Sidebar
सामवेद के मन्त्र
सामवेद - मन्त्रसंख्या 55
ऋषिः - वसिष्ठो मैत्रावरुणिः
देवता - अग्निः
छन्दः - बृहती
स्वरः - मध्यमः
काण्ड नाम - आग्नेयं काण्डम्
35
दे꣣वो꣡ वो꣢ द्रविणो꣣दाः꣢ पू꣣र्णां꣡ वि꣢वष्ट्वा꣣सि꣡च꣢म् । उ꣡द्वा꣢ सि꣣ञ्च꣢ध्व꣣मु꣡प꣢ वा पृणध्व꣣मा꣡दिद्वो꣢꣯ दे꣣व꣡ ओ꣢हते ॥५५॥
स्वर सहित पद पाठदे꣣वः꣢ । वः꣣ । द्रविणोदाः꣢ । द्र꣣विणः । दाः꣢ । पू꣣र्णा꣢म् । वि꣣वष्टु । आसि꣡च꣢म् । आ꣣ । सि꣡च꣢꣯म् । उत् । वा꣣ । सिञ्च꣡ध्व꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । वा꣣ । पृणध्वम् । आ꣢त् । इत् । वः꣣ । देवः꣢ । ओ꣣हते ॥५५॥
स्वर रहित मन्त्र
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्वो देव ओहते ॥५५॥
स्वर रहित पद पाठ
देवः । वः । द्रविणोदाः । द्रविणः । दाः । पूर्णाम् । विवष्टु । आसिचम् । आ । सिचम् । उत् । वा । सिञ्चध्वम् । उप । वा । पृणध्वम् । आत् । इत् । वः । देवः । ओहते ॥५५॥
सामवेद - मन्त्र संख्या : 55
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
Acknowledgment
(कौथुम) पूर्वार्चिकः » प्रपाठक » 1; अर्ध-प्रपाठक » 2; दशतिः » 1; मन्त्र » 1
(राणानीय) पूर्वार्चिकः » अध्याय » 1; खण्ड » 6;
Acknowledgment
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को प्रेरणा दी जा रही है।
पदार्थ
हे मनुष्यो ! (द्रविणोदाः) धन और बल का दाता (देवः) दिव्यगुणमय परमेश्वर (वः) तुम्हारी (पूर्णाम्) भक्तिरसरूप सोम से परिपूर्ण (आसिचम्) मन रूप स्रुवा की (विवष्टु) कामना करे। तुम (उत् सिञ्चध्वं वा) श्रद्धारस से उस परमेश्वर को स्नान कराओ, (उप पृणध्वं वा) और तृप्त करो। (आत् इत्) तदनन्तर ही (देवः) परमेश्वर (वः) तुम्हें (ओहते) वहन करेगा अर्थात् लक्ष्य पर पहुँचाएगा ॥१॥
भावार्थ
सब उपासक जनों को चाहिए कि प्रेमरस से भरी हुई अपनी मनरूप स्रुवाओं से परमेश्वर को श्रद्धारस से सींचें और तृप्त करें। इस प्रकार सींचा हुआ और तृप्त किया हुआ वह उपासकों को उनके निर्धारित लक्ष्य की ओर ले जाता है ॥१॥
पदार्थ
(द्रविणोदाः-देवः) द्रविण-धन-मोक्षैश्वर्य “द्रविणोदाः-धनं द्रविणम्” [निरु॰ ८.१] को देने वाला परमात्मा “द्रविणोदा इति द्रविणं ह्येभ्यो ददाति” [श॰ ६.३.३.१३] (वः पूर्णाम्-आसिचम्) उपासकजनो तुम्हारी—अपनी हावभावभरी स्निग्ध उपासनास्थलीहृदय भूमि को (विवष्टु) विशेषरूप से चाहे “वश कान्तौ” [अदादि॰] अतः (उत्सिञ्चध्वं वा-उपपृणध्वं वा) तुम अपनी स्निग्ध उपासनाधारा से परमात्मा को सींचो और आपूर भरपूर कर दो (आत्-इत्) अनन्तर ही—तुरन्त ही (देवः-वः-ओहते) परमात्मदेव तुम्हें अपनी ओर समन्तरूप से वहन कर लेता है—अपने में स्थान दे देता है।
भावार्थ
वह मोक्षदाता परमात्मा उपासक की स्नेहभरी उपासनास्थली हृदयभूमि को चाहता है जबकि उपासक अपनी स्नेहभरी उपासना धारा से उसे सींचे और सींचते सींचते उसे आपूर भरपूर कर दे—सींचते-सींचते सींचने की आत्मशक्ति समाप्त कर दे तो परमात्मा उसे अपनी परमदया से ऊपर उठाकर इस देहबन्धन से छुड़ा निज आश्रय में ले अमृतरूप मोक्ष प्रदान करता है॥१॥
विशेष
छन्दः—बृहती। स्वरः—मध्यमः। ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त वसने वाला उपासक)॥<br>
विषय
दया का उमड़ता हुआ समुद्र
पदार्थ
हे मनुष्यो! उत् (सिञ्चध्वम् ) = अपने हृदयों को दया की भावना से इतना सींचो कि वह दया तुम्हारे हृदयों से बाहर प्रवाहित होने लगे। (वा) = और (उप) = दुःखियों के समीप पहुँचकर (पृणध्वम्) = उनके जीवन को सुखी बनाओ [पृण सुखी करना]।
दुःखी पुरुष जब हमारे समीप आएँ तो हम उनकी सहायता करें यह भी भद्रता है, परन्तु प्रभु इससे कुछ अधिक चाहते हैं। प्रभु की इच्छा है कि हम दुःखियों के आने की प्रतिक्षा क्यों करें, हम उनके समीप पहुँचकर उन्हें सुख पहुँचाएँ। पीड़ितों के पास पहुँचकर उनकी पीड़ा दूर करने पर (आत् इत्) = उसके पश्चात् अवश्य ही (देवः) = प्रभु (वः) = तुम्हें (ओहते) = प्राप्त होते हैं। प्रभु-प्राप्ति इन ('सर्व-भूत-हिते रताः') को ही होती है।
आसिचम् - हृदय में दया की भावना के पूर्ण सेचन को विवष्टु- चाहते की न्यूनता हमें प्रभु से दूर रखती है। वह प्रभु पूर्णां हैं। दया
जब व्यक्ति करुणामय बनकर सबकी सहायता करता है तो उसके पास स्वयं अपनी आवश्यकताओं के लिए धन की कमी हो जाती है और कई बार ऐसा विचार आने लगता है कि इतने श्रम से कमाये हुए धन को इस प्रकार औरों पर कैसे व्यय कर दें? इस प्रश्न का उत्तर वेद इस रूप मे देता है कि (वः) = तुम्हें (देवः) = वह प्रभु ही (द्रविणोदाः) = धन देनेवाले हैं। सब धन उस प्रभु का है। उस प्रभु के धन को प्रभु की प्रजा के कल्याण में व्यय कर देना ही ठीक है।
भावार्थ
प्रभु की प्राप्ति के लिए दो बातें आवश्यक हैं- हृदय का दया से पूर्ण होना और दुःखियों की सेवा करना । ये दोनों बातें तभी हो सकती हैं जब हम अपने मन को वश में करके इस मन्त्र के ऋषि ‘वसिष्ठ' बनें।
विषय
परमेश्वर की स्तुति
भावार्थ
भा० = हे मनुष्यो ! ( वः ) = तुम्हारा ( देवः ) = देव, इष्ट, भक्तिपात्र परमेश्वर ( दविणोदा : ) = सब प्रकार के द्रव्यों को देने हारा है । इसलिये वह ( पूर्णाम् ) = भरी हुई ( आसिचम् ) = स्रुवा को ही ( विवष्टु ) = कामना करता है ( वा ) = और ( उत्-सिन्चध्वं ) = खूब ऊपर से आहुति भरकर डालो ( वा ) = और ( उपपृणध्वं ) = उसको पुनः भरो ( आत् इ ) = तब शीघ्र ही ( वः ) = तुम्हारे लिये ( देवः ) = वह दिव्य गुण ईश्वर ( ओहते१ ) = अभिलषित फल देगा ।
जो ईश्वर सब कुछ देता है उसके नामपर कंजूसी से दान न देकर खुले हाथ दान करना चाहिये । पात्र में दान देने से फल भी शीघ्र प्राप्त होता है ।
टिप्पणी
५५ - 'विवष्ट्यासिचम्, इति ऋ० ।
१. ओहते वर्धयति । मा० वि० । वहतेरूपम् । सा० । वंहतेरूपम् । मा० वि० ।
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
ऋषिः - वसिष्ठ:।
छन्दः - बृहती।
संस्कृत (1)
विषयः
अथ द्वितीयोऽर्धः अथाद्ये मन्त्रे जनाः प्रेर्यन्ते।
पदार्थः
हे मनुष्याः ! (द्रविणोदाः२) द्रविणः धनं बलं वा, तस्य दाता (देवः) दिव्यगुणः परमेश्वरः (वः) युष्माकम् (पूर्णाम्) श्रद्धारससोमेन परिपूर्णाम् (आसिचम्३) आसिञ्चन्ति अनया ताम् मनोरूपां स्रुचम् (विविष्टु४) कामयताम्। वष्टि कान्तिकर्मा। निघं० २।६। वश कान्तौ अदादिः। बहुलं छन्दसि।’ अ० २।४।७६ इति शपः श्लौ रूपम्। यूयम् (उत् सिञ्चध्वं वा) श्रद्धारसेन तं परमेश्वरं स्नपयत च, (उप पृणध्वं वा) उपप्रीणयत च। वा शब्दः समुच्चये। अथापि समुच्चये भवति इति निरुक्तम्। १।५। (आत् इत्) तदनन्तरमेव (देवः) परमेश्वरः (वः) युष्मान् (ओहते५) वहति, लक्ष्यं प्रापयिष्यति। वह प्रापणे धातोः छान्दसे सम्प्रसारणे गुणे च रूपम् ॥१॥६
भावार्थः
सर्वैरुपासकजनैः स्वकीयाभिः प्रेमरसपूर्णाभिर्मनोरूपाभिः स्रग्भिः परमेश्वरः श्रद्धारसेन सेचनीयः प्रीणनीयश्च। एवं सिक्तः प्रीतश्च स उपासकान् तन्निर्धारितं लक्ष्यं प्रति वहति ॥१॥
टिप्पणीः
१. ऋ० ७।१६।११, विवष्ट्यासिचम् इति पाठः। २. धनं द्रविणमुच्यते यदेनदभिद्रवन्ति, बलं वा द्रविणं यदेनेनाभिद्रवन्ति, तस्य दाता द्रविणोदाः इति निरुक्तम्। ८।१। वस्तुतस्तु सकारान्ताद् द्रविणस् शब्दान्निष्पन्नमिदं रूपम्। द्रष्टव्या प्रथमदशतौ ४ संख्याके मन्त्रे द्रविणस्युशब्दे टिप्पणी। (द्रविणोदाः) द्रविणांसि विद्याबलराज्यधनानि ददातीति स परमेश्वरो भौतिको वा। ... द्रविणं करोति द्रविणति, अस्मात् सर्वधातुभ्योऽसुन् इत्यसुन् प्रत्ययः इति ऋ० १।१५।७ भाष्ये द०। ३. आसिचम् आज्यपूर्णां स्रुचम्—इति वि०। आसिक्तां हविषा जुहूम्—इति भ०। आसिक्तां च स्रुचम्—इति सा०। ४. विवष्टु कामयताम्, द्वित्वसन्वद्भावौ छान्दसौ—इति भ०। ५. ओहते वर्धयति—इति वि०। वहतु प्रापयतु कामान्—इति भ०। वहति—इति सा०। वितर्कयति इति ऋग्भाष्ये द०। (ऊह वितर्के)। ६. दयानन्दर्षिणा मन्त्रोऽयम् ऋग्भाष्ये विद्वत्पक्षे व्याख्यातः।
इंग्लिश (3)
Meaning
O men, God is the Giver of wealth unto Ye. He demands complete self-abnegation as an oblation. Pour out the oblation in full, fill it again. Then will Divine God give Ye speedily the desired fruit.
Translator Comment
God is the respository and source of all knowledge. He spread* it on the Earth through the revelation of the Vedas in the beginning of creation. Soul finally attains to the bliss of salvation through that knowledge.^Griffith interprets Diwodasa as a liberal prince who especially worshipped Agni his tutelary god.^The interpretation is wrong, as there is no history in the Vedas. Ho considers the stanza to be obscure. This view is unjustified. The verse is clear like day light, Pt. Jaidev Vidyalankar, translates Diwodasa as Resplendent God.^Charity given in the name of God, for a noble cause is a kind of oblation. Just as oblations poured into the fire again and again satisfy it, so does self-abnegation for a public cause, or charity, given disinterestedly satisfy God, Who gives speedily its reward or fruit.
Meaning
Agni, self-refulgent lord giver of wealth, honour and excellence, loves to have your fire of yajnic action sprinkled with overflowing ladle of ghrta and the highest refined action. Serve him closely, feed the fire to the full, let the flames rise, and the generous lord refulgent would lead you to the heights of prosperity and excellence. (Rg. 7-16-11)
Translation
The divine Lord, the giver of wealth, desires the ladle filled full with butter. Pour out the contents and replenish the vessel, and then He, the divine will convey your offerings to Nature's bounties. (Cf. S. 1513; Rv VII.16.11)
गुजराती (1)
पदार्थ
પદાર્થ : (द्रविणोदाः देवः) દ્રવિણ = ધન – મોક્ષ ઐશ્વર્યના આપનાર પરમાત્મા (वः पूर्णाम् आसिचम्) ઉપાસના જનોની-તમારી-પોતાની હૃદયના ભાવથી પૂર્ણ સ્નિગ્ધ ઉપાસનાસ્થાન હૃદયભૂમિને (विवष्टु) વિશેષ રૂપથી ચાહે છે. તેથી (उत्सिञ्चिध्वं वा उपपृणध्वं वा) તમે તમારી સ્નિગ્ધ ઉપાસના ધારાથી પરમાત્માને સિંચો અને સંપૂર્ણ ભરી દો.(आत् इत्) ત્યારપછી - તુરત જ (देवः वः ओहते) પરમાત્મ દેવ તમને પોતાની તરફ સર્વત્રથી વહન કરી લે છે - પોતાનામાં સ્થાન આપી દે છે. (૧)
भावार्थ
ભાવાર્થ : તે મોક્ષદાતા પરમાત્મા ઉપાસકની સ્નેહભરી ઉપાસના સ્થલી હૃદયભૂમિને ચાહે છે. જ્યારે ઉપાસક પોતાની સ્નેહપૂર્ણ ઉપાસનાની ધારાથી તેને સિંચે અને સિંચતાં-સિંચતાં તેને સંપૂર્ણ ભરી દે અર્થાત્ સિંચાતાં-સિંચતાં સિંચવાની આત્મશક્તિ સમાપ્ત કરી નાખે, ત્યારે પરમાત્મા તેને પોતાની પરમ દયાથી ઉપર ઉઠાવીને, તેને દેહબંધનથી છોડાવીને, પોતાના આશ્રયમાં લઈને અમૃતરૂપ મોક્ષ પ્રદાન કરે છે. (૧)
उर्दू (1)
Mazmoon
تب کُھلے گا موکھش کا دوار
Lafzi Maana
ہے منشیور! پیارے پربھُو اُپاسکو (درونودا) اپنے پیارے ادھیا تمک دھن اور بل کا داتا پرمیشور دیو (وہ) تمہاری بھگتی رس سے (پُور نام) بھری ہوئی (آسچم) اتینت شردھا مئے ہردیہ کی آہوتی کو چاہتا ہے۔ اس برہم اگنی میں پورے بھرے ہوئے چمچے سے ہی بھگتی رس ئے گھی کی آہوتی ڈالنی ہوگی۔ (اُت سنچد ھُومّ) بھگوان پر اونچی بھتگی بھاوُ کی بوچھاڑین چھوڑنی ہوں گی۔ (اُپ پرندِ ھُومّ) نزدیک سے نزدیک اُسے سمجھ کر اُپاسنا سے اُسے ترپت کرنا ہوگا۔
تب ہی وہ پربھُومن چاہے سُکھ آنند اور موکھش کے دوار کو آپ کے لئے کھول دے گا!
मराठी (1)
भावार्थ
सर्व उपासक लोकांनी प्रेमरसाने भरलेल्या आपल्या मनरूपी स्रुवांनी परमेश्वराला श्रद्धारसांनी सिंचित करावे व तृप्त करावे. या प्रकारे सिंचित केलेला व तृप्त केलेला रस उपासकांना त्यांच्या निर्धारित लक्ष्याकडे घेऊन जातो ॥१॥
तमिल (1)
Word Meaning
ஐஸ்வர்யங்களை அளிக்கும் (தேவர்) நிரப்பப்பட்ட பூரணமான அளிப்பைப் பெற்றுக் கொள்ளட்டும், அதை வெளியில் [1]கொட்டவும், அப்பால் நிரப்பவும், ஏனெனில் தேவர் (இப்படி) உங்களைச் சுமக்கிறார், காப்பாற்றுகிறார்.
FootNotes
[1] கொட்டவும் - வழியும் வரை
Acknowledgment
Book Scanning By:
Sri Durga Prasad Agarwal
Typing By:
Misc Websites, Smt. Premlata Agarwal
Conversion to Unicode/OCR By:
Dr. Naresh Kumar Dhiman (Chair Professor, MDS University, Ajmer)
Donation for Typing/OCR By:
N/A
First Proofing By:
Acharya Chandra Dutta Sharma
Second Proofing By:
Pending
Third Proofing By:
Pending
Donation for Proofing By:
Sri Dharampal Arya
Databasing By:
Sri Jitendra Bansal
Websiting By:
Sri Raj Kumar Arya
Donation For Websiting By:
N/A
Co-ordination By:
Sri Virendra Agarwal