूर्य का गुणज्ञानपूर्वक सेवन करना चाहिए, वैसे ही धर्म-प्राप्ति के लिए परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का ज्ञान, वर्णन और अनुकरण करना चाहिए ॥१२॥

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    पदार्थ

    (अध्वरे) अध्यात्म यज्ञ में (कविं सत्यधर्माणम्) क्रान्तदर्शीसर्वज्ञ अविनश्वर नियमवाले—नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव वाले (अमीवचातनम्-अग्निदेवम्) मानस रोग विनाशक परमात्मदेव की (उपस्तुहि) उपासना कर।

    भावार्थ

    परमात्मा के कर्तृत्व नियन्तृत्व कर्मफलदातृत्व आदि नियम अटल हैं, वह नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त—स्वभाव और अनन्तप्रकाश-ज्ञानानन्दस्वरूप है, उसकी उपासना करना, उसे अध्यात्म यज्ञ का देव बनाना, उपासक के समस्त आन्तरिक रोगों के विनाश का हेतु है॥१२॥

    विशेष

    ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से परमात्मा में अतन गमनशील उपासक)॥<br>

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    विषय

    चार रूपों का स्मरण

    पदार्थ

    हे जीव! (अ-ध्वरे)= इस हिंसारहित जीवन-यज्ञ में (अग्निम्)= उस आगे ले-चलनेवाले प्रभु की (उपस्तुहि)= समीप से स्तुति कर । जीवन में हमसे किसी की हिंसा न हो। हम यथासम्भव औरों का कल्याण ही करें। इस स्थिति में हमारे लिए वे प्रभु अवश्य अग्नि-आगे ले-चलनेवाले होंगे। वस्तुतः अहिंसा का मार्ग ही उन्नति का मार्ग है।

    इस जीवन में हम उस प्रभु की समीप से स्तुति करें। उसे सदा समीप समझते हुए उत्तम गुणों में प्रीतिवाले बनें। ये उत्तम गुण इस मन्त्र के चार शब्दों से सूचित हो रहे हैं[क] (अमीवचातनम्) = नीरोगता, [ख] (देवम्) = दीपन, प्रकाश, [ग] (सत्यधर्माणम्) = सत्य का धारण, [घ] (कविम् )= क्रान्तदर्शी होना
    अन्नमयकोश के दृष्टिकोण से प्रभु को हम अमीवचातनम् के रूप में स्मरण करें। वे रोगों का नाश करनेवाले हैं [अमीव-रोग, चातन=नाशक] । प्रभु - स्मरण से मानव-जीवन भोगप्रधान नहीं बनता परिणामतः रोग भी नहीं होते।

    प्राणमयकोश के दृष्टिकोण से वे प्रभु 'देव' हैं [देवो द्योतनात्] सब प्राणों - इन्द्रियों को [प्राणा: वाव इन्द्रियाणि] वे द्योतित करनेवाले हैं। ज्ञान की साधनभूत ये इन्द्रियाँ ज्योतिर्मय हैं। इन्हें यह ज्योति प्रभु ने ही प्राप्त कराई है। प्रभु का स्मरण करनेवाले की इन्द्रिय-शक्तियाँ क्षीण नहीं होती।

    मनोमयकोश के विचार से वे प्रभु सत्यधर्मा हैं। सत्य के द्वारा प्रभु ने मन की पवित्रता की व्यवस्था की है। सत्य मन को राग-द्वेषादि मलों से दूर रखता है। एक स्तोता को सत्य के द्वारा मन का नैर्मल्य सम्पादन करना है।

    विज्ञानमयकोश के दृष्टिकोण से मन्त्र में प्रभु को कवि कहा गया है। वे क्रान्तदर्शी हैं। स्तोता को भी क्रान्तदर्शी बनना है। इस मार्ग पर चलना ही बुद्धिमत्ता है। प्रभुकृपा होगी तो हम भी बुद्धिमान् बनेंगे और इस मन्त्र के ऋषि ‘मेधातिथि' होंगे। 

    भावार्थ

    प्रभु रोगों से दूर, ज्योतिर्मय, सत्यस्वरूप व ज्ञान - धन हैं। स्तोता को भी ऐसा ही बनना है। स्तुति का तो लाभ ही उस प्रभु के गुणों में प्रीति है।

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    पदार्थ

    शब्दार्थ = ( कविम् ) = सर्वज्ञ  ( सत्यधर्माणम् ) = सत्यधर्मी अर्थात् जिनके नियम सदा अटल हैं  ( देवमू ) = सदा प्रकाशस्वरूप और सब सुखों के देनेवाले  ( अमीवचातनम् ) = रोगों के विनाश करनेवाले  ( अग्निम् ) = तेजोमय परमात्मा की  ( अध्वरे ) = ब्रह्मयज्ञादि में  ( उपस्तुहि ) = उपासना और स्तुति कर ।

    भावार्थ

    भावार्थ = हे प्रभो ! जिस आप जगत्पति के नियम से बँधे हुए, पृथिवी, सूर्य्य, चन्द्र, मंगल, शुक्र, शनि, बृहस्पति आदि ग्रह, उपग्रह अपने-अपने नियम में स्थित होकर अपनी-अपनी गति से सदा घूम रहे हैं। आप जगन्नियन्ता के नियम को तोड़ने का किसी का भी सामर्थ्य नहीं। ऐसे अटल नियमवाले सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, स्वप्रकाश, सुखदायक, रोग, शोकविनाशक, आप परमात्मा की, मुमुक्षु, पुरुष श्रद्धा भक्ति से प्रेम में मग्न होकर प्रार्थना और उपासना सदा किया करें, जिससे उनका कल्याण हो ।

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    विषय

    परमेश्वर की स्तुति

    भावार्थ

    भा०  = हे पुरुष ! तू उस ( कविम् ) = क्रान्तदर्शी, मेधावी, सर्वज्ञ  ( अध्वरे सत्यधर्माणं१  ) = यज्ञ में, जगत् में सत्य धर्मों को धारण करने वाले ( देवं  ) = दिव्यगुणों से युक्त दाता ( अमीवचातनं ) = दुःखदायी रोगों का नाश करने वाले ( अग्निम्  ) = प्रकाशस्वरूप परमेश्वर की ( उपस्तुहि  ) = दत्तचित्त होकर स्तुति अर्थात् गुण वर्णन कर। 

     

    टिप्पणी

    १. सत्यकर्माणं । मा० वि० ।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषि: - मेधातिथि: । 
    छन्दः - गायत्री। 
     

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ भौतिकाग्निवत् परमेश्वरस्यापि गुणाः सर्वैर्वेदितव्या इत्याह।

    पदार्थः

    प्रथमः—परमेश्वरपरः। हे मनुष्य, त्वम् (अध्वरे) हिंसादिरहिते जीवनयज्ञे (कविम्) वेदकाव्यस्य कर्तारम्, क्रान्तदर्शिनम्, (सत्यधर्माणम्) सत्या अवितथा धर्मा गुणकर्मस्वभावा यस्य तम्, (देवम्) सुखादीनां दातारम्, (अमीवचातनम्) अमीवान् अज्ञानादीन् व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्यादीन् वा योगविघ्नकरान् मानसान् रोगान् चातयति हिनस्ति यस्तम्।२ अम रोगे, बाहुलकादौणादिक ईवप्रत्ययः। चातयतिर्नाशने, निरु० ६।३०। (अग्निम्) तेजस्विनं परमेश्वरम् (उप स्तुहि) उपास्स्व ॥ अथ द्वितीयः—भौतिकाग्निपरः। हे मनुष्य, त्वम् (अध्वरे) शिल्पयज्ञे (कविम्) गतिमन्तम्, (सत्यधर्माणम्) सत्यगुणकर्मस्वभावम्, (देवम्) प्रकाशमानं प्रकाशकं व्यवहारसाधकं च, (अमीवचातनम्) ज्वरादिरोगनाशकम् (अग्निम्) पार्थिवाग्निं विद्युतं सूर्यं वा (उप स्तुहि) गुणैर्वर्णय ॥१२॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥१२॥

    भावार्थः

    मनुष्यैः शिल्पविद्यासिद्धये यथा भौतिकोऽग्निर्विद्युत् सूर्यो वा गुणज्ञानपूर्वकं सेवनीयस्तथा धर्मप्राप्तये परमेश्वरस्य गुणकर्मस्वभावा ज्ञेया वर्णनीया अनुकरणीयाश्च ॥१२॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० १।१२।७। ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमं परमेश्वरविषये भौतिकाग्निविषये च व्याख्यातवान्। २. अमीवान् अज्ञानादीन् ज्वरादींश्च रोगान् चातयति हिनस्ति तम् इति ऋ० १।१२।७ भाष्ये द०।

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    इंग्लिश (4)

    Meaning

    O man, in this Yajna of life, praise God, who is Omniscient, Whose holy laws are true. Who is endowed with divine qualities and is Healer of physical and spiritual diseases.

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    Meaning

    In the holy acts of yajna, light, serve and adore Agni, brilliant creator of new things of beauty, prosperity and joy, illuminator and observer of the eternal laws, generous giver, and destroyer of evil and disease. (Rg. 1-12-7)

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    Translation

    O man, praise Omniscient Lord,

    Whose Laws in world are eternal.

    Who is Giver of light and life

    Destroyer of diseases, physical mental.

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    Translation

    May we worship, the all-wise, the all-knowing and the supreme sustainer of eternal laws. He is the one who destroys evils, apparent or concealed, through His supreme goodness. (Cf. Rv I.12.7)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अध्वरे) અધ્યાત્મયજ્ઞમાં (कविं सत्यधर्माणम्) ક્રાન્તદર્શી, સર્વજ્ઞ, અવિનાશી નિયમયુક્તનિત્ય શુદ્ધબુદ્ધમુક્ત સ્વભાવયુક્ત (अमीवचा तनम् अग्निदेवम्)  માનવરોગ વિનાશક પરમાત્મા દેવની (उपस्तुहि) ઉપાસના કર. (૧૨)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્માનું કર્તાપણું, નિયંતાપણું અને કર્મફળદાતાપણું વગેરેના નિયમો અટલ છે, તે નિત્ય શુદ્ધ બુદ્ધ મુક્ત-સ્વભાવ તથા અનંત પ્રકાશજ્ઞાન આનંદસ્વરૂપ છે, તેની ઉપાસના કરવી, તેને અધ્યાત્મયજ્ઞનો દેવ બનાવવો, તે ઉપાસકના સમસ્ત આન્તરિક રોગોના વિનાશનું કારણ છે-અર્થાત્ તેનો વિનાશ કરનાર છે. (૧૨)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    جب ذرا گردن جُھکائی دیکھ لی

    Lafzi Maana

    پربھُو کے گُن گانے والے پیارے آتما! (ادھورے) روزمرّہ دُنیا میں ہونے والے سب کے لئے زندگی بخش سُکھ دائیک ہنسا رہت برہم یگیہ میں تُو بھی اپنا ہاتھ بٹاتے ارتھات کسی کو دُکھ دیتے ہوئے سب سے پیار اور سب کا اُپکار کرتے ہوئے (اگنِم) تیجسوی پرماتما کی ا(اُپستُوہی) یہ سمجھتے ہوئے کہ بھگوان میرے سب سے نکٹ ہیں اور میں اُن میں رم رہا ہوں، بڑی شردھا اور عقیدت سے اُپاسنا (عبادت) کر۔ وہ پرمیشور (کوی) وید منتروں کا گان کرنے والا آدی کوی ابتدائے آفرینش میں پہلا شاعر سرتاج الشعرا سب کچھ جاننے اور دیکھنے والا، جس سے وہ سب کو ٹھیک انصاف دے سکے .
    (ازلی ابدی قواعد، قوانین الہٰی) پُرانے اور ہمیشہ سے چلے آ رہے اور چلتے جائیں گے (دیوم) سب کا داتا (امیو چاتنم) اوِدّیا آدی دوش اور روگوں کے وِناش کرنے والے بھگوان کے مندرجہ صفات کو اپنے عمل میں لاتا ہوا یہ سمجھ کر اُس کی پُوجا میں بیٹھ کہ:
    دِل کے آئینے میں ہے تصویرِ یار،
    جب ذرا گردن جُھکائی دیکھ لی۔

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    बंगाली (1)

    পদার্থ

    কবিমগ্নিমুপস্তুহি সত্যধর্মাণমধ্বরে।

    দেবমমীবচাতনম্।।১১।।

    (সাম ৩২)

    পদার্থঃ (কবিম্) সর্বজ্ঞ, (সত্য ধর্মাণম্) সত্যধর্মী অর্থাৎ যাঁর নিয়ম সর্বদা অটল থাকে, (দেবম্) সদা প্রকাশস্বরূপ এবং সর্বপ্রকার সুখ দানকারী, (অমীবচাতনম্) রোগসমূহ বিনাশকারী, (অগ্নিম্) তেজোময় পরমাত্মাকে (অধ্বরে) ব্রহ্মযজ্ঞাদিতে (উপস্তুহি ) উপাসনা এবং স্তুতি করো। 

     

    ভাবার্থ

    ভাবার্থঃ হে পরমেশ্বর!  তুমি এই জগতের পতি এবং তুমিই এই জগৎকে নির্দিষ্ট নিয়ম শৃঙ্খলায় বেধে রেখেছো। পৃথিবী, সূর্য, চন্দ্র, মঙ্গল, শুক্র, শনি, বৃহস্পতিসহ সকল গ্রহ-উপগ্রহ সমূহকে নিজ নিজ নিয়মে এমন ভাবে স্থিত করে রেখেছ যে, তারা নিজ নিজ গতি দ্বারা সর্বদা নিজ কক্ষপথে ঘূর্ণায়মান রয়েছে। তোমার এই জগৎ নিয়ন্ত্রক নিয়ম-শৃঙ্খলা ভাঙার সাধ্য কারও নেই। এরূপ অটল নিয়মী, সর্বজ্ঞ, সর্বশক্তিমান, স্বপ্রকাশ, সুখদায়ক, রোগ শোক বিনাশক তোমাকে মুমুক্ষু, শ্রদ্ধাশীল, প্রেমময় ভক্তগণ মগ্ন হয়ে সর্বদা প্রার্থনা এবং উপাসনা করে থাকে, যার দ্বারা তাদের পরম কল্যাণ হয়।।১১।।

     

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    माणसांनी शिल्पविद्येच्या सिद्धीसाठी जसे भौतिक अग्नी, वीज व सूर्य यांचे गुण ज्ञानपूर्वक ग्रहण केले पाहिजेत, तसेच धर्मप्राप्तीसाठी परमेश्वराच्या गुण-कर्म-स्वभावाचे ज्ञान, वर्णन व अनुकरण केले पाहिजे ॥१२॥

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    विषय

    सर्वांनी अग्नीचे गुण जाणावेत, तद्वत ईश्वराचे गुणदेखील जाणले पाहिजेत, हे सांगतात.

    शब्दार्थ

    प्रथम अर्थ (परमेश्वरपरक) हे मनुष्य, तू (अध्वरे) हिंसा आदिरहीत जीवन यज्ञात (कविम्) वेदकाव्य रचणाऱ्या कवीची क्रान्तिदर्शी आणि (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण, कर्म, स्वभाव असणाऱ्या (देवम्) सूख प्रदाता परमेश्वराची उपासना कर. (अमीववातनम्) अज्ञान आदीचे निवारक, वकाधी, सत्यज, संशय, प्रमाद, आलस्य आदी जे योगाभ्यासात विघ्न निर्माण करणारे मानसिक रोग आहेत, त्यांना नष्ट करणाऱ्या (अग्निम्) तेजस्वी परमेशाची (उपस्तुहि) उपासना कर ।। द्वितीय अर्थ : (भौतिक अग्नीपरक) हे मनुष्या, तू (अध्वरे) शिल्पयज्ञामध्ये (कविम्) गतिमान, (सत्यधर्माणम्) सत्य गुण, कर्म, स्वभाव असलेल्या (देवम्) प्रकाशमान, प्रकाशक आणि कार्यसाधक (अमीवनातनम्) तसेच ज्वर आदी रोगांना नाश करणाऱ्या (अग्निम्) अग्नी, विद्युत आणि सूर्य यांच्या (उप, स्तुहि) गुणांचे वर्णन कर. (आणि तंत्र, यंत्र विज्ञानात यांचा प्रयोग कर.) ।।१२।।

    भावार्थ

    मनुष्यांनी जसे शिल्प विद्येच्या तंत्र शास्त्र आदीच्या सिद्धीकरीता भौतिक अग्नी, विद्युत आणि सूर्याच्या गुणांचा भरपूर उपयोग केला पाहिजे. तद्वत मनुष्यांनी धर्मप्राप्तीकरीता परमेश्वराच्या गुण, कर्म स्वभावाचे ज्ञान प्राप्त केले पाहिजे. आणि त्याचे वर्णन व अनुकरणही केले पाहिजे. ।।१२।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    யக்ஞத்திலே, சத்திய செயலுடனான கவியான திவ்யனான சத்துருக்களை துவம்சஞ் செய்பவனான, (அக்னியைத்) [1]துதிசெய்யவும்.

    FootNotes

    [1]. துதிசெய்யவும் - அறிவு செயல்களை நாடவும்

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