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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 331
ऋषिः - गौरिवीतिः शाक्त्यः
देवता - इन्द्रः
छन्दः - त्रिष्टुप्
स्वरः - धैवतः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
53
च꣣क्रं꣡ यद꣢꣯स्या꣣प्स्वा꣡ निष꣢꣯त्तमु꣣तो꣡ तद꣢꣯स्मै꣣ म꣡ध्विच्च꣢꣯च्छद्यात् । पृ꣣थिव्या꣡मति꣢꣯षितं꣣ य꣢꣫दूधः꣣ प꣢यो꣣ गो꣡ष्वद꣢꣯धा꣣ ओ꣡ष꣢धीषु ॥३३१॥
स्वर सहित पद पाठच꣣क्र꣢म् । यत् । अ꣣स्या । अप्सु꣢ । आ । नि꣡ष꣢꣯त्तम् । नि । स꣣त्तम्। उत । उ । तत् । अ꣣स्मै । म꣡धु꣢꣯ । इत् । च꣣च्छद्यात् । पृथिव्या꣢म् । अ꣡ति꣢꣯षितम् । अ꣡ति꣢꣯ । सि꣣तम् । य꣢त् । ऊधरि꣡ति꣢ । प꣡यः꣢꣯ । गो꣡षु꣢꣯ । अ꣡द꣢꣯धाः । ओ꣡ष꣢꣯धीषु । ओ꣡ष꣢꣯ । धी꣣षु ॥३३१॥
स्वर रहित मन्त्र
चक्रं यदस्याप्स्वा निषत्तमुतो तदस्मै मध्विच्चच्छद्यात् । पृथिव्यामतिषितं यदूधः पयो गोष्वदधा ओषधीषु ॥३३१॥
स्वर रहित पद पाठ
चक्रम् । यत् । अस्या । अप्सु । आ । निषत्तम् । नि । सत्तम्। उत । उ । तत् । अस्मै । मधु । इत् । चच्छद्यात् । पृथिव्याम् । अतिषितम् । अति । सितम् । यत् । ऊधरिति । पयः । गोषु । अदधाः । ओषधीषु । ओष । धीषु ॥३३१॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 331
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 4; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 10;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 1; दशतिः » 4; मन्त्र » 9
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 3; खण्ड » 10;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र में जलों में निहित चक्र का वर्णन है।
पदार्थ
(अप्सु) जलों में (अस्य) इस इन्द्र परमात्मा का अर्थात् उससे रचित (यत्) जो (चक्रम्) ऊपर चढ़ना और नीचे उतरना रूपी चक्र (आ निषत्तम्) स्थित है, (उत उ तत्) वह (अस्मै) इस संसार के लिए (मधु इत्) मधु को ही (चच्छद्यात्) प्रदान करता है। (यत्) जो (ऊधः) अन्तरिक्षरूपी गाय के ऊधस् के समान विद्यमान बादल (पृथिव्याम्) भूमि पर (अतिषितम्) वर्षा की धारों के रूप में छूटता है, उससे हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (गोषु) गायों में, और (ओषधीषु) ओषधियों में (पयः) क्रम से दूध और रस को (अदधाः) निहित करते हो ॥ इस जल के चक्र को अन्यत्र वेद में इस रूप में वर्णित किया गया है—यह जल समानरूप से दिनों में कभी ऊपर जाता है और कभी नीचे आता है। बादल बरसकर भूमि को तृप्त करते हैं, और अग्नियाँ जल को भाप बनाकर आकाश को तृप्त करती हैं’’ ऋ० १।१६४।५१ ॥९॥
भावार्थ
पृथिवी के नदी, नद, समुद्र आदियों से पानी भाप बनकर आकाश में जाता है, वहाँ बादल के आकार में परिणत होकर वर्षा द्वारा फिर भूमण्डल पर आ जाता है। वही निर्मल जल गायों में दूध रूप में और वनस्पतियों में रस-रूप में बदल जाता है। परमेश्वर जलों में इस चक्र को पैदा कर सर्वत्र मधु बरसाता है, इसके लिए उसे सबको धन्यवाद देना चाहिए ॥९॥ इस दशति में इन्द्र द्वारा कृष्ण और वृत्र के वध तथा द्यावापृथिवी आदि के जन्म का वर्णन होने से, इन्द्र का आह्वान होने से, और उसके द्वारा जलों में निहित चक्र का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्वदशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में दशम खण्ड समाप्त ॥
पदार्थ
(अस्य) इस परमात्मा का (यत्-चक्रम्) जो सृष्टिक्रम चक्र अर्थात् उत्पत्ति और जीवों के कर्मफल प्रदानरूप (अप्सु-आनिषत्तम्) व्याप्त परमाणुओं में समन्तरूप निगूढ़ हो चल रहा है (उत-उ) और भी (अस्मै) इस चक्र के लिये (मधु-इत्-चच्छद्यात्) प्राण को निहित किया है “प्राणो वै मधु” [श॰ १४.१.३.३०] (पृथिव्याम्) वह पृथिवी पर प्रथनशील सृष्टि में तथा प्रत्येक पार्थिव लोक में छोड़ दिया पुनः उससे (गोषु यत्-ऊधः) गौ आदि पशुओं में ऊधस्य—मधुररस दूध (ओषधीषु पयः) ओषधियों में रस धारण करता है।
भावार्थ
परमात्मा ने सृष्टिक्रमचक्र परमाणुओं में चलाया उसके लिये प्राण सम्यक् स्थिर किया, वह प्राण प्रथनशील सृष्टि में प्रथनशील लोकमात्र में छोड़ा, पुनः गौ आदि पशुओं में दूध और ओषधियों में अन्नरस मानवों के लिये धारण कराया, परमाणुओं में गतिप्रद विश्वप्राण और जीवों के लिये ओषधियों में जीवनप्राण परमात्मा ने धारण कराया, मानव के निर्वाहार्थ गौ आदि से दूध लेने और ओषधियों से अन्नरस लेने का विधान किया, अध्यात्म प्राण अध्यात्म जीवन धारण करने के लिये उपासक उस ऐसे प्राणदाता की उपासना करे॥९॥
विशेष
ऋषिः—गौरिवीतिः (सुन्दर वीत तृप्ति का साधनरस जिसके पास हो वह अध्यात्म रसवान्)॥<br>
विषय
यज्ञचक्र-इष्टकामधुक् हो
पदार्थ
(यत्) = जो (अस्य) = इस जीव का [प्रजापति से सृष्टि के प्रारम्भ में दिया हुआ] (चक्रम्) = यज्ञ चक्र है, वह (अप्सु) = कर्मों में (आ) = सर्वथा (निषत्तम्) = स्थित है, आश्रित है। ('यज्ञ कर्मसमुद्भवः') = यज्ञ कर्म से ही तो होनेवाला है। कोई भी यज्ञ कर्म के बिना सम्भव नहीं। (अस्मै) = इस क्रियाशील के लिए (तत्) = यह यज्ञ-चक्र (उत उ) = अब निश्चय से (मधु इत्) = माधुर्य को ही (चच्छद्यात्) = खूब चाहे अर्थात् इस यज्ञ से उसकी सब इच्छाएँ पूर्ण होकर उसका जीवन माधुर्य से परिपूर्ण हो। यज्ञमय जीवनवाले को मोक्ष तो प्राप्त होता ही है, उसका यह लोक भी अत्यन्त मधुर बनता है। ‘इस लोक में उसे क्या-क्या प्राप्त होता है?' इस प्रश्न का उत्तर मन्त्र के उत्तरार्ध में इस रूप में दिया है कि
१. (पृथिव्याम्) = इस पृथिवी पर (अतिषितम्) = [अति=पूजायाम्, सितम्- बन्धुत्व] = उत्तम बन्धनों [सम्बन्धों], बन्धु–बान्धवोंवाला (यत्) = जो (ऊध:) = [The apartment where the friends are invited] सुरक्षित घर है तथा २. (गोषुपय:) = गौवों में जो दूध है और ३. (ओषधीषु पयः) = औषधियों में जो रस है ये तीन वस्तुएँ (अदधा:) = इसका धारण करती हैं। दूसरे शब्दों में इसे मित्रों और बन्धुओं से भरा घर प्राप्त होता है, इसे गौवों के दूध की कमी नहीं होती और इसके घर में औषधियों का रस सदा सुलभ रहता है। संक्षेप में, मित्र हैं और उत्तमोत्तम खानपान के पदार्थ हैं और इस प्रकार घर एक छोटा-सा स्वर्ग बना हुआ है। संसार में बन्धु शून्यता व मित्रों का अभाव अत्यन्त चुभनेवाला होता है। और परिवार भरपूर हो तो निर्धनता एक अभिशाप के समान प्रतीत होती है। परन्तु जहाँ मित्र हैं- वहाँ तो स्वर्ग ही बन जाता यज्ञ-चक्र का प्रवर्त्तक अपने मित्रों के साथ 'गोदुग्ध व ओषधियों के मधुर रसों' का सेवन करता हुआ ‘गौर-वीति:' उज्ज्वल, शुभ्र सात्त्विक भोजन से शान्त प्रकृतिवाला होने के कारण-वासनाओं से दूर रहता हुआ शाक्तय-शक्ति-सम्पन्न है।
भावार्थ
यज्ञचक्र को चलाते हुए हम अपनी सब मधुर इच्छाओं को प्राप्त करें।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = ( अस्य ) = इस परमेश्वर का ( यद् ) = जो ( चक्रं ) = सृष्टिक्रम ( अप्सु ) = प्रजाओं में ( आनिषत्तम् ) = विद्यमान है। ( उत उ ) = और ( अस्मै ) = इस सृष्टिचक्र के लिये ( मधु इत् ) = विशेष मधुर, अन्नादि जीवनरस को ही ( चच्छद्यात् ) = गुप्तरूप से रखता है और ( यद् ) = जो ( ऊधः ) = ऊपर उठा हुआ रस का भण्डार, समुद्र, मेघ और पर्वत ( पृथिव्यां ) = इस पृथिवी पर ( अति-सितं ) = खूब बलपूर्वक बंधा हुआ है उससे ही वह । ( गोषु ) = गौऔं में और ( ओषधीषु ) = ओषधियों में ( पय:) = पान करने योग्य रसको ( अदधा: ) = आधान करता है ।
अन्न से प्राणिगण, मेघों से अन्न, यज्ञ से मेघ, कर्म से यज्ञ,ब्रह्म से कर्म, अक्षर से ब्रह्म, ऐसा 'चक्र' है, देखो ( गी० अ० ३ । १४, १५ )
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - गौरिवीतिः।
देवता - इन्द्रः।
छन्दः - त्रिपदा विराट् त्रिष्टुभ् ।
स्वरः - धैवतः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथाप्सु निहितं चक्रं वर्णयति।
पदार्थः
(अप्सु) उदकेषु (अस्य) इन्द्रस्य परमात्मनः, तत्कर्तृकमित्यर्थः (यत् चक्रम्) आरोहणावरोहणरूपं चक्रम् (आ निषत्तम्) आनिषण्णं विद्यते। नि पूर्वात् षद्लृ धातोर्निष्ठायां ‘नसत्तनिषत्तानुत्त०। अ० ८।२।६१’ इति नत्वाभावो निपात्यते। (उत उ तत्) तत् खलु (अस्मै) एतस्मै लोकाय (मधु इत्) मधु एव, अमृतमेव (चच्छद्यात्) आच्छादयति, प्रददातीत्यर्थः। छद संवरणे चुरादिः, ‘बहुलं छन्दसि। अ० २।४।७६’ इति शपः श्लुः। लडर्थे लिङ्। तदेव स्पष्टयति। (यत् ऊधः) अन्तरिक्षरूपाया गोः ऊधः इव वर्तमानो मेघः (पृथिव्याम्) भूमौ (अतिषितम्) वृष्टिधारासु विमुक्तं भवति। स्यतिरुपसृष्टो विमोचने। निरु० १।१५।, तेन हे परमात्मन् ! त्वम् (गोषु) धेनुषु, (ओषधीषु) वृक्षवनस्पत्यादिषु च (पयः) क्रमशः दुग्धं रसं च (अदधाः) दधासि ॥ अप्सु निहितं चक्रमेवान्यत्र श्रुतिरेवं वर्णयति—“स॒मा॒नमे॒तदु॑द॒कमुच्चैत्यव॒ चाह॑भिः। भूमिं॑ प॒र्जन्या॒ जिन्व॑न्ति॒ दिवं॑ जिन्वन्त्य॒ग्नयः॑।” इति ऋ० १।१६४।५१ ॥९॥
भावार्थः
पृथिव्या नदीनदसमुद्रादिभ्य उदकं वाष्पीभूय गगनं गच्छति, तत्र च मेघाकारेण परिणतं सद् वृष्टिद्वारा पुनर्भूमण्डलमागच्छति। तदेव निर्मलं जलं गोषु दुग्धात्मना वनस्पतिषु च रसात्मना परिणमति। परमेश्वरोऽप्सु चक्रमेतन्निधाय सर्वत्र मधु वर्षतीति तदर्थं तस्मै धन्यवादः सर्वैर्देयः ॥९॥ अत्रेन्द्रद्वारा कृष्णवृत्रासुरयोर्वधस्य द्यावापृथिव्यादिजन्मनश्च वर्णनात्, इन्द्रस्याह्वानात्, तद्द्वाराप्सु निहितस्य चक्रस्य च वर्णनादेतद्दशत्यर्थस्य पूर्वदशत्यर्थेन सङ्गतिरस्तीति विजानीत ॥ इति चतुर्थे प्रपाठके प्रथमार्धे चतुर्थी दशतिः ॥ इति तृतीयाध्याये दशमः खण्डः ॥
टिप्पणीः
१. ऋ० १०।७३।९।
इंग्लिश (2)
Meaning
This visible creation of mankind, according to actions of souls, possesses a sort of concealed sweetness in it. God, from the firmament which is fastened over the earth, fills the cows with milk and the herbs with sap.
Meaning
His wheel of power and presence which operates across the spaces and rules the dynamics of nature and humanity also fills and covers the whole system of existence with honey sweets of joy for life and for the lords own fulfilment too, the same honey which fertilises the earth and fills the clouds, the nectar that is filled in the cows udders and sweetens the sap in the herbs. (Rg. 10-73-9)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (अस्य) એ પરમાત્માના (यत् चक्रम्) જે સૃષ્ટિક્રમ ચક્ર અર્થાત્ ઉત્પત્તિ અને જીવના કર્મફળ પ્રદાન રૂપ (अप्सु आनिषत्तम्) વ્યાપ્ત પરમાણુઓમાં સમગ્ર રૂપથી નિગૂઢ રહીને ચાલી રહેલ છે. (उत उ) અને પણ (अस्मै) એ ચક્રને માટે (मधु इत् चच्छद्यात्) પ્રાણને નિહિત કરેલ છે (पृथिव्याम्) તે પૃથિવી પર વિસ્તૃત સૃષ્ટિમાં તથા પ્રત્યેક પાર્થિવ લોકમાં છોડીને ફરી તેથી (गोषु यत् ऊधः) ગાય આદિ પશુઓમાં ઊધસ્ય = મધુરરસ દૂધ (ओषधीषु पयः) ઔષધિઓમાં રસ ધારણ કરે છે. (૯)
भावार्थ
ભાવાર્થ : પરમાત્માએ સૃષ્ટિક્રમ ચક્ર પરમાણુઓમાં ચલાવ્યો તેને માટે પ્રાણને સમ્યક્ સ્થિર કર્યો, તે પ્રાણ વિસ્તૃત સૃષ્ટિમાં વિસ્તારયુક્ત લોકમાત્રમાં છોડ્યો, પુનઃ ગાય આદિ પશુઓમાં દૂધ અને ઔષધિઓમાં અન્નરસ મનુષ્યોને માટે ધારણ કરાવ્યો, પરમાણુઓમાં ગતિપ્રદ વિશ્વપ્રાણ અને જીવોને માટે ઔષધિઓમાં જીવન પ્રાણ પરમાત્માએ ધારણ કરાવ્યાં, મનુષ્યના નિર્વાહ માટે ગાય આદિથી દૂધ પ્રાપ્ત કરવા અને ઔષધિઓથી અન્નરસ પ્રાપ્ત કરવાનું વિધાન કર્યું, અધ્યાત્મપ્રાણ-અધ્યાત્મજીવન ધારણ કરવા માટે ઉપાસક તે એવા પરમાત્માની ઉપાસના કરે. (૯)
उर्दू (1)
Mazmoon
سرشٹی کا یہ چکر
Lafzi Maana
(اسیہ ید چکرم اپ سُو آنشِتم) اِس پرمیشور کا جو کارخانہ قُدرت بصُورت سرشٹی چکر سب پرانی پرجا میں چل رہا ہے، (اُت اُو) اور (اسمئی) اِس کے لئے (مدھُو اِت) وشیش کر میٹھے اَنّ جَل دودھ وغیرہ جیون رس کو (چچھدّیات) کھول رہا ہے، اور (یداودھ پرتھوی یام اتی سنتی) جو اُوپر اُٹھا ہوا رس کا بھنڈار بصُورت سمندر بادل اور پربت اِس زمین پر بڑی مضبوطی کے ساتھ بندھا ہوا ہے اُسی سے وہ (گوشُو اوشدھی سُوپیہ اودھاہ) گئووں میں اوشدھی جڑی بُوٹیوں میں پینے لائق رس کو دھارن کرتا ہے، اِسی پرمیشور کی بھگتی عبادت ہمیشہ کرنی چاہیئے۔
Tashree
نوٹ: اِسی منتر کا ہی واضح طور پر مفصّل بیان بھگوت گیتا کے تیسرے ادھیائے میں ہے کہ برہم ایشور سے وید، وید سے کرم، کرم سے یگیہ، یگیہ سے بادل اور بادلوں سے بارش، بارش سے اَنّ اور اَنّ سے سب جاندار پلتے ہیں، اِس سرشٹی کے چکر کو جو نہ چلا کر یعنی یگ کرم نہ کرتا ہوا جیتا ہے، وہ پاپی اپنی عمر عزیز کو رائیگاں کھو دیتا ہے، بقول شاعر: جو اِس چکر میں رہتا ناکار ہے، گناہ گار حیات اُس کی بیکارہے۔
मराठी (2)
भावार्थ
पृथ्वी, नदी, नद, समुद्र इत्यादीद्वारे जल वाफ बनून आकाशात जाते तेथे मेघ बनून पर्जन्याद्वारे भूमंडलावर येते तेच निर्मल जल गाईमध्ये दूधरूपाने व वनस्पतीमध्ये रसरूपात परिवर्तित होते. परमेश्वर जलाचे चक्र उत्पन्न करून सर्वत्र मधुचा वर्षाव करतो. त्यासाठी त्याला धन्यवाद दिले पाहिजेत ॥९॥
टिप्पणी
या दशतिमध्ये इंद्राद्वारे कृष्ण व वृत्राचा वध व द्यावा पृथ्वी इत्यादीच्या जन्माचे वर्णन असल्यामुळे, इंद्राचे आह्वान असल्यामुळे, व त्याच्याद्वारे जलामध्ये निहित चक्राचे वर्णन असल्यामुळे, या दशतिच्या विषयाची पूर्व दशतिच्या विषयाबरोबर संगती आहे
विषय
जलातील चक्राचे (आकाशातून भूमी व भूमीकडून आकाशाकडे) वर्णन -
शब्दार्थ
(अप्सु) जलामध्ये (अस्म) या इंद्र परमेश्वराचे अथवा त्याद्वारे निर्मित (यत्) जे (चक्रम्) वर चढणे व खाली उतरणे अशा स्वरूपातील जे चक्र (आ निषत्तम्) स्थित आहे, (उत उ तत्) ते (अस्मै) या जगासाठी (मधु इत्) मधच (चच्छ द्यत्) देत आहे. (जणू काय मधाचीच वृष्टी आहे ते चक्र) (यत्) जो जो (ऊधः) अंतरिक्षरूप गायीच्या स्तनांप्रमाणे असलेला मेध (पृथिव्याम्) भूमीवर (अतिषितम्) पावसाच्या धारांच्या रूपाने येतो, त्याद्वारे हे इंद्र परमेश्वर, तुम्ही (गोषुः) गायींमध्ये दूध व (ओषधीषु) औषधींध्ये (ययः) रस (अदधाः) भरता.।। जलाच्या याच चक्राचे वर्णन वेदांमध्ये या रूपात वर्णिले आहे - ‘‘हे जल समानरूपेण काही दिवस वर जाते आणि कधी खाली येते. मेघ वर्षाद्वारे भूमीस तृप्त करतात आणि अग्नी जलाला बाष्य रूपात परिवर्तित करून आकाशाला तृप्त करते.’’ (ऋ १/१६४/५१) ।।९।।
भावार्थ
भूमीवरील नद्या, नद, समुद्र आदींपासून जल हे बाष्यरूप होऊन आकाशात जाते. जिथे ते ढगाच्या रूपात परिवर्तित होऊन पावसाच्या रूपाने पुन्हा भू मंडळाकडे येते. तेच निर्मळ जल गायींमध्ये दूध रूप आणि वनस्पतीमध्ये रस रूप धारण करते. परमेश्वराने जलाच्या या चक्राची निर्मिती करून सर्वत्र मधुवृष्टी केलेली आहे. या उपकारासाठी सर्व मानवांनी त्याला धन्यवाद दिले पाहिजेत. ।। ९।। या दशतीमध्ये इंद्राने केलेला कृष्णा सुर- वध आणि वृत्रवध, द्यावा पृथिवीच्या जन्माचे वर्णन, इंद्राचे आवाहन आणि त्याने निर्माण केलेले जल- चक्र या विषयांचे वर्णन आहे. याकरिता या दशतीतील विषयांची मागील दशतीच्या विषयांशी संगती आहे, असे जाणावे.।। चतर्थ प्रपाठकातील प्रथम अर्धाची चतुर्थ दशति समाप्त। तृतीय अध्यायाचा तृतीय खंड समाप्त.
तमिल (1)
Word Meaning
சலத்தின் ஆழத்தில் சாய்ந்துள்ள (சக்கரத்தை) எரிவதற்கான சந்தோஷத்தை சோமரசம் செய்யட்டும்.(பூமியின்) மேல் சேர்க்கப்பட்டுள்ள ஸ்தனத்தினின்று (சக்கரத்தினின்று) (பசுக்களிலும்) செடி கொடிகளிலும் (பாலைப்) பெருக்குகிறாய்.
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