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सामवेद के मन्त्र

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  • सामवेद - मन्त्रसंख्या 463
    ऋषिः - अनानतः पारुच्छेपिः देवता - पवमानः सोमः छन्दः - अत्यष्टिः स्वरः - गान्धारः काण्ड नाम - ऐन्द्रं काण्डम्
    37

    अ꣣या꣢ रु꣣चा꣡ हरि꣢꣯ण्या पुना꣣नो꣢꣫ विश्वा꣣ द्वे꣡षा꣢ꣳसि तरति स꣣यु꣡ग्व꣢भिः꣣ सू꣢रो꣣ न꣢ स꣣यु꣡ग्व꣢भिः । धा꣡रा꣢ पृ꣣ष्ठ꣡स्य꣢ रोचते पुना꣣नो꣡ अ꣢रु꣣षो꣡ हरिः꣢꣯ । वि꣢श्वा꣣ य꣢द्रू꣣पा꣡ प꣢रि꣣या꣡स्यृक्व꣢꣯भिः स꣣प्ता꣡स्ये꣢भि꣣रृ꣡क्व꣢भिः ॥४६३॥

    स्वर सहित पद पाठ

    अ꣣या꣢ । रु꣣चा꣢ । ह꣡रि꣢꣯ण्या । पुना꣣नः꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । द्वे꣡षाँ꣢꣯सि । त꣣रति । स꣣युग्व꣢भिः꣣ । स । यु꣡ग्व꣢꣯भिः । सू꣡रः꣢꣯ । न । स꣣यु꣡ग्व꣢भिः । स꣣ । यु꣡ग्व꣢꣯भिः । धा꣡रा꣢꣯ । पृ꣣ष्ठ꣡स्य꣢ । रो꣣चते । पुनानः꣢ । अ꣣रु꣢षः । ह꣡रिः꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯ । यत् । रू꣣पा꣢ । प꣣रिया꣡सि꣢ । प꣣रि । या꣡सि꣢꣯ । ऋ꣡क्व꣢꣯भिः । स꣣प्ता꣡स्ये꣢भिः । स꣣प्त꣢ । आ꣣स्येभिः । ऋ꣡क्व꣢꣯भिः ॥४६३॥


    स्वर रहित मन्त्र

    अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषाꣳसि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः । धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः । विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिरृक्वभिः ॥४६३॥


    स्वर रहित पद पाठ

    अया । रुचा । हरिण्या । पुनानः । विश्वा । द्वेषाँसि । तरति । सयुग्वभिः । स । युग्वभिः । सूरः । न । सयुग्वभिः । स । युग्वभिः । धारा । पृष्ठस्य । रोचते । पुनानः । अरुषः । हरिः । विश्वा । यत् । रूपा । परियासि । परि । यासि । ऋक्वभिः । सप्तास्येभिः । सप्त । आस्येभिः । ऋक्वभिः ॥४६३॥

    सामवेद - मन्त्र संख्या : 463
    (कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 5; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 3; मन्त्र » 7
    (राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 4; खण्ड » 12;
    Acknowledgment

    हिन्दी (4)

    विषय

    अगले मन्त्र का देवता पवमान सोम है। सूर्य के उपमान से आत्मा का वर्णन किया गया है।

    पदार्थ

    यह सोम अर्थात् इन्द्रियों को कर्मों में प्रेरित करनेवाला आत्मा (अया) इस (हरिण्या) हृदयहारिणी (रुचा) तेजस्विता से (पुनानः) पवित्रता देता हुआ (सयुग्वभिः) साथ नियुक्त होनेवाले प्राणों के साथ मिलकर (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषी विघ्नों अथवा काम, क्रोध आदि छहों रिपुओं को (तरति) पार कर लेता है, (सूरः न) जैसे सूर्य(सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब शत्रुभूत अन्धकारों को (तरति) पार करता है। (पृष्ठस्य) प्रकाशसेचक आत्मारूप सोम की (धारा) प्रकाश-धारा (रोचते) भासित होती है। (अरुषः) तेज से आरोचमान (हरिः) पापहारी तू आत्मारूप सोम (पुनानः) मन, बुद्धि आदि को पवित्र करता है, (यत्) जबकि तू (ऋक्वभिः) प्रशस्तस्तुतियुक्त कर्मों के साथ, और (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय (सप्तास्यैः) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इन सप्तमुख प्राणों के साथ (विश्वा रूपा) सब रूपधारी मनुष्यों को (परियासि) प्राप्त होता है ॥ यहाँ ‘सूरो न सयुग्वभिः’ द्वारा सूर्य को उपमान बनाने से शेष मन्त्र सूर्य के पक्ष में भी घटता है। कैसा सूर्य? जो (अया) इस (हरिण्या) तमोहारिणी (रुचा) दीप्ति से (पुनानः) भूमि को पवित्र करता हुआ (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणों से (विश्वा द्वेषांसि) सब द्वेषकारी अन्धकार, रोग आदियों को (तरति) निवारण करता है, (पृष्ठस्य) वृष्टिकर्ता जिस सूर्य की (धारा) प्रकाशधारा या वृष्टिधारा (रोचते) चमकती है, जो (अरुषः) तेजस्वी रूपवाला (हरिः) आकर्षण-बल से पृथिवी आदि लोकों का धारणकर्ता सूर्य (पुनानः) पवित्रता देता है, (यत्) जबकि (सप्तास्येभिः) सात मुखों अर्थात् रंगोंवाली (ऋक्वभिः) प्रशंसनीय किरणों से (विश्वा रूपाणि) सब रूपवान् वस्तुओं को (परियासि) प्राप्त होता है ॥७॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। ‘सयुग्वभिः’ और ‘ऋक्वभिः’ की एक-एक बार आवृत्ति में यमक है ॥७॥

    भावार्थ

    जैसे सूर्य अपनी किरणों से रोग, मलिनता आदि को दूर कर समस्त भूमण्डल को पवित्र करता है, वैसे ही मनुष्यों का आत्मा सब पाप, द्वेष आदि कल्मषों को दूर कर जीवन को पवित्र करे ॥७॥

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    पदार्थ

    (अनया रुचा) इस रुचिर—(हरिण्या) आहरण करने वाली—हृदय में ले आने वाली स्तुति से (पुनानः) आनन्दधारा में प्राप्त होता हुआ परमात्मा “पवते गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४] (विश्वा द्वेषांसि) उपासक की सारी द्वेष भावनाओं को (सयुग्भिः) साथ युक्त शक्तियों से (तरति) तर जाता है—नष्ट करता है (सूरः-न सयुग्भिः) जैसे सूर्य अपनी रश्मियों से अन्धकार को संसार से हटाता है—नष्ट करता है (पृष्ठस्य धारा रोचते) तब परमात्मा से स्पृष्ट—स्पर्श—सम्पर्क को प्राप्त हुए “पृष्ठं स्पृशतेः” [निरु॰ ४.३] हृदयस्थ उपासक आत्मा की “आत्मा वै पृष्ठानि” [कौ॰ २५.१२] चेतनाशक्ति प्रकाशमान हो जाती है (अरुषः-हरिः) प्रकाशमान दुःखापहरणकर्ता परमात्मा (यत्-विश्वा रूपा-ऋक्वभिः) यतः स्तुतियों से उपासक आत्मा के सब रूपों—रुचियों को “रूपं रोचतेः” [निरु॰ ३.१३] या निरूपणीय भावनाओं, आशाओं, कामनाओं को (परियासि) परिप्राप्त होता है—परिपूर्ण करता है (सप्तास्येभिः-ऋक्वभिः) जैसे ज्योतियों वाली “ज्योति-स्तदृक्” [जै॰ १.७६] सात आस्य—मुख—जिह्वा—ज्वालारूप किरणों से सब वस्तुओं को ‘परिप्राप्त होता है।’

    भावार्थ

    हृदय में ले जानेवाली स्तुति से आनन्दधारा में प्राप्त होता हुआ परमात्मा उपासक की सारी द्वेषभावनाओं को अपनी व्यापिनी दिव्य शक्तियों से नष्ट कर देता है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से संसार के अन्धकार को नष्ट कर देता है, परमात्मा से सम्पर्क—समागम को प्राप्त हुए उपासक आत्मा की चेतनशक्ति प्रकाशमान हो जाती है। प्रकाशमान परमात्मा दुःखापहरणकर्ता सुखाहरणकर्ता स्तुतियों द्वारा उपासक की रुचिकर भावना कामनाओं आशाओं को परिप्राप्त होता है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से सब वस्तुओं को परिप्राप्त होता है॥७॥

    विशेष

    ऋषिः—अनानतः पारुच्छेपिः (पापों में न झुकने वाला अवसर पर ज्ञानस्पर्श में अत्यन्त समर्थ)॥ देवताः—पवमानः सोमः (आनन्दधारा में प्राप्त होने वाला परमात्मा)॥ छन्दः—अत्यष्टिः॥<br>

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    विषय

    अ-पिशुनता [No back biting ]

    पदार्थ

    जब मनुष्य धर्म के दस लक्षणों से युक्त होता है तो उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की कान्ति होती है। उस कान्ति से वह औरों पर भी एक विशेष प्रभाव डालता है और उनके जीवन को पवित्र करता है। (अया रुचा) = इस कान्ति से, (हरिण्या) = जोकि सबकी दुर्भावनाओं का हरण करनेवाली है; अतएव (पुनान:) = उनके जीवनों को पवित्र करती है, यह (सयुग्वभिः) = मेल की–प्रेम की वृत्तियों से (विश्वा द्वेषांसि तरति) = सब द्वेषों को तैर जाता है । वस्तुत: ही (सूरो न) = एक विद्वान् – समझदार मनुष्य की भाँति (सयुग्वभिः) = मेल व प्रेम की वृत्तियों से यह इस संसार में चलता है।

    इसके जीवन की सबसे सुन्दर बात यह है कि इसे (पृष्ठस्य धारा) = पीठ पीछे धारणात्मक बातें—न कि निन्दा की चर्चाएँ (रोचते) = रुचिकर होती हैं ।

    औरों की निन्दा न करता हुआ यह (पुनान:) = अपने जीवन को पवित्र रखता है, (अरुषः) = कभी क्रोध नहीं करता, (हरिः) = औरों के दुःखों के हरण में सदा प्रयत्नशील रहता है।
    यह (विश्वा रूपा) = सब व्यक्तियों के प्रति [रूप=व्यक्ति, रूपाणि पशवः] (ऋक्वभिः) = सूक्तों से मधुर भाषणों से (परियसि) = जाता है। (सप्तास्येभि ऋक्वेभिः) = उन मधुर भाषणों से जोकि -

    मेल की बातों को परितः प्रक्षिप्त करते हैं [षप् समवाये, अस् क्षेपणे] इसकी वाणी में माधुर्य होता है-इसकी वाणी मेल की बातें करती हैं।

    इस प्रकार इसका जीवन नम्रता से परिपूर्ण, माधुर्यमय, कठोरता से शून्य होता है, परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि यह अशक्त होता है । यह (अनानतः) = अन्याय से कभी भी दबनेवाला नहीं होता, (पारुच्छेपिः) = अङ्ग-प्रत्यङ्ग में शक्ति से पूर्ण होता है। शक्ति के साथ माधुर्य इसके जीवन को बड़ा ही सुन्दर बना देता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कभी भी पीठ पीछे किसी की निन्दा नहीं करता । 

    भावार्थ

    अपिशुनता समाज को अत्यन्त सुन्दर बनानेवाली है।

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    विषय

    "Missing"

    भावार्थ

    भा० = ( सयुग्वभिः ) = साथ योग देनेहारे सहायकों द्वारा ( सूरः न ) = जिस प्रकार प्रेरक नेता ( विश्वा द्वेषांसि तरति ) = सब शत्रुओं को तर जाता है उसी प्रकार ( सयुग्वभिः ) = अपने सहायक इन्द्रियगणों, अश्वों, योगसाधनों द्वारा ( सूरः ) = सबका प्रेरक, विद्वान्, सूर्य के समान तेजस्वी ( हरिः ) = गतिशील आत्मा ( अया ) = इस ( हरिण्या ) = अज्ञान हरने वाली ( रुचा ) = ज्योति से ( पुनानः ) = मल आदि का परिशोधन करता हुआ ( विश्वा द्वेषांसि ) = सब प्रकार के विरोधियों को ( तरति ) = पार कर जाता है। उस ( पृष्ठस्य ) = सबके धारण करने हारे सोम की ( धारा ) = धारण पोषण करनेहारी शक्ति ( रोचते ) = सर्वत्र प्रकाशित होती है । वह ( हरि: ) = सर्वव्यापक, सर्वदुःखहारक, ( अरुषः ) = सर्व प्रकार से प्रकाशमान, ( पुनानः ) = सबको प्रेरित करता हुआ, ( यद् ) = जो वह ( विश्वा रूपा ) = सब पदार्थों या आकाशस्थ पिण्डों को ( ऋक्वाभिः ) = प्रकाश ज्ञानयुक्त ( सप्तास्येभिः ) = शिरोगत सप्त प्राणों, ज्ञानेन्द्रियों द्वारा या विशाल ब्रह्माण्ड में सब नक्षत्रों को चलाने हारे सात महावायुओं द्वारा ( परि यासि ) = घेरे बैठा है, व्यापक है।

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    ऋषिः - अनानतः पारुच्छेपिः।

    देवता - पवमानः।

    छन्दः - अत्यष्टिः।

    स्वरः - गान्धारः। 

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    संस्कृत (1)

    विषयः

    अथ पवमानो देवता। सूर्योपमानेन जीवात्मरूपं सोमं वर्णयति।

    पदार्थः

    एष सोमः इन्द्रियादीनां कर्मसु प्रेरकः आत्मा (अया) अनया (हरिण्या) हृदयहारिण्या (रुचा) कान्त्या (पुनानः) पवित्रतामापादयन् (सयुग्वभिः) सह युज्यमानैः प्राणैः सह संमिल्य (विश्वा द्वेषांसि) समस्तानि द्वेष्टॄणि कामक्रोधादिरिपुजातानि (तरति) अतिक्रामति, (सूरः न) यथा सूर्यः (सयुग्वभिः) सहयोगिभिः किरणैः (विश्वा द्वेषांसि) समस्तानि शत्रुभूतानि तमांसि (तरति) अतिक्रामति तद्वत्। (पृष्ठस्य) प्रकाशसेचकस्य आत्मरूपस्य सोमस्य। पृषु सेचने धातोः औणादिकः थक् प्रत्ययः। (धारा) प्रकाशधारा (रोचते) भासते। (अरुषः) तेजसा आरोचमानः। अरुष इति रूपनाम। निघं० ३।७। ततो मत्वर्थे अच् प्रत्ययः। (हरिः) पापहर्ता आत्मरूपः सोमः त्वम् (पुनानः) मनोबुद्ध्यादीन् पवित्रीकुर्वन्, भवसीति शेषः (यत्) यदा, त्वम् (ऋक्वभिः२) प्रशस्तस्तुतिमद्भिः कर्मभिः सह, (ऋक्वभिः३) प्रशंसनीयैः (सप्तास्येभिः) सप्तमुखैः प्राणैः सह। सप्तास्याः प्राणास्तु, पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि मनो बुद्धिश्च। सप्त वै शीर्षन् प्राणाः। ऐ० ब्रा० १।१७। (विश्वा रूपा) विश्वानि रूपाणि, रूपवतः सर्वान् मनुष्यान् (परि यासि) परिप्राप्नोषि, तदा पुनानो भवसीति ॥ अत्र ‘सूरो न सयुग्वभिः’ इति सूर्यस्योपमानत्वे शिष्टोऽपि मन्त्रः सूर्यपक्षे घटते। कीदृशः सूरः ? यः (अया) अनया (हरिण्या) तमोहारिण्या (रुचा) दीप्त्या (पुनानः) भुवं पवित्रीकुर्वन् (सयुग्वभिः) सहयोगिभिः किरणैः (विश्वा द्वेषांसि) समस्तानि द्वेष्टॄणि तमोरोगादीनि (तरति) अभिभवति, (पृष्ठस्य) वृष्टिकर्तुः यस्य सूर्यस्य (धारा) प्रकाशधारा वृष्टिधारा वा (रोचते) दीप्यते, यः (अरुषः) तेजस्विरूपः, आरोचमानः (हरिः) आकर्षणबलेन पृथिव्यादिलोकानां धर्ता सूर्यः (पुनानः) पावको भवति, (यत्) यदा (सप्तास्येभिः) सप्तमुखैः सप्तवर्णैरिति यावत् (ऋक्वभिः) प्रशंसनीयैः किरणैः (विश्वा रूपा) सर्वाणि रूपवन्ति वस्तूनि (परि यासि) परितो गच्छति ॥७॥ अत्र श्लिष्टोपमालङ्कारः। सयुग्वभिः ऋक्वभिः इत्यनयोः सकृदावृत्तौ च यमकम् ॥७॥

    भावार्थः

    यथा सूर्यः स्वकिरणै रोगमालिन्यादीन्यपहृत्य भूमण्डलं पुनाति, तथा मनुष्याणामात्मा सर्वाणि पापद्वेषादीनि कल्मषाणि संहृत्य जीवनं पुनातु ॥७॥

    टिप्पणीः

    १. ऋ० ९।१११।१, ‘स्वयुग्वभिः सूरो न स्वयुग्वभिः’, ‘धारा सुतस्य रोचते’, ‘परियात्यृक्वभिः’ इति पाठः। साम० १५९०। २. (ऋक्वभिः) प्रशस्ता ऋचः स्तुतयो विद्यन्ते येषु कर्मसु तैः इति ऋ० १।८७।६ भाष्ये द०। ३. ऋक्वभिः स्तोतृभिः, सप्तास्येभिः सप्त छन्दांसि आस्यभूतानि येषाम् ऋत्विजां ते सप्तास्याः...अथवा सप्त वषट्कारिणो होत्राः सप्तास्यानि, अथवा सप्त सोमसंस्थाः सप्तास्यानि ताभिः। ऋक्वभिः ऋत्विग्भिः—इति वि०। ऋक्वभिः स्तुत्यैः तेजोभिः, सप्तास्येभिः सर्पणशीलमुखैः—इति भ०। सप्तास्येभिः रसाहरणशीलास्यैः ऋक्वभिः स्तुतिमद्भिः ऋक्वभिः तेजोभिः—इति सा०।

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    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Just as an energetic leader, with his own allies, subdues all enemies, so an active, highly learned soul, with the help of Yogic practices, and this lustre of his, competent to remove ignorance, sweeping away the dirt of sin, overcomes all evil propensities. The sustaining and nourishing power of God is apparent everywhere. The All-Pervading, Refulgent, Impelling God, encompasses all globes in the atmosphere with seven vital, lustrous airs.

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    Meaning

    This Soma spirit of the fighting force of divinity, protecting and purifying by its own victorious lustre of innate powers, overcomes all forces of jealousy and enmity as the sun dispels all darkness with its own rays of light. The stream of its radiance, realised and purifying, shines beautiful and blissful. The lustrous saviour spirit which pervades all existent forms of the world, goes forward pure and purifying with seven notes of its exalting voice and seven rays of light and seven pranic energies expressive of its mighty force. (Rg. 9-111-1)

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    गुजराती (1)

    पदार्थ

    પદાર્થ : (अनया रुचा) એ રુચિર, (हरिण्या) આહરણ કરનારી-હૃદયમાં લાવનારી સ્તુતિ દ્વારા (पुनानः) આનંદધારામાં પ્રાપ્ત થતા પરમાત્મા (विश्वा द्वेषांसि) ઉપાસકની સંપૂર્ણ દ્વેષ ભાવનાઓને (सयुग्भिः) સાથે યુક્ત શક્તિઓથી (तरति) તરી જાય છે-નાશ કરે છે. (सुरः न सयुग्भिः) જેમ સૂર્ય પોતાના કિરણો દ્વારા સંસારથી અંધકારને દૂર કરે છે-નષ્ટ કરે છે. (पृष्ठस्य धारा रोचते) ત્યારે પરમાત્માથી સ્પૃષ્ટ-સ્પર્શ-સંપર્કને પ્રાપ્ત થયેલ હૃદયસ્થ ઉપાસકના આત્માની ચેતનાશક્તિ પ્રકાશમાન બની જાય છે (अरुषः हरिः) પ્રકાશમાન દુઃખનું અપહરણ કરનાર પરમાત્મા (यत् विश्वा रूपा ऋक्वभिः) જે સ્તુતિઓ વડે ઉપાસકના આત્માના સર્વ રૂપો-રુચિઓને અથવા નિરૂપણીય ભાવનાઓ, આશાઓ, કામનાઓને (परियासि) પરિપ્રાપ્ત થાય છે-પરિપૂર્ણ કરે છે. (सप्तास्येभिः ऋक्वभिः) જેમ જ્યોતિઓવાળા સાત મુખ, જિલ્લા જ્વાળારૂપ કિરણોથી સર્વ વસ્તુઓને પરિપ્રાપ્ત કરે છે. (૭) 

    भावार्थ

    ભાવાર્ય : હૃદયમાં લઈ જનારી સ્તુતિથી આનંદધારામાં પ્રાપ્ત થતા પરમાત્મા ઉપાસકની સમસ્ત દ્વેષ ભાવનાઓને પોતાની વ્યાપિની દિવ્ય શક્તિઓથી નષ્ટ કરી નાખે છે, જેમ સૂર્ય પોતાના કિરણોથી સંસારના અંધકારનો નાશ કરી નાખે છે. પરમાત્માના સંપર્ક સમાગમને પ્રાપ્ત થયેલ ઉપાસક આત્માની ચેતન શક્તિ પ્રકાશમાન બની જાય છે. જેમ સૂર્ય પોતાના કિરણો દ્વારા સર્વ વસ્તુઓને સમગ્રરૂપથી પ્રાપ્ત થાય છે; તેમ પ્રકાશમાન પરમાત્મા દુઃખાપહરણકર્તા અને સુખ આહરણકર્તા સ્તુતિઓ દ્વારા ઉપાસકનું રુચિકર ભાવનાઓ, કામનાઓ અને આશાઓને પરિ-સમગ્રરૂપથી પ્રાપ્ત થાય છે. (૭)

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    उर्दू (1)

    Mazmoon

    اِیشور کے سما گم سے بھگت کی ترپتی

    Lafzi Maana

    یوگ سادھنوں کے ذریعے اُپاسک کا ہردیہ جب پوتّر اور شانت ہو جاتا ہے اور پرمیشور کی کرپا سے اُس کے سب دویش اور بُرے خیالات تحس نحس ہو جاتے ہیں تو بھگوان کے وصال سے اُس کی آتما کا سب اندھکار بھی نشٹ ہو جاتا ہے۔ جیسے سُورج کی روشنی سے باہر کا اندھکار مٹ جاتا ہے۔ پرماتما کے سماگم سے اُس کا چِت بُدھی وغیرہ سبھی روشن ہو جاتے ہیں۔ دُکھ چلے جاتے ہیں، سُکھ آ جاتے ہیں، عابد کی منو کامنا اور آشائیں پُوری ہو جاتی ہیں اور وہ ترپت ہو جاتا ہے!

    Tashree

    یوگ کے سادھن سے جب بڑھ جاتی ایشور میں لگن، پُورن ہوتیں کامنائیں ترپت ہو جاتا ہے من۔

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    मराठी (2)

    भावार्थ

    जसा सूर्य आपल्या किरणांनी रोग, मलिनता इत्यादी दूर करून संपूर्ण भूमंडळ पवित्र करतो, तसेच माणसाच्या आत्म्याने सर्व पाप, द्वेष इत्यादी किल्मिषांना दूर करून जीवन पवित्र करावे ॥७॥

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    विषय

    पवमान देवता। सूर्याची नुपमा देऊन जीवात्मा रूप सोमाचे वर्णन

    शब्दार्थ

    हा सोम म्हणजे इंद्रियांना कर्म प्रवृत्त करणारा जीवात्मा (अया) हृदयहारिणी (कचा) तेजस्वितेद्वारे (पुनानः) पावित्र्य देत देत (सयुग्वभिः) सोबत वागणाऱ्या प्राणांशी मिळून (विश्वा) (द्वेषांसि) सर्व द्वेषी विघ्नांना अथवा काम, क्रोध आदी षड्रिपूंना (तरति) तरून जातो (त्यावर विजय मिळवितो). कशा प्रकारे ? (सूरः न) जसे सूर्य (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणांसह मिळून (विश्वा द्वेषांसि) सर्व शत्रूभूत अंधकाराला (तरति) जिकून घेतो. (तसे आत्मा कामायी दोषांवर विजय मिळवितो). (पृष्ठस्य) तेव्हा प्रकाशाचे सिंचन करणाऱ्या आत्मारूप सोमच्या (धारा) प्रकाशधारा (रोचते) उद्भासित होतात (चमकतात) (अकषः) तेजामुळे तळपणाऱ्या (हरिः) पापाहारी हे आत्मा, तू (पुनानः) मन, बुद्धी आदींना पवित्र करणे (यत्) तसेच जेव्हा तू (ऋग्वभिः) प्रशंसनीय कर्म करीत (ऋग्वभिः) प्रशंसनीय (सप्तास्यैः) पंच ज्ञानेंद्रिये, मन व बुद्धी या सप्तमुख प्राणांसह (विश्वारूपा) सर्व रूपधारी मनुष्यांना (पिरयासि) प्राप्त होतोस (जेव्हा आत्मा सर्वांशी उत्तमपणे वागतो, तेव्हा आत्म्याचा खरा प्रकाश दिसून येतो.)।। ‘सूरो न सयुग्वभिः’ या वाक्यात सूर्याचा उपमान म्हणून उपयोग केल्यामुळे शेष मंत्र भागाचा अर्थ सूर्य - पक्षीदेखील घटित होत आहे. तो सूर्य कसा आहे ? तो (अया) या (हरिण्मा) तमोहारिणी (रूचा) दीप्तीने (पुनानः) भूमी पवित्र करीत (सयुग्वभिः) सहयोगी किरणआंद्वारे (विश्वा द्वेषांसि) सर्व द्वेषकारी अंधकार, रोग आदींचे (तरति) निवारण करतो. तो (पृष्ठस्य) वृष्टिकर्ता सूर्याच्या (धारा) प्रकाशधारा वा वृष्टि-धारा (रोचते) चमकते. तो (अरुषः) तेजमय रूपधारी सूर्य (हरिः) आकर्षण शक्तीने पृथ्वी आदी लोकांचा धारण कर्ता असून (पुनानः) त्यांना पवित्र वा शुद्ध करणे. (यत्) जेव्हा (सप्तास्येभिः) सात मुख वा रंग असलेल्या (ऋग्वभिः) प्रशंसनीय किरणांनी तो सूर्य (विश्वा रूपाणि) सर्व आकारवान पदार्थांना (परियाति) प्राप्त होतो. (वा व्यक्त होण्यास कारणीभूत ठरतो, तेव्हा तो पदार्थाना पावित्र्य देतो.)।। ७।।

    भावार्थ

    जसे सूर्य आपल्या किरणांनी रोग, मालिन्यादी दूर करून साऱ्या भूमंडळाला पवित्र करतो, तसे मनुष्यांनी आत्म्यातील पापवृत्ती, द्वेष आदी कल्मष दूर करून आपले जीवन पवित्र केले पाहिजे.।। ७।।

    विशेष

    या मंत्रात श्लिष्टोपमा अलंकार आहे. ‘सयुग्वभि’ व ‘ऋवभिः) यात एक वेळच्या आवृत्तीमुळे यमक अलंकार आहे.।। ७।।

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    तमिल (1)

    Word Meaning

    புனிதன் பொன்மய ஒளியுடனான தாரையால் எல்லா துவேஷிகளையும் சூரியன் இருளை ஒழிப்பது போல்
    அடக்குகிற ரச தாரையோடு தன்னைப் புனிதஞ் செய்து
    கொண்டு, துதி செய்பவர்களோடு எல்லா ரூபங்களையும்
    அவன் சூழுங்கால், ஏழு ருசி காணும் சாதனர்களான துதி
    செய்பவர்களோடு அவன் பொன்னாயும் சிகப்பாயும் ஒளிவீசுகிறான்.

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