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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 368
    ऋषिः - त्रित आप्त्यः देवता - विश्वेदेवाः छन्दः - अनुष्टुप् स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    21

    अ꣣मी꣡ ये दे꣢꣯वा꣣ स्थ꣢न꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡ रो꣢च꣣ने꣢ दि꣣वः꣢ । क꣡द्ध꣢ ऋ꣣तं꣢꣫ कद꣣मृ꣢तं꣣ का꣢ प्र꣣त्ना꣢ व꣣ आ꣡हु꣢तिः ॥३६८॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣मी꣡इति꣢ । ये दे꣣वाः । स्थ꣡न꣢꣯ । स्थ । न꣣ । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ । रो꣣चने꣢ । दि꣣वः꣢ । कत् । वः꣣ । ऋत꣢म् । कत् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । का꣢ । प्र꣣त्ना꣢ । वः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तिः । आ । हु꣣तिः ॥३६८॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचने दिवः । कद्ध ऋतं कदमृतं का प्रत्ना व आहुतिः ॥३६८॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अमीइति । ये देवाः । स्थन । स्थ । न । मध्ये । आ । रोचने । दिवः । कत् । वः । ऋतम् । कत् । अमृतम् । अ । मृतम् । का । प्रत्ना । वः । आहुतिः । आ । हुतिः ॥३६८॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 368
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 4; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 9
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 2;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र के देवता ‘विश्वेदेवाः’ हैं। इसमें देवों के विषय में तीन प्रश्न उठाये गये हैं।

    पदार्थ

    हे (देवाः) अपने-अपने विषय के प्रकाशक ज्ञानेन्द्रियरूप देवो ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) उर्ध्वस्थान सिर के (मध्ये) अन्दर (रोचने) रोचमान अपने-अपने गोलक में (आ स्थन) आकर स्थित हुए हो, अथवा, हे (देवाः) प्रकाशक सूर्यकिरणों ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) द्युलोक के (मध्ये) बीच (रोचने) दीप्तिमान् सूर्य में (आ स्थन) आकर स्थित हो, अथवा, हे (देवाः) ज्ञान के प्रकाश से युक्त तथा ज्ञान के प्रकाशक विद्वानो ! (अमी ये) ये जो तुम (दिवः) कीर्ति से प्रकाशित राष्ट्र के (मध्ये) अन्दर (रोचने) यशस्वी पद पर (आ स्थन) नियुक्त हुए हो, उन तुमसे पूछता हूँ कि (कत्) क्या (वः) तुम्हारा (ऋतम्) सत्य है, (कत्) क्या (अमृतम्) अमरतत्त्व है, (का) और क्या (वः) तुम्हारी (प्रत्ना) पुरातन (आहुतिः) होम क्रिया है? ॥९॥

    भावार्थ

    यहाँ उत्तर दिये बिना ही केवल प्रश्न करके जिज्ञासा उत्पन्न की गयी है कि इन प्रश्नों के उत्तर अपनी प्रतिभा से स्वयं दो। इन प्रश्नों के उत्तर ये हो सकते हैं। सिर में जो ज्ञानेन्द्रियरूप देव स्थित हैं, उनका ऋत है जीवात्मा में सत्यज्ञान को पहुँचाना, उनका अमृत है वास्तविक इन्द्रियतत्त्व, जो देह के साथ इन्द्रिय-गोलकों के विनष्ट हो जाने पर भी मरता नहीं, प्रत्युत सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहता है, उनकी सनातन आहुति है शरीररक्षारूप यज्ञ में तथा ज्ञानप्रदानरूप यज्ञ में अपना होम करना। इसी प्रकार द्युलोकस्थ सूर्य में जो किरण-रूप देव स्थित हैं, उनका ऋत है वह सत्यनियम, जिसके अनुसार प्रतिदिन सूर्योदय के साथ वे आकाश और भूमण्डल में व्याप्त होते हैं, उनका अमृत है शुद्ध मेघ-जल, जिसे वे समुद्र आदि से भाप बनाकर ऊपर ले जाते हैं, उनकी सनातन आहुति है मेघजल का पार्थिव अग्नि में होम करना, जिससे पृथिवी पर ओषधि, वनस्पति आदि उगती हैं और प्राणी जीवन धारण करते हैं, अथवा सब ग्रहोपग्रहों में अपना होम करना, जिससे पृथिवी, मङ्गल, बुध, चन्द्रमा आदि प्रकाशित होते हैं। इसी प्रकार राष्ट्र में जो विद्या दान करनेवाले विद्वान लोग हैं, उनका ऋत है वह सत्यनिष्ठा जिसका अनुसरण कर वे विद्यादान में दत्तचित्त होते हैं; उनका अमृत है वह ज्ञान जिसे वे सत्पात्रों को देते हैं, उनकी सनातन आहुति है अध्ययन-अध्यापन रूप यज्ञ में अपना होम करना, इत्यादि सुधी जनों को स्वयं ऊहा कर लेनी चाहिए ॥९॥ विवरणकार माधव ने यह देखकर कि इस ऋचा का ऋषि आप्त का पुत्र त्रित है और देवता ‘विश्वेदेवाः’ है, इस पर निम्नलिखित इतिहास लिखा है-आप्त ऋषि के तीन पुत्र थे, एकत, द्वित और त्रित। उन्होंने यज्ञ करने की इच्छा से यजमानों से गौएँ माँगी और पा लीं। उन्हें लेकर वे घर चल पड़े। जब वे सरस्वती नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे तब परले पार बैठे गवादक ने उन्हें देख लिया। वह उठा और सरस्वती के जलों को पार करके रात में उसने उनको डराया। जब वे डरकर भागे तब उनमें से त्रित घास-फूस और लताओं से ढके हुए एक निर्जल कुएँ में गिर पड़ा। कुएँ में गिरने का कारण अन्य कुछ लोग यह बताते हैं कि एकत और द्वित को कम गौएँ मिली थीं, त्रित को बहुत सारी मिल गयी थीं, इसलिए जान-बूझकर उन्होंने त्रित को कुएँ में धकेल दिया था। वहीं उसके मन में आया कि मैंने यज्ञ का संकल्प किया था, अब यदि बिना यज्ञ किये ही मर जाता हूँ तो मेरा कल्याण नहीं होगा, इसलिए कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि यहाँ कुएँ में पड़ा-पड़ा ही मैं सोम-पान कर लूँ। वह यह विचार कर ही रहा था कि अकस्मात् ही उसने उसी कुएँ में एक लता उतरी हुई देखी। उसने उसे लेकर और यह सोम ही है, ऐसा मन में निश्चय करके अन्य भी यज्ञ-साधनों का मन में संकल्प करके बजरी को सोम कूटने के सिल-बट्टे बनाकर उस लता को अभिषुत किया और अभिषुत करके देवों को पुकारा। पुकारे गये देवों को पुकारे जाने का कारण समझ में न आया, अतः वे आविग्न हो उठे। बृहस्पति ने भी पुकार को सुना और सुनकर वह देवों से बोला कि त्रित का यज्ञ है, वहाँ चलते हैं। तब वे सब देव वहाँ आये। उन्हें आया देखकर कुएँ से उद्धार की इच्छावाले त्रित ने उनकी स्तुति की और उन्हें उपालम्भ दिया कि तुम्हारा सत्यासत्य का विवेक नष्ट हो गया है, तुम बड़े अकृतज्ञ हो कि मुझे इस कुएँ से बाहर नहीं निकालते हो। त्रित का उपालम्भ ही प्रस्तुत ऋचा में प्रकट किया गया है, इत्यादि। यह सब कल्पना-कला का विलास है, वास्तविकता इसमें कुछ भी नहीं है, यह सुधी जन स्वयं ही समझ लें ॥

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    पदार्थ

    (दिवः-आरोचने मध्ये) ज्ञानप्रकाशक इन्द्र—परमात्मा के समन्त प्रकाश स्थान के मध्य में (अमी ये वः-देवाः—स्थन) वे जो ‘वः यूयम्’ ‘विभक्तिव्यत्ययः’ तुम विद्वान्जन हो (कत्-ह-ऋतम्) क्या ऋत है सत्य है (कत्-अमृतम्) क्या अमृत है (का प्रत्ना-आहुतिः) क्या पुरातनी सदा से चली आई आहुति देने लेने योग्य भेंट है।

    भावार्थ

    परमात्मा के गुण प्रकाशनार्थ सम्मेलन होने चाहिए उनमें एकत्र विद्वानों में चर्चा चलनी चाहिए। क्या ऋत धर्म है जिससे संसार का नियन्त्रण परमात्मा कर रहा है जीवात्माओं को भोगफल एवं अभ्युदय देता है और क्या अमृत धर्म है, जिससे मुक्तों के लिए मोक्ष की प्रवृत्ति है—मोक्षानन्द दे रहा है। इन दोनों में अधिनायक परमात्मदेव को मान उसके आदेश का पालन और आराधना करना चाहिए॥९॥

    विशेष

    ऋषिः—त्रित आप्त्यः (तीर्णतम परमात्म प्राप्ति से—ऊँचा उठा)॥ देवता—विश्वे देवाः ‘इन्द्रसम्बद्धाः’ (परमात्मा के दिव्य धर्म)॥<br>

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    विषय

    ऋत, अमृत, आहुति

    पदार्थ

    गत मन्त्र में नियमित जीवन-ऋत का उल्लेख हुआ था। इस मन्त्र में ऋत के साथ दो अगली सीढ़ियों का भी उल्लेख करते हैं, जिनसे हम द्युलोक का आरोहण करके देव बन जाएँगे। असुर्य लोकों से ऊपर उठकर हम मनुष्य बने हैं। अब इस पृथिवीलोक से भी ऊपर उठकर हमें अन्तरिक्षलोकवासी देवयोनियों में पहुँचना है, और वहाँ से ऊपर उठकर द्युलोक के देव बनना है। उन द्युलोक के देवो को सम्बोधन करते हुए इस मन्त्र का ऋषि त्रित, जिसने असुर्य, मानव, देवयोनि इन तीनों लोकों को तैर जाना है और तैरकर जो देवलोक को प्राप्त करनेवालों में श्रेष्ठ 'आप्त्य' बनेगा। यह आप्त्य देवों से कहता है कि (अभि ये देवा:) = वे जो देव दिवः-द्युलोक के आराचने मध्ये समन्तात् दीप्त मध्यभाग में स्थन- हो (वः) तुम्हें (कत्) = शिर:स्थान में अथवा सुखमय स्थिति में पहुँचानेवाला (ऋतम्) = ऋत ही तो है, (कत्) = उसी प्रकार तुम्हारी उच्च स्थिति करनेवाला अथवा सुखी बनानेवाला (अमृतम्) = अमृत ही तो है। और अन्त में (वः) = आपकी (प्रत्ना) = प्राचीन होते भी नवीन अर्थात् निरन्तर चलनेवाली (आहुति) = प्राजापात्ययज्ञ में सर्ववेदस की आहुति का आपको शिखर पर पहुँचाकर स्वर्ग प्राप्त करानेवाली हुई है। 

    १. ‘ऋत’ का अभिप्राय नियमित जीवन है, यह युक्ताहारविहारवाला नियमित जीवन हमें पृथिवीलोक के विजय के योग्य बनाता है। ऋत का पालन करके हम इस पृथिवीलोक पर जहाँ उन्नत होते हैं, वहाँ सुखी जीवनवाले भी होते हैं।

    २. अमृतम् का अभिप्राय है 'यज्ञशेष' [यज्ञशेषं तथामृतम्] । पञ्चयज्ञ करके बचे हुए का सेवन करनेवाले अन्तरिक्षलोक का विजय करते हैं। हमारा जन्म किसी अन्तरिक्ष के पिण्ड में होता है। ‘अपञ्चयज्ञो मलिम्लुचः'=पञ्चयज्ञ न करके हम चोर होते हैं- अन्तरिक्षलोक में पहुँचने का तो प्रश्न ही क्या ?

    ३. अन्त में प्राजापत्य यज्ञ में सम्पूर्ण धन की आहुति देकर हम 'देवलोक' में पहुँचने के अधिकारी बनते हैं। सूर्य मण्डल का भेदन करनेवाला यही संन्यासी होता है। उल्लिखित प्रकार से 'ऋत, अमृत, आहुति' एक सीढ़ी बन जाती है जो हमें ऊपर और ऊपर जाने में समर्थ करती है।

    भावार्थ

    मेरा जीवन 'ऋत का पालन करे, अमृत का सेवन करे और आहुति देनेवाला हो। 

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( ये अमी देवा: ) = जो ये देवगण ( आ रोचने ) = कान्तिमान् ( दिवः मध्ये ) = द्यौलोक के मध्य में ( स्थन ) = विद्यमान हैं । हे देवो ! मैं आप से प्रश्न करता हूं कि ( वः ) = आप लोगों का ( ऋतं कद्  ) = सत्य २ तत्व क्या है ? ( कद् अमृतम् ) = आपका अमृतस्वरूप किस प्रकार का है ? ( वः ) = आपको ( प्रत्ना ) = प्राचीन ( आहुतिः ) = स्मरण करने और तर्पण करने का पदार्थ क्या है ? अर्थात् आपका प्राचीन मूलभूत नाम और वास्तविक द्रव्य क्या है ?

    इन तीनों प्रश्नों के क्रम से उत्तर देखिये ऋ० १ । सू० १०५ । मन्त्र १२, १५, १६ ।
     

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - आप्त्यस्रित:। 

    देवता - विश्वेदेवाः।

    छन्दः - अनुष्टुभ् ।

    स्वरः - गान्धारः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    विश्वेदेवाः देवताः। देवानां विषये त्रयः प्रश्ना उत्थाप्यन्ते।

    पदार्थः

    हे (देवाः) स्वस्वविषयप्रकाशकाः ज्ञानेन्द्रियरूपाः देवाः ! (अमी ये) इमे ये यूयम् (दिवः) ऊर्ध्वस्थानस्य शिरोभागस्य (मध्ये) अभ्यन्तरे (रोचने) रोचमाने स्वस्वगोलके (आ स्थन) आगत्य स्थिताः स्थ। अत्र ‘तप्तनप्तनथनाश्च। अ० ७।१।४५’ इति तनबादेशः। यद्वा, हे (देवाः) प्रकाशकाः सूर्यकिरणाः ! (अमी ये) इमे ये यूयम् (दिवः) द्युलोकस्य (मध्ये) अभ्यन्तरे (रोचने) दीप्तिमति आदित्ये (आ स्थन) आगत्य स्थिताः स्थ, यद्वा, हे (देवाः) ज्ञानप्रकाशयुक्ताः ज्ञानस्य प्रकाशकाश्च विद्वांसः ! (अमी ये) इमे ये यूयम् (दिवः) कीर्त्या प्रकाशितस्य राष्ट्रस्य (मध्ये) अभ्यन्तरे (रोचने) यशस्विनि पदे (आ स्थन) नियुक्ताः स्थ, तान् युष्मान् पृच्छामि यत् (कत्) किम् (वः) युष्माकम् (ऋतम्) सत्यम् अस्ति ? (कत्) किम् (अमृतम्) अमरं तत्त्वम् अस्ति ? (का) का च (वः) युष्माकम् (प्रत्ना) पुराणी पूर्वकालादागता (आहुतिः) होमक्रिया अस्ति ? इति ॥९॥

    भावार्थः

    अत्रोत्तरदानं विनैव केवलं प्रश्नान् कृत्वा जिज्ञासा समुत्पाद्यते, यदेते प्रश्नाः स्वयमेव स्वप्रतिभयोत्तरणीया इति। इमानि तावत्तेषामुत्तराणि भवितुमर्हन्ति। शिरसि ये ज्ञानेन्द्रियरूपा देवाः स्थितास्तेषाम् ऋतमस्ति जीवात्मनि सत्यज्ञानप्रापणम्, तेषाममृतमस्ति वास्तविकम् इन्द्रियतत्त्वं यद्देहेन सहेन्द्रियगोलकानां विनाशेऽपि न म्रियते, प्रत्युत सूक्ष्मशरीरे तिष्ठति, तेषामाहुतिर्विद्यते शरीररक्षायज्ञे ज्ञानप्रदानयज्ञे च स्वकीयो होमः। एवमेव, द्युलोकस्थे सूर्य ये किरणरूपा देवाः स्थितास्तेषाम् ऋतमस्ति स सत्यनियमो यमनुसृत्य ते प्रत्यहं सूर्योदयेन साकं गगनं भूमण्डलं च व्याप्नुवन्ति, तेषाममृतमस्ति शुद्धं मेघजलं यत्ते समुद्रादिभ्यो वाष्पीकरणविधिनोर्ध्व नयन्ति, एतेषां प्रत्नाऽऽहुतिर्विद्यते सनातनकालान्मेघजलस्य पार्थिवाग्नौ होमो येन पृथिव्यामोषधिवनस्पत्यादयः प्ररोहन्ति प्राणिनश्च जीवनं धारयन्ति, यद्वा सर्वेषु ग्रहोपग्रहेषु स्वात्मनो होमो येन पृथिवीमङ्गलबुधचन्द्रादयो ज्योतिषा दीप्यन्ते। तथैव राष्ट्रे ये विद्यादातारो विद्वांसः सन्ति तेषाम् ऋतमस्ति सा सत्यनिष्ठा यामनुसृत्य ते विद्यादाने दत्तचित्ता भवन्ति, तेषाममृतमस्ति तज्ज्ञानं यत्ते सत्पात्रेभ्यः प्रयच्छन्ति, तेषां प्रत्नाऽऽहुतिश्च विद्यते सनातनकालात् प्रचलितेऽध्ययनाध्यापनयज्ञे स्वात्मनो होम इत्यादि सुधीभिः स्वयमेवोह्यम् ॥९॥ विवरणकारोऽस्या ऋचो व्याख्याने ब्रूते—“त्रितस्यार्षम्। वैश्वदेवीयमृक्। अत्रेतिहासमाचक्षते। आप्तस्य ऋषेः त्रयः पुत्रा बभूवुः, एकतः द्वितः त्रित इति। ते यष्टुकामाः याज्यान् यजमानान् गा ययाचिरे लेभिरे च। ता आदाय गृहं जग्मुः। तद् गच्छतः पथा सरस्वत्यास्तीरेण परस्मिन् कूले निषण्णो गवादकः ददर्श। दृष्ट्वा चोत्थाय अभिमुखः सारस्वतीरप अवतीर्य रात्रौ त्रासयामास। तेषां त्रासात् त्रस्यतां त्रितः कूपे निर्जले तृणैर्वल्लीभिश्चावकीर्णे पपात। अन्ये तु पुनः एतदेवेतिहासमन्यथा व्याचक्षते। एकतद्विताभ्यां स्वल्पा गावो लब्धाः त्रितेन च बह्व्यः। तत ईर्ष्यया ताभ्यां कूपे प्रक्षिप्तः इति। तस्य तत्रस्थस्यैव मनः प्रादुरभूत्। कृतयागसङ्कल्पस्य अकृतयागस्य मम मृत्युर्न श्रेयसे। तत्कथमिहस्थ एवाहं सोमं पिबेयमिति। एवं चिन्तयन् यदृच्छया तस्मिन् कूपे वीरुधमुत्तीर्णा ददर्श। स तामादाय सोमोऽयमिति मनसा निश्चित्य यागैश्वर्यमन्यानि अपि यागसाधनानि मना सङ्कल्प्य, शर्करा अभिषवग्राव्णः कृत्वा तां वीरुधमभिसुषाव। अभिषुत्य च देवानाजुहाव। ते देवा आहूताः सन्तः आह्वानकारणम् अनवबुध्यमानाः आविग्ना बभूवुः। तद् बृहस्पतिः शुश्राव। श्रुत्वा च देवानुवाच त्रितस्य यज्ञो वर्तते। तत्र गच्छाम इति। ततस्ते देवाः आजग्मुः। स तानागतान् कूपादुत्तरणार्थी तुष्टाव उपालब्धवांश्च—अमी ये देवा स्थन भवथ, तिष्ठथेत्यर्थः। मध्ये आरोचने दिवः सम्बन्धिनि आदित्यमण्डले। तानहं पृच्छामि। क्व ऋतं सत्यम्, क्व चामृतम्। क्व प्रत्ना पुराणी, चिरन्तनीत्यर्थः, वः युष्माकं प्रत्ना सम्बन्धिनी आहुतिः ? एतदुक्तं भवति—नष्टसत्यासत्यविवेका अकृतज्ञाश्च यूयं, येन मामस्मात् कूपात् नोत्तारयथ इत्युपालम्भः। अयं द्वितीयः पक्षः। अमी ये देवाः स्थन—मध्ये आदित्यमण्डले, आरोचने दिवः द्युलोकादपि दीप्ततरे स्थाने भागं ग्रहीतुमागताः। कत् व ऋतम् ? एतदुक्तं भवति—ऋतम् अन्नम्, तदत्र नास्ति कूपे निर्जले। तत् कत् अमृतं सोमाख्यम्। हविर्धानाः, करम्भः, पुरोडाशः, परीवापः, पयः, उपवसथ्यः, पशुरग्नीषोमीयः, पशुः सवनीयः एवमादिकं हि तत्। अमृतं च क्वात्र विद्यते। कस्मान्मम देवा यागमुद्दिश्य भवन्तोऽत्र समागताः। ततस्तैः कूपादुत्तारितः’’ इति। कल्पनाकलाविलसितमेतत्सर्वं न वास्तविकमिति स्वयमेव सुधियो विभावयन्तु ॥

    टिप्पणीः

    १. १।१०५।५ ऋषिः त्रित आप्त्यः कुत्स आङ्गिरसो वा। ‘अमी ये देवाः स्थन त्रिष्वारोचने दिवः। कद्व ऋतं कदमृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी ॥’ इति पाठः।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    These worlds are found amid the luminous realm of heaven. Are the Vedas prevalent in them ? Is there provision for the performance of Yajnas? Is ancient system of Yajnas found there?

    Translator Comment

    These are so many planets in the solar system. Swami Dayanand writes in the Satyarth Prakash, that all these planets like Mars, Mercury, Venus, Neptune, etc. are worlds like the Earth, where living beings inhabit, and where God has revealed the Vedas for the spiritual guidance of their inhabitants. The same question has been raised in this verse which is answered in the next Swami Tulsi Ram of Meerut has thus interpreted the verse Pt. Jaidev Vidyalankar and Pt. Harish Chandra Vidyalankar has interpreted it differently. Present day science has proved that there is life on the Moon and other planets.

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    Meaning

    O lords of knowledge, who or what are those divine powers of existence abiding in the light of heaven by their name, identity and state of being in the three regions of the universe? Where is the law of cosmic dynamics of evolution? What is truth and what is untruth? What is eternal and constant? What is existential and mutable? What was the first mutation of Prakrti in the cosmic yajna? What is going to be the last and closing oblation in the cosmic vedi? (May the heaven and earth know and reveal it for us. ) (Rg. 1-105-5)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

     

    પદાર્થ : (दिवः आरोचने मध्ये) જ્ઞાન પ્રકાશક ઇન્દ્ર-પરમાત્માના સમગ્ર પ્રકાશ સ્થાનની મધ્યમાં (अमी ये वः देवाः स्थन) તે જે તમે વિદ્વાનજન છો (कत् ह ऋतम्) શું ૠત-સત્ય છે (कत् अमृतम्) શું શું અમૃત છે (का प्रत्ना आहुतिः) કઈ પુરાતની સદાથી ચાલી આવતી આહુતિ આપવા યોગ્ય ભેદ છે. (૯)

    भावार्थ

    ભાવાર્થ : પરમાત્માના ગુણ પ્રકાશન માટે સંમેલનો થવા જોઈએ અને તેમાં એકત્ર થયેલા વિદ્વાનોમાં ચર્ચા થવી જોઈએ. શું ૠત-સત્ય ધર્મ છે, જેથી પરમાત્મા સંસારનું નિયંત્રણ કરી રહેલ છે. જીવાત્માઓને ભોગફળ અને અભ્યુદય આપે છે અને શું અમૃત ધર્મ છે, જેથી મુક્તોને માટે મોક્ષની પ્રવૃત્તિ છે-મોક્ષાનંદ આપી રહ્યો છે. આ બન્નેમાં અધિનાયક પરમાત્મ દેવનું માન, તેના આદેશનું પાલન અને આરાધના કરવી જોઈએ. (૯)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    عرش بریں پر چمکتے ہُوئے تاروں سے خُدا کا ظہور!

    Lafzi Maana

    (دیواہ) دئیو لوک میں چمکتے ہوئے ستارو! (امی دوہ آروچنے مدھئے ستھن) یہ جو تم آکاش میں چاروں طرف پھیلے ہوئے جگمگا رہے ہو، (کت وہ رتم) کون ہے جو تم کو چمکا رہا ہے، نیم میں چلا رہا ہے؟ (کت امرتم) کون وہ امرت ہے جو تم کو امر بنا رہا ہے؟ (کاپرتناوہ آہوتی) وہ شکتی پراچین کون سی ہے، جس کے لئے تم اپنی آہوتی دی رہے ہو؟ (بلاشک وہی پرماتما دنیا کا سربراہ ہے، جس کے حصول میں سبھی بیتاب ہو رہے ہیں).

    Tashree

    چمکتے اور جگمگاتے آسمان کے پیارے تارے! کون امرت ہے امرپن کس سے لیکر رہ رہے؟

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    येथे उत्तर न देता केवळ प्रश्न विचारून जिज्ञासा उत्पन्न केलेली आहे. या प्रश्नांची उत्तरे आपल्या प्रतिभेने स्वत: द्या. या प्रश्नांची उत्तरे ही असू शकतात. मस्तकात जे ज्ञानेंद्रियरूपी देव स्थित आहेत त्यांचे ऋत हे की जीवात्म्याला सत्य ज्ञान पोचविणे. त्यांचे अमृत आहे वास्तविक इंद्रियतत्त्व, जे देहाबरोबर असलेले गोलक नष्ट झाले तरी मरत नाहीत, तर सूक्ष्म शरीरात विद्यमान असतात. त्यांची सनातन आहुती शरीररक्षारूपी यज्ञात व ज्ञानप्रदानरूपी यज्ञात आपला होम करणे. याचप्रकारे सूर्यामध्ये द्युलोकस्थ सूर्यात जे किरणरूपी देव स्थित आहेत, त्यांचे ऋत आहे सत्यनियम ज्यानुसार प्रत्येक दिवशी सूर्योदयाबरोबर ते आकाश व भूमंडलात व्याप्त होतात, त्यांचे अमृत आहे. शुद्ध मेघजल ज्याला ते समुद्र इत्यादीद्वारे वाफ बनवून वर घेऊन जातात. त्यांची सनातन आहुती आहे मेघजलाचे पार्थिव अग्नीत होम करणे. ज्याद्वारे पृथ्वीवर औषधी, वनस्पती इत्यादी उगवतात व प्राणी जीवन धारण करतात किंवा सर्व ग्रहोपग्रहात आपला होम करणे, ज्यामुळे पृथ्वी, मंगळ, बुध, चंद्र इत्यादी प्रकाशित होतात. याच प्रकारे राष्ट्रात विद्या दानात जे विद्वान विद्यादानात रमलेले असतात त्यांचे अमृत आहे ज्ञान जे ते सत्पात्रांना देतात. त्यांची सनातन आहुती आहे अध्ययन-अध्यापनरूपी यज्ञात आपला होम करणे इत्यादी, सुज्ञ जनांनी स्वत: परीक्षण केले पाहिजे ॥९॥

    टिप्पणी

    विवरणकार माधवने हे पाहून या ऋचाचा ऋषी आप्तचा पुत्र त्रित आहे व देवता ‘विश्वेदेवा:’ आहे. यावर निम्नलिखित इतिहास लिहिलेला आहे. आप्त ऋषींचे तीन पुत्र होते - एकत, द्वित, त्रित. त्यांनी यज्ञ करण्याच्या इच्छेने यजमानांकडून गाई मागून घेतल्या. त्यांना ते घरी घेऊन गेले. जेव्हा ते सरस्वती नदीच्या किनाऱ्याने जात होते तेव्हा पलीकडे वसलेल्या गवादकाने त्यांना पाहिले. तो उठला व सरस्वतीचे जल पार करून रात्री त्याने त्यांना घाबरून टाकले, जेव्हा ते भिऊन पळाले तेव्हा त्यातून त्रित गवतांनी व वेलींनी झाकलेल्या एका निर्जल विहिरीत पडला. विहिरीत पडल्यामुळे एकत व द्वितला कमी गाई मिळाल्या असे काही लोक म्हणतात. त्रितला अधिक गाई मिळाल्यामुळे त्यांनी त्रितला विहिरीत ढकलून दिले. तेथे त्याच्या मनात विचार आला की मी यज्ञाचा संकल्प केला होता. जर यज्ञ न करता मृत्यू आला तर माझे कल्याण होणार नाही. यावर असा एखादा उपाय शोधला पाहिजे की मी विहिरीत पडल्या पडल्या सोमपान करू. तो हा विचार करतानाच अचानक एक वेल विहिरीत उतरताना त्याने पाहिली व सोमच आहे, असा निश्चय करून लहान लहान दगडांचा खलवत्त्यासारखा उपयोग करून त्या लतेला अभिषुत करून देवांना आमंत्रित केले तेव्हा देवांना त्याचे कारण समजले नाही, तेव्हा तो दु:खी झाला. बृहस्पतीनेही हाक ऐकली व त्याने देवाला म्हटले की त्रितचा यज्ञ आहे, तेथे जाऊ या. तेव्हा ते सर्व देव तेथे आले. त्यांना पाहून विहिरीत असलेल्या त्रितने त्यांची स्तुती केली व त्यांना व्यंग्यात्मक म्हटले की तुमचा सत्यासत्याचा विवेक नष्ट झालेला आहे. तुम्ही अकृतज्ञ अर्थात् कृतघ्न आहात. मला या विहिरीतून बाहेर काढत नाहीत. त्रितचे व्यंग्यच या ऋचेत प्रकट केलेले आहे, इत्यादी. हा सर्व कल्पनेचा विलास आहे. यात वास्तविकता मुळीच नाही. सुज्ञ लोकांनी हे समजावे.

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    विषय

    विश्वेदवाः देवता। देवांविषयी इथे तीन प्रश्न विचारले आहेत.

    शब्दार्थ

    हे (देवाः) आपापल्या विषयांचे (रस, रूप, स्पर्श आदींचे) प्रकाशक हे ज्ञानेंद्रियरूप देवगणहो, (अमी) (ये) हे जे तुम्ही (दिवः) उर्ध्वस्थान शिराच्या (मध्ये) मध्ये (रोचमाने)ररोचमान आपल्या आपल्या स्थानात (जिव्हा, नेत्र, त्या आदीमध्ये) (आ स्थन) स्थित झालेले आहात अथवा हे (देवाः) प्रकाशक सूर्यकिरणे, (अमी) (ये) हे जे तुम्ही (दिवः) द्यूलोकाच्या (मध्ये) मधे (रोचने) दीप्तीमा सूर्यात (आ स्थन) येऊन स्थित झालेली आहात, अथवा (देवाः) ज्ञान- प्रकाशाने दीप्त वा ज्ञानाचे प्रकाशक हे विद्वज्जनहो, (अमी) (ये) हे जे तुम्ही (दिवः) कीर्तिमान राष्ट्रा (मध्ये) मधे (रोचने) यशस्वी अधिकार पदावर (आ स्थन) नेमले गेले आहात. त्यामुळे मी तुम्हाला विचारू इच्छितो की (वः) तुमचे (ऋतम्) सत्य (कत्) काय आहे (त्याचे खरे स्वरूप कसे आहे) (कत्) (अमृतम्) त्यातील अमरतत्त्व काय आहे आणि (वः) तुमची (प्रत्ना) पुरातन (आहुतिः) होमक्रिया काय व कशी आहे ? ।। ९।।

    भावार्थ

    या ठिकाणी केवळ प्रश्न विचारले असून उत्तरे सांगितली नाहीत. उत्तरे तुम्ही वाचकांनी स्वतः आपल्या बुद्धी कौशल्याने द्यावीत, असे अपेक्षिले आहे. प्रश्नांची उत्तरे या स्वरूपात असू शकतात. मस्तकामध्ये जे ज्ञानेन्द्रिय रूप देव आहेत, त्याचे ऋत आहे. जीवात्म्यापर्यंत खरे ज्ञान पोचविणे, त्यांचे अमृत आहे. वास्तविक इन्द्रिय तत्त्व, जे देहासह इन्द्रिय गोलक नष्ट झाल्यानंतरदेखील मरत नाही, तर सूक्ष्म शरीराच्या रूपाने विद्यमान असते. त्या तत्त्वांची सनातन आहुती आहे. शरीर रक्षारूप यज्ञामध्ये व ज्ञान प्रदानरूप यज्ञामध्ये स्वतःला आहुत वा होम करणे. याचप्रमाणे द्युलोकात स्थित सूर्यात जे किरणरूप देव गण आहेत, त्यांचे ऋत आहे. ते सत्यनियम की ज्यांच्या प्रभावाने ती किरणे सूर्योदयासह आकाशात व भूमंडळात व्याप्त होतात आणि त्यांचे अमृत आहे, ते शुद्ध मेघजल, ज्याला ते समुद्र, सरोवर आदींपासून ग्रहण करून बाष्प रूपाने वर घेऊन जातात व त्यांची सनातन आहुती आहे. मेघजलाला भौतिक अग्नीमध्ये होम करणे की ज्यामुळे औषधी, वनस्पती आदी उगवतात आणि प्राणी जीवन प्राप्त करतात अथवा ती किरणे सर्व ग्रह - उपग्रहात स्वतःला आहुत करतात की ज्यामुळे पृथ्वी, मंगल, बुध, चंद्र आदी प्रकाशित होतात. याच प्रकारे राष्ट्रात विद्या - दान करणारे विद्वज्जन देवगण आहेत. त्यांचे ऋत आहे ती सत्याविष्ठा ज्यांचे अनुसरण करीत ते विद्यादानात दत्तचित्त असतात. त्यांचे अमृत आहे ते ज्ञान की जे ते सत्यात्रांना देतात आणि त्यांची सनातन आहुती आहे. अध्ययन - अध्यापवरूप यज्ञात स्वतःला होम करणे वा समर्पित करणे, अशा प्रकारे या मंत्राच्या अर्थावर विचार करताना सुधीजनांची स्वतःदेखील वेगळी कल्पना करता येते वा करावी.।। ९।। या ऋचेचा ऋषी आप्त असून त्याचा पुत्र आहे त्रित आणि मंत्र देवता आहे ‘विश्वेदेवाः’ हे पाहून विवरणकार माधव याने खालीलप्रमाणे इतिहास लिहून टाकला आहे - ‘‘आप्त नावाच्या ऋषीचे तीन पुत्र होत. शकत, द्वित व त्रित. त्यांनी यज्ञ करण्यासाठी यजमानांकडून गायींची मागणी केली व यजमानांनी काही गायी त्यांना दिल्या. ते तिघे जण सर्व गायींसोबत घेऊन घराकडे निघाले. ते जेव्हा सरस्वती नदीच्या एका तीरावरून जात होते तेव्हा दुसऱ्या तीरावर बसलेल्या गवादकाने त्यांना पाहिले. तो उठला व सरस्वती पार करून तो अलीकडील तटावर आला. येऊन रात्रीच्या अंधारात त्याने त्या तिघा ऋषी पुत्रांना भयभीत केले. ते तिधे जण भिऊन पळाले, तेव्हा त्यापैकी त्रित हा गवत काड्यांनी व वेलीनी व्यापलेल्या एका जलविहीन विहिरीत पडला. तो विहिरीत पडला. या पडण्याच्या प्रसंगाने कारण काही अन्य लेखक वेगळेच सांगतात. त्यांच्या म्हणण्याप्रमाणे एकत व द्वित यांना संख्येने कमी गायी मिळाल्या होत्या. त्रितला अधिक गायी मिळाल्या होत्या, म्हणून त्या दोघा भावांनी त्रितला हेतुःपुरस्सर विहिरीत ढकलले. विहिरीतच त्रितने विचार केला की मी यज्ञ करण्याचा संकल्प केला होता. आता जर मी यज्ञ न करताच मेलो, तर माझे अमंगल होईल. म्हणून काही तरी असा उपाय केला पाहिजे की ज्यायोगे मी विहिरीत राहूनच सोम- पान करू शकेन. असा विचार मनात येताच त्याच्या लक्षात आले की एक वेल विहिरीच्या भिंतीत वरून उतरलेला आहे. त्याने वेल तोडली व ही लता म्हणजे सोम-लता आहे, असा निश्चय करून आणि मनातल्या मनात यज्ञाच्या इतर साधनांची कल्पना करीत विहिरीच्या दगड - गोट्यांच्या खलबत्त्याप्रमाणे वापर करून लता कुटली व त्याचा रस सिद्ध करून देवांना आवाहन केले. देवांना आवाहनाचे कारण कळेना, म्हणून ते उद्विग्न झाले. त्रितचे आवाहन बृहस्पतीनेही ऐकले. तो देवांना म्हणाला की त्रितमे यज्ञ केला आहे. आपण तिथे जाऊ या. मग सर्व देवगण तिथे गेले. त्यांना आलेले पाहून आपल्या उद्धाराची अपेक्ष बाळगणाऱ्या त्रितने त्यांची स्तुती केली व तो देवांना दोष देऊ लागला. म्हणाला की अवश्यमेव तुमचा विवेक नष्ट झाला आहे. तुम्ही सर्व अकृतज्ञ आहात. कारण मला विहिरीबाहेर काढत नाही. त्रितने केलेल्या देवनिंदेचे वर्णनच या ऋचेत केले आहे. आदी आदी.’’ हे सर्व वर्णन केवळ कल्पना - कलेचा विलास असून यात सत्याचा लवलेशही नाही, हे सुधीजन स्वतः समजू शकतात.।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    தேவர்களே! நீங்கள் [1]திவ்யனின் ஒளி நடுவே இருக்கிறீர்கள். உங்கள் சம்பந்தமான உண்மையான ரகசியமென்ன? உன் அமிருதம் எப்படி? உன் பழைய ஆகுதி எப்படி?

    FootNotes

    [1]திவ்யனின் - புனிதனின்

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