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सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 462
ऋषिः - एवयामरुदात्रेयः
देवता - मरुतः
छन्दः - अतिजगती
स्वरः - निषादः
काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
19
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣢ म꣣त꣡यो꣢ यन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे म꣣रु꣡त्व꣢ते गिरि꣣जा꣡ ए꣢व꣣या꣡म꣢रुत् । प्र꣡ शर्धा꣢꣯य꣣ प्र꣡ यज्य꣢꣯वे सुखा꣣द꣡ये꣢ त꣣व꣡से भ꣣न्द꣡दि꣢ष्टये꣣ धु꣡नि꣢व्रताय꣣ श꣡व꣢से ॥४६२॥
स्वर सहित पद पाठप्र꣢ । वः꣣ । महे꣢ । म꣣त꣡यः꣢ । य꣣न्तु । वि꣡ष्ण꣢꣯वे । म꣣रु꣡त्व꣢ते । गि꣣रिजाः꣢ । गि꣣रि । जाः꣢ । ए꣣वया꣡म꣢रुत् । ए꣣वया꣢ । म꣣रुत् । प्र꣢ । श꣡र्धा꣢꣯य । प्र । य꣡ज्य꣢꣯वे । सु꣣खाद꣡ये꣢ । सु꣣ । खाद꣡ये꣢ । त꣣व꣡से꣢ । भ꣣न्द꣡दि꣢ष्टये । भ꣣न्द꣢त् । इ꣣ष्टये । धु꣡नि꣢꣯व्रताय । धु꣡नि꣢꣯ । व्र꣣ताय । श꣡व꣢꣯से ॥४६२॥
स्वर रहित मन्त्र
प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवयामरुत् । प्र शर्धाय प्र यज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे ॥४६२॥
स्वर रहित पद पाठ
प्र । वः । महे । मतयः । यन्तु । विष्णवे । मरुत्वते । गिरिजाः । गिरि । जाः । एवयामरुत् । एवया । मरुत् । प्र । शर्धाय । प्र । यज्यवे । सुखादये । सु । खादये । तवसे । भन्ददिष्टये । भन्दत् । इष्टये । धुनिव्रताय । धुनि । व्रताय । शवसे ॥४६२॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 462
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 12;
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(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 6
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 12;
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भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
अगले मन्त्र के देवता ‘मरुतः’ हैं। इसमें विष्णु और मरुतों की सहायता से आत्मिक और राष्ट्रिय उत्कर्ष पाने की प्रेरणा है।
पदार्थ
प्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। हे साथियों ! (महे) महान्, (मरुत्वते) प्राणयुक्त (विष्णवे) सारे शरीर में व्याप्त क्रियावाले अपने जीवात्मा के प्रोत्साहनार्थ (वः) तुम्हारी (मतयः) बुद्धियाँ वा वाणियाँ (प्र यन्तु) प्रवृत्त हों, जो जीवात्मा (गिरिजाः) पर्वत-सदृश शरीर में जन्मा हुआ और (यवयामरुत्) वेगवान् प्राणवाला है। (यज्यवे) शरीर-सञ्चालन रूप यज्ञ के कर्ता, (सुखादये) रोग आदियों को पूर्णतः खा जानेवाले (तवसे) शरीर से वृद्धिशील, (भन्ददिष्टये) सुखजनक शतायुष्य रूप इष्टि को करनेवाले, (धुनिव्रताय) शारीरिक और मानसिक दोषों को कंपित करनेवाले कर्म से युक्त (शवसे) बलवान् (शर्धाय) प्राणबल को पाने के लिए भी, तुम्हारी बुद्धियाँ वा वाणियाँ (प्र प्र यन्तु) प्रकृष्ट रूप से प्रवृत्त हों ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे राष्ट्रवासियो ! (महे) महान् (मरुत्वते) प्रशस्त योद्धा सैनिकों से युक्त (विष्णवे) यानों द्वारा जल, स्थल, अन्तरिक्ष तीनों स्थानों में व्याप्त होनेवाले राजा के लिए (वः) तुम्हारी (मतयः) वाणियाँ (प्र यन्तु) प्रवृत्त हों, जो राजा (गिरिजाः) पर्वततुल्य सर्वोच्च पद पर अभिषिक्त और (एवया-मरुत्) वेगवान् सैनिकोंवाला है। और (यज्यवे) राष्ट्ररक्षा-रूप यज्ञ के अनुष्ठाता, (सुखादये) उत्कृष्ट पादत्राणों और हस्तत्राणों से युक्त, (तवसे) गतिमान्, कर्मण्य, (भन्ददिष्टये) संग्रामरूप यज्ञ से सुख पानेवाले, (धुनिव्रताय) शत्रुप्रकम्पक कर्मोंवाले, (शवसे) बलवान् (शर्धाय) वीर योद्धाओं के सैन्य के लिए भी, तुम्हारी वाणियाँ (प्र प्र यन्तु) अतिशय प्रवृत्त हों, अर्थात् तुम राजा की तथा उसके सैन्यगण की प्रशंसा करो और उन्हें उत्तम उद्बोधन दो ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥६॥
भावार्थ
मनुष्य जब प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक दोषों को जलाकर आत्मिक बल बढ़ाते हैं, तब सब सिद्धियाँ उन्हें हस्तगत हो जाती हैं। वैसे ही राष्ट्र के वीर सैनिक सब शत्रुओं को कँपा कर जब राजा के बल को बढ़ाते हैं, तब राष्ट्र में सब उन्नतियाँ भासित होने लगती हैं ॥६॥
पदार्थ
(मरुत्वते) अज्ञानवासनामारक गुण वाले—(एवयामरुत्) गतिशीलता से अज्ञानवासना-मारक—“सुपां सुलुक्....” [अष्टा॰ ७.३.३०] चतुर्थ्या लुक् (प्रशर्द्धाय) प्रकृष्ट महान्—(प्रयज्यवे) प्रकृष्ट सृष्टियज्ञ करने वाले—(सुखादये) सुष्ठुखाद—महान् भोजन वाले—(भन्ददिष्टये) अर्चना इष्टि जिसकी है ऐसे—“भदन्ते-अर्चनाकर्मा” [निघं॰ ३.१४] (महे शवसे) महान् प्रभावक—(विष्णवे) व्यापक परमात्मा के लिये (वः) हमारी ‘पुरुषव्यत्ययः’ (गिरिजाः) वाणी में होने वाली (मतयः) स्तुतियाँ (प्रयन्तु) प्राप्त हों।
भावार्थ
अज्ञान वासनाओं को मार देने वाले गुणों व्याप्तियों वाले प्रकृष्ट महान् समष्टि के याजक सुभोग प्रदाता बलवान् अर्चना ही इष्टि है जिसकी ऐसे महान् व्यापक परमात्मा के लिये पापनाशनार्थ हमारी निरन्तर स्तुतियाँ प्राप्त होती रहें॥६॥
विशेष
ऋषिः—एवया मरुत् (‘एवं गमनशीलं याति प्राप्नोतीति एवया मरुत्’ गमनशील को प्राप्त होने वाला—अति प्रगतिशील वासनाओं को मार देने वाला उपासक)॥ देवताः—मरुतः (अज्ञान वासनाओं को मारने वाले परमात्मगुण)॥<br>
विषय
दशकं धर्मलक्षणम्
पदार्थ
प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि ‘एवयामरुत आत्रेय' है। [एव=लक्ष्य, या=जाना, मरुत= मनुष्य] इसका अर्थ है ‘लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़नेवाला मनुष्य जोकि [अ+त्रि] काम-क्रोध-लोभादि तीनों वासनाओं से परे हैं, अतएव आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक इन सभी तापों से ऊपर उठा हुआ है। वस्तुतः लक्ष्यभ्रष्ट व्यक्ति ही त्रिविध वासनाओं का शिकार होता जै और उनसे सन्तप्त होता है ।
प्रस्तुत मन्त्र में मानव जीवन का लक्ष्य दस शब्दों के अन्दर वर्णित हुआ है। प्रभु कहते हैं कि (एवयामरुत्) = लक्ष्य की ओर चलनेवाले मनुष्य (वः) = तुम्हारी (मतयः) = बुद्धियाँ जोकि (गिरिजाः) = वेदवाणियों में उत्पन्न हुई हैं अर्थात् ज्ञानमूलक हैं, वे प्रयन्तु-प्रकर्षेण चलें। किस ओर -
१. (महे) = [मह पूजायाम् ] पूजा के लिए | मनुष्य में बड़ों के आदर की भावना हो । पाँच वर्ष तक वह ‘मातृदेव' बने, आठ वर्ष तक 'पितृदेव', पच्चीस वर्ष तक 'आचार्यदेव' पचास वर्ष तक ‘अतिथिदेव' और आगे 'परमात्मदेव'। यही इस विस्तृत जीवन की 'पञ्चायतन पूजा' है। पूजा ही जीवन-यज्ञ का प्रारम्भ है।
२. (विष्णवे) = [विष् व्याप्तौ] व्यापकता के लिए । मनुष्य का हृदय विशाल हो । विशालता में ही धर्म है, उदार धर्म है, अनुदार अधर्म है। विशालता में पवित्रता है, संकोच में अपवित्रता।
३.( मरुत्वते) = मरुत्वान् बनने के लिए। (मरुतः प्राणा:) = प्राणवान् बनना आवश्यक है। (‘एवा मे प्राण मा बिभेः') इस मन्त्रभाग से स्पष्ट है कि प्राणों के साथ निर्भीकता का सम्बन्ध है। दैवी संपत्ति का प्रारम्भ निर्भीकता से ही होता है। प्राण - शक्तिसम्पन्न पुरुष ही अनथक होकर लोकहित में लगा रह सकता है।
४. (प्रशर्धाय) = उत्कृष्ट बल के लिए। हमें उत्कृष्ट आध्यात्मिक बल प्राप्त करना है। दिव्य शक्ति की प्राप्ति तो हमारे जीवन का लक्ष्य ही होना चाहिए।
५. (प्रयज्यवे) = प्रयज्यु बनने के लिए। शक्ति प्राप्त करके हम ‘यज्यु’ बनें। हमारी शक्ति का विनियोग यज्ञों में हो। यज्ञ की मौलिक भावना ‘अध्वर’—हिंसारहित कर्म करें। हमारे कर्मों में हिंसा की गन्ध न हो।
६. (सुखादये) = उत्तम सात्विक आहार के लिए | सात्त्विक भोजन से हमारी बुद्धि सात्त्विक होगी और उसका विनियोग यज्ञों ही में होगा। 'खादि' का अर्थ आभूषण भी है, हम उत्तम आभूषणवाले हों। सर्वोत्तम आभूषण 'विद्या' है। हमारा जीवन उससे अलंकृत हो।
७. (तवसे) = बल के लिए। इस सात्त्विक भोजन व ज्ञान से हमें वह शक्ति प्राप्त होगी- क्या शरीर में और क्या मस्तिष्क मे जो हमारी [तु वृद्धौ] वृद्धि का ही कारण बनेगी।
८. (भन्दद् इष्टये) = [भदि कल्याणे] कल्याण चाहनेवाली इच्छा के लिए। हम शक्तिशाली बनकर कभी किसी का अकल्याण चाहनेवाले न हो।
९. (धुनिव्रताय) = 'दस्युओं को कम्पित करने के व्रत के लिए। समाज का कल्याण चाहते हुए हम समाज से दस्युओं को दूर करने का व्रत लें। हममें उनके दस्युत्व को समाप्त करने की भावना हो।
१०. (शबसे) = [शव गतौ], गतिशीलता के लिए। हममें गतिशीलता हो, क्योंकि अकर्मण्यता से तो कुछ भी साध्य नहीं 'कर्मशीलता ही जीवन है' इस तत्त्व को हम समझें।
भावार्थ
मैं एवयामरुत बनूँ - यह 'दशक' मेरे जीवन का लक्ष्य हो । इसे मैं जीवन में अनूदित करूँ।
विषय
"Missing"
भावार्थ
भा० = जिस प्रकार ( मरुत्वते ) = पवनों वाले मेघ के लिये ( गिरिजा:) = बिजुलियां चलती हैं। उसी प्रकार ( वः मतयः ) = आपकी बुद्धियां या स्तुतियां ( गिरिजा: ) = बड़े मस्तक वाले विद्वान् प्रवक्ताओं से उत्पन्न हुई हुई ( महे ) = बड़े ( मरुत्वते ) = वायुओं और प्राणों के बलों से युक्त, या प्रजाओं से युक्त , ( विष्णवे ) = व्यापक जगदीश्वर को ( यन्तु ) = पहुँचे । ( एवयामरुत् ) = और प्राणों को चलानेवाला मुख्य प्राणस्वरूप आत्मा भी उसी ( शर्धाय ) = बलवान् , ( यज्यवे ) = जीवनयज्ञ के सम्पादक, ( सुखादये ) = उत्तम आयुधों से भूषित ( तवसे ) = वीर्यवान् ( भंदद् -इष्टये ) = कल्याणकारी यज्ञ के पात्र ( धुनि-व्रताय ) = सब को कम्पन करने वाले, कर्म करनेहारे ( शवसे ) = बल स्वरूप उस ईश्वर के ( प्र यातु ) = खोज में प्रवृत्त होजायँ ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - एवयामरुत् ।
देवता - मरुतः।
छन्दः - अतिजगती।
स्वरः - निषादः।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ मरुतो देवताः। विष्णोर्मरुतां च साहाय्येनात्मिकं राष्ट्रियं चोत्कर्षं प्राप्तुं प्रेरयति।
पदार्थः
प्रथमः—अध्यात्मपरः। हे सखायः ! (महे) महते, (मरुत्वते) प्राणवते (विष्णवे) सर्वस्मिन् शरीरे व्याप्तक्रियाय जीवात्मना जीवात्मनः प्रोत्साहनायेत्यर्थः (वः) युष्माकम् (मतयः) बुद्धयः वाचो वा। वाग् वै मतिः। श० ८।१।२।७। (प्र यन्तु) प्रवर्तन्ताम्, यः विष्णुः जीवात्मा (गिरिजाः) गिरौ पर्वतवद् विद्यमाने देहे गृहीतजन्मा, (एवयामरुत्) वेगवत्प्राणश्च वर्तते। एवेन वेगेन यान्तीति एवयाः। एवयाः वेगगामिनः मरुतः प्राणाः सहचराः यस्य स एवयामरुत्। किञ्च, (यज्यवे) शरीरसञ्चालनरूपयज्ञकर्त्रे, (सुखादये) रोगादीनां सुभक्षकाय, (तवसे) शरीरेण वृद्धिशीलाय। तौति वर्द्धते इति तवाः तस्मै। तु गतिवृद्धिहिंसासु सौत्रो धातुः, तत औणादिकः असुन् प्रत्ययः. (भन्ददिष्टये) भन्दन्ती सुखयन्ती इष्टिः शतसंवत्सरजीवनरूपा यस्मात् तस्मै, (धुनिव्रताय) धुनि शारीरमानसदोषप्रकम्पकं व्रतं कर्म यस्य तस्मै, (शवसे) बलवते (शर्धाय) मारुताय गणाय प्राणसमूहाय। शृधु प्रसहने चुरादिः, शर्धयति प्रसहते इति शर्धः तस्मै। वः मतयः बुद्धयो वाचो वा (प्र प्र) प्र यन्तु, प्र यन्तु, प्रकर्षेण प्रवर्तन्ताम् ॥ अथ द्वितीयः—राष्ट्रपरः। हे राष्ट्रवासिनः ! (महे) महते, (मरुत्वते) प्रशस्ताः मरुतः योद्धारः सैनिकाः अस्य सन्तीति तस्मै (विष्णवे) त्रिविक्रमाय जलस्थलाकाशगामिने नृपतये, तं स्तोतुं बोधयितुं वा (वः) युष्माकम् (मतयः) वाचः (प्र यन्तु) प्रवर्तन्ताम्, यः विष्णुः नृपतिः (गिरिजाः) पर्वतवद् राष्ट्रस्य सर्वोन्नते पदेऽभिषिक्तः (एवयामरुत्) वेगवत्सैनिकश्च वर्तते। किञ्च, (यज्यवे) राष्ट्ररक्षायज्ञस्य अनुष्ठात्रे, (सुखादये) उत्कृष्टाः खादयः पादत्राणाः हस्तत्राणाश्च यस्य तस्मै। अंसे॑षु व ऋ॒ष्टयः॑ प॒त्सु खा॒दयः॒। ऋ० ५।५४।११, हस्ते॑षु खा॒दिश्च॑ कृ॒तिश्च॒ संद॑धे। ऋ० १।१६८।३ इति श्रुतिः। (तवसे) गतिमते, कर्मण्याय। तवतेर्गतिकर्मणः। असुन्। (भन्ददिष्टये) भन्दन्ती सुखयित्री इष्टिः संग्रामरूपा यस्य तस्मै, (धुनिव्रताय) शत्रुप्रकम्पककर्मणे, (शवसे) बलवते (शर्धाय) मारुताय वीरभटानां सैन्याय, वः मतयः वाचः (प्र प्र) अतिशयने प्रवर्तन्ताम्। यूयं विष्णुं राजानं तदीयं सैन्यगणं च प्रशंसत प्रोद्बोधयत चेत्यर्थः ॥२ क्री॒ळं वः॒ शर्धो॒ मारु॑तमनर्वा॒णं॑ रथे॒शुभ॑म्। कण्वा॑ अ॒भिप्रगा॑यत ॥ ऋ० १।३७।१, प्र वः॒ शर्धा॑य॒ धृष्व॑ये त्वे॒षद्यु॑म्नाय शु॒ष्मिणे॑। दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत ॥ ऋ० १।३७।४ इत्यादिवचनात् शर्धशब्देन मारुतो गण उच्यते। ते क्री॒डयो॒ धुन॑यो॒ भ्राज॑दृष्टयः स्व॒यं म॑हि॒त्वं प॑नयन्त॒ धूत॑यः ॥ ऋ० १।८७।३ इति वचनाच्च मरुतां धुनिव्रतत्वम् ॥६॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥६॥
भावार्थः
मनुष्या यदा प्राणायामेन शारीरं मानसं च मलं दग्ध्वाऽऽत्मबलं वर्द्धयन्ति तदा सर्वाः सिद्धयस्तेषां हस्तगता भवन्ति। तथैव राष्ट्रस्य वीरसैनिकाः सर्वान् रिपून् प्रकम्प्य यदा राजबलं वर्द्धयन्ति तदा राष्ट्रे सर्वा उन्नतयो विभासन्ते ॥६॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ५।८७।१। २. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमम् ‘अथ मनुष्यान् कथं किं प्राप्नोति’ इति विषये व्याख्यातवान्।
इंग्लिश (2)
Meaning
Just as lightings flash for the cloud, so should your praises, born of learned orators, be offered to the Omnipresent, Mighty God, the Master of myriads of subjects. O Know of the Vedas! the encyclopaedia of knowledge, absorb yourself in search after God, Almighty, the Accomplisher of life’s journey. Equipped with efficient resources. Vital, Worthy of homage, the Great Actor, and the Embodiment of strength.
Meaning
O vibrant man of vision, all ye men and women, let all your songs and flights of thought and vision born of the voice of the heart reach Vishnu, all pervasive lord, commander of the winds and warriors, indomitable, highly majestic, adorable and cooperative, blissfully appreciative, relentlessly active and absolute in justice and power. (Rg. 5-87-1)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (मरुत्वते) અજ્ઞાન-વાસના મારક ગુણવાળા (एवयामरुत्) ગતિશીલતાથી અજ્ઞાન-વાસના મારક, (प्रशर्द्धाय) પ્રકૃષ્ટ મહાન, (प्रयज्यवे) પ્રકૃષ્ટ સૃષ્ટિયજ્ઞ કરનાર, (सुखादये) મહાન ભોજનવાળા, (भन्दविष्टये) જેની અર્ચના યજ્ઞ છે. એવા; (महे शवसे) મહાન પ્રભાવક, (विष्णवे) વ્યાપક પરમાત્માને માટે (वः) અમારી (गिरजाः) વાણીમાં થનારી (मतयः) સ્તુતિઓ (प्रयन्तु) પ્રાપ્ત થાય. (૬)
भावार्थ
ભાવાર્થ : અજ્ઞાન અને વાસનાઓના નાશક ગુણો વ્યાપ્તિઓવાળા, પ્રકૃષ્ટ મહાન સૃષ્ટિના યજ્ઞ કર્તા, શ્રેષ્ઠ ભોગ પ્રદાતા, બળવાન અર્ચનાનો યજ્ઞ જેના છે, એવા મહાન પરમાત્માને માટે, પાપનો નાશ કરવા માટે અમારી નિરંતર સ્તુતિઓ થતી રહે. (૬)
उर्दू (1)
Mazmoon
وُہ ہی پرمیشور کی پراپتی یوگیہ ہوتا ہے!
Lafzi Maana
جو پرمیشور مہان ہے، ہر جگہ موجود ہے، پرانوں کا سوامی ہے، سُکھوں کا سرچشمہ اور بھگتی اُپاسنا پر پرسن ہوتا ہے۔ آپ گتی سوروپ اور ہم کو گتی دے کر بڑھاتا ہے، ہماری منو کامناؤں کی پُورتی کراتا ہے اور بُرائیاں جس سے کانپتی ہیں، ایسا جو طاقتوں کا مخزن ہے، اُس کی طرف ہی ہمارے من سدا لگے رہیں، ایسا وید کرم جو کرتا ہے۔ وید بانیوں میں سدا رمن کرتا ہے، وہ عابد اُپاسک اُس پرمیشور کی پراپتی کے یوگیہ ہو جاتا ہے۔
Tashree
ہر جگہ موجود ہے سُکھوں کا سرچشمہ ہے جو، اُس میں ہمارا من لگے بل شکتی کا منبع ہے جو۔
मराठी (2)
भावार्थ
माणसे जेव्हा प्राणायामाने शारीरिक व मानसिक दोषांना जाळून आत्मिक बल वाढवितात तेव्हा सर्व सिद्धी त्यांना हस्तगत होतात, तसेच राष्ट्राचे वीर सैनिक सर्व शत्रूंना कंपित करून जेव्हा राज्याचे बल वाढवितात तेव्हा राष्ट्रात सर्व प्रकारची उन्नती होते. ॥६॥
विषय
अनेक मरुत देवता। विष्णु आणि मरुत यांच्या साह्याने आत्मिक व राष्ट्रीय उत्कर्ष प्राप्त करण्याविषयी -
शब्दार्थ
(प्रथम अर्थ) (अध्यात्म पक्ष) - हे बंधूंनो, त्या (महे) महान (मरुत्वते) प्राणवान (विष्णवे) साऱ्या शरीरात व्याप्त होऊन क्रिया करणाऱ्या जीवात्म्याला प्रोत्साहन देण्यासाठी (वः) तुमची (मतयः) बुद्धी अथवा तुमची वाणी (प्र यन्तु) प्रसृत व्हावी (बुद्धी व वाणीने तुम्ही आपली आत्मिक शक्ती वाढवा) हा जीवात्मा (गिरिजाः) पर्वतासारख्या दृढ शरीरात आलेला वा जन्म घेतलेला असून (एवयामकत्) वेगवान प्राणशक्ती धारण करीत आहे. (यज्यवे) शरीर संचालन रूप यज्ञ करणाऱ्या आणि (सुखादवे) रोज आदींना पूर्णपणे खाऊन टाकणाऱ्या (तवसे) शारीरिक शक्तीने संपन्न (या जीवात्म्याला तुम्ही वाणी, बुद्धीने उत्साहित करा) प्राणशक्ती (मन्ददिष्टये) सुखमय शंभर वर्षाचे आयुष्य रूप यज्ञ करणारी (धुनिव्रताय) शारीरिक व मानसिक दोष कंपित करणारी (शवसे) असून अशा बलवती (शर्घाय) प्राणशक्ती प्राप्त करण्यासाठी देखील तुमची बुद्धी व वाणी (प्र प्र यन्तु) प्रवृत्त व्हावी (वाणी व बुद्धीद्वारे तुम्ही प्राणादी वायूंची शक्ती वाढवा.)।। द्वितीय अर्थ - (राष्ट्र पक्ष) बंधूनो, (महे) महान (मकत्वते) शूर योद्धा सैनिकांच्या सैन्याचा स्वामी व (विष्णवे) यानांद्वारे जल, स्थल व अंतरिक्ष या तिन्ही स्थानांपर्यंत व्याप्ती असलेल्या या राजाकरिता (वः) तुमच्या (मतयः) वाणी (प्र यन्तु) प्रवृत्त व्हाव्यात. (तुम्ही त्याची प्रशंसा करा). तो राजा (गिरिजाः) पर्वतसम सर्वोच्च पदावर अभिषिक्त असून (एवयामकत्) वेगवान सैनिकांचा संचालक आहे. तसेच तो (यज्ववे) राष्ट्र - रक्षारूप यज्ञ करण्यात व्यस्त आणि (सुखादये) उत्कृष्ट पादत्राण आणि हस्तत्राणांनी अशा (तवसे) गतिमान, कर्मथ (सैनिकांसाठीदेखील तुमची वाणी प्रवृत्त व्हावी. कारण त्या सैनिकांना (मन्ददिष्ट्ये) संग्रामरूप यज्ञात खरे सुख मिळते (धुनिव्रताथ) ते शत्रूला प्रकम्पित करणारे आहेत, अशा (शवसे) बलवान (शर्धाय) वीर योद्धा सैन्यासाठीदेखील तुमची वाणी (प्र प्र यन्तु) अधिकाधिक प्रवृत्त होऊ द्या. म्हणजे तुम्ही चांगल्या कामगिरीबद्दल राजाची आणि त्याच्या सैन्याची प्रशंसा करीत चला, तसेच त्यांना योग्य वेळी उत्साह देत जा.।। ६।।
भावार्थ
जेव्हा लोक प्राणायामाद्वारे शारीरिक व मानसिक दोष भस्म करून आत्मिक बळ वाढवतात, तेव्हा त्यांना सर्व सिद्धी हस्तगत होतात. त्याचप्रमाणे राष्ट्राचे वीर सैनिक जेव्हा शत्रूला प्रकम्पित करून राजाची शक्ती वाढवतात, तेव्हा राष्ट्राची सर्व दृष्ट्या उन्नती घडून येते.।। ६।।
विशेष
या मंत्रात श्लेष अलंकार आहे.।। ६।।
तमिल (1)
Word Meaning
மகத்தாய மருத்துக்களுடன் தொடரும் விஷ்ணுவிற்கு கானத்தில் பிறந்த எங்கள் அறிவுகள் துதிகள் [1]ஏவயாமருதனே! செல்லட்டும்; பலமுடனான மருத்திற்கு வன்மையுடன் சோபன ஆபரணங்களுடனான, மங்கள நிலயனுக்கு எதையும் செய்யும் பலவானுக்கு துதிகள் செல்லட்டும்.
FootNotes
[1]ஏவயாமருதனே- முதன்மையானப் பிராணனே.
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